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    सूरए अम्बिया, आयतें 68-73, (कार्यक्रम 582)

    सूरए अम्बिया, आयतें 68-73, (कार्यक्रम 582)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 68वीं और 69वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     قَالُوا حَرِّقُوهُ وَانْصُرُوا آَلِهَتَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ (68) قُلْنَا يَا نَارُ كُونِي بَرْدًا وَسَلَامًا عَلَى إِبْرَاهِيمَ (69)

    अनेकेश्वरवादियों ने कहाः यदि तुम कुछ करना ही चाहते हो तो उसे जला दो और अपने पूज्यों की सहायता करो। (21:68) हमने कहाः हे आग! इब्राहीम के लिए ठंडी और सुरक्षित बन जा। (21:69)

    इससे पहले हमने बताया कि अनेकेश्वरवादी, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के स्पष्ट तर्कों का कोई उत्तर नहीं दे सके और उन्होंने एक खुले न्यायालय में उन पर मुक़द्दमा चलाया। न्यायालय ने फ़ैसला सुनाया कि इब्राहीम को सबसे कड़ा दंड दिया जाए। इस प्रकार से कि उन्हें धधकती आग में डाल दिया जाए ताकि फिर कोई मूर्तियों को तोड़ने तथा उनके अनादर का दुस्साहस न कर सके।

    इसके बाद एक बहुत बड़ी आग जलाई गई और उसकी लपटें इतनी दूर तक पहुंचने लगीं कि कोई हज़रत इब्राहीम को उसमें ले जाकर डालने का साहस न कर सका। अतः उन्हें गोफन में रख कर आग की ओर फेंका गया किंतु ईश्वर के आदेश से न केवल यह कि आग ने उन्हें जलाया नहीं बल्कि उनके लिए अत्यंत सुरक्षित स्थान में परिवर्तित हो गई ताकि ईश्वरीय पैग़म्बर के शत्रु, ईश्वर की शक्ति को अपनी आंखों से देख लें और निर्जीव मूर्तियों की उपासना छोड़ दें।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जिनके पास कोई तर्क नहीं होता वे ईश्वर के प्रिय बंदों को यातनाएं देने व उनकी हत्या करने का प्रयास करते हैं जबकि ईश्वर को मानने वाले अपनी जान तक देकर अपनी आस्था की रक्षा करते हैं तथा कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद का मुक़ाबला करते हैं।

    प्रकृति व उसके क़ानून, ईश्वर के इरादे के अधीन हैं। वह कारक बनाता भी है और कभी उसके प्रभाव को समाप्त भी कर देता है। आग जलाती है किंतु ईश्वर की इच्छा से ठंडी हो कर सुरक्षित भी बन जाती है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 70वीं और 71वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     وَأَرَادُوا بِهِ كَيْدًا فَجَعَلْنَاهُمُ الْأَخْسَرِينَ (70) وَنَجَّيْنَاهُ وَلُوطًا إِلَى الْأَرْضِ الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا لِلْعَالَمِينَ (71)

    और उन्होंने इब्राहीम के साथ यह चाल चल कर उन्हें मारना चाहा किन्तु हमने (उन्हें विफल बना कर) उन्हीं को घाटा उठाने वालों में डाल दिया। (21:70) और हमने उन्हें और लूत को बचा कर (शाम की) उस धरती की ओर पहुंचा दिया जिसमें हमने संसार वालों के लिए विभूतियां रखी थीं। (21:71)

    मूर्तियों की उपासना करने वाले सोचते थे कि आग में डाल कर वे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से सदा के लिए छुटकारा पा लेंगे किंतु जब आग बुझ गई और उसमें से हज़रत इब्राहीम सुरक्षित बाहर निकल आए तो सभी लोगों को अपनी आस्था पर संदेह होने लगा। उस समय बाबिल के अत्याचारी शासक नमरूद ने एक अन्य षड्यंत्र द्वारा उन्हें मार्ग से हटाना चाहा किंतु इस बार उसने उनकी हत्या के स्थान पर उन्हें देश निकाला देने का आदेश दिया। इसके परिणाम स्वरूप हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने भतीजे हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के साथ तत्कालीन शाम और वर्तमान सीरिया की ओर रवाना हो गए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की शक्ति व उसका इरादा शत्रुओं के षड्यंत्रों से कहीं ऊपर है और वह जब भी चाहे उनकी चालों व षड्यंत्रों को विफल बना देता है।

    सत्य व असत्य के बीच युद्ध में अंततः जीत सत्य की होती है और असत्य पराजित होता है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 72वीं और 73वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     وَوَهَبْنَا لَهُ إِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ نَافِلَةً وَكُلًّا جَعَلْنَا صَالِحِينَ (72) وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَهْدُونَ بِأَمْرِنَا وَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِمْ فِعْلَ الْخَيْرَاتِ وَإِقَامَ الصَّلَاةِ وَإِيتَاءَ الزَّكَاةِ وَكَانُوا لَنَا عَابِدِينَ (73)

    और हमने इब्राहीम को इसहाक़ प्रदान किया और (इसहाक़ के पुत्र) याक़ूब को भी उन्हें प्रदान किया और हमने (उनमें से) प्रत्येक को भला बनाया। (21:72) और हमने उन्हें ऐसा नेता बनाया जो हमारे आदेश से मार्गदर्शन करते थे और हमने उनकी ओर अपना विशेष संदेश वहि भेजा कि भले कर्म करें, नमाज़ स्थापित करें तथा ज़कात दें और वे सब केवल हमारी उपासना करते थे। (21:73)

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम शाम पहुंच कर वहां रहने लगे और उन्होंने हज़रत सारा से विवाह किया किंतु कई वर्षों तक उनके यहां संतान नहीं हुई। हज़रत सारा के कहने पर हज़रत इब्राहीम ने उनकी दासी हाजेरा से विवाह कर लिया और ईश्वर ने उन्हें पुत्र के रूप में इस्माईल जैसी संतान प्रदान की। इसके बाद ईश्वर ने सारा को भी संतान सुख दिया और उनके यहां हज़रत इसहाक़ ने जन्म लिया और आगे चल कर हज़रत इसहाक़ के यहां हज़रत याक़ूब ने जन्म लिया।

    इन आयतों में जिस बात को हज़रत इब्राहीम को संतान दिए जाने से अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है वह उन्हें ईश्वरीय संदेश वहि की प्राप्ति के माध्यम से समाज के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व का दायित्व प्रदान किया जाना है। ईश्वर ने यह दायित्व हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पश्चात उनकी संतान और फिर उनके बाद की पीढ़ियों को दिया तथा उन्हें इस दायित्व की पूर्ति के योग्य समझा। अलबत्ता यह महान दायित्व, ईश्वर की बंदगी और उपासना के साथ आरंभ होना और जारी रहना चाहिए था।

    इन आयतों से हमने सीखा कि भली संतान, पवित्र लोगों के लिए ईश्वर की महान अनुकंपाओं में से एक है।

    निष्ठापूर्ण उपासना, ईश्वर की विशेष अनुकंपाओं की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है और पैग़म्बर तथा इमाम संसार के सबसे भले व पवित्र लोग थे।

    ईश्वरीय संदेश वहि का मुख्य बिंदु लोगों को भले कर्मों का निमंत्रण देना है तथा नमाज़ व ज़कात भले कर्मों के सबसे बड़े प्रतीकों में से हैं।