islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए अम्बिया, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 569)

    सूरए अम्बिया, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 569)

    सूरए अम्बिया, आयतें 7-10, (कार्यक्रम 569)
    Rate this post

    आइये पहले सूरए अम्बिया की सातवीं और आठवीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَمَا أَرْسَلْنَا قَبْلَكَ إِلَّا رِجَالًا نُوحِي إِلَيْهِمْ فَاسْأَلُوا أَهْلَ الذِّكْرِ إِنْ كُنْتُمْ لَا تَعْلَمُونَ (7) وَمَا جَعَلْنَاهُمْ جَسَدًا لَا يَأْكُلُونَ الطَّعَامَ وَمَا كَانُوا خَالِدِينَ (8)

    और (हे पैग़म्बर!) हमने आपसे पहले भी जिन लोगों को पैग़म्बर बनाकर भेजा है वे भी पुरुष ही थे जिनके पास हम वहि भेजा करते थे तो हे लोगो! यदि तुम न जानते हो तो जानकारों से पूछ लो। (21:7) और हमने उन्हें ऐसे शरीर (वाला) नहीं बनाया था जो भोजन न करते हों और न ही वे सदैव रहने वाले थे। (21:8)

    इससे पहले हमने कहा था कि मक्के के अनेकेश्वरवादी और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधी विभिन्न प्रकार के बहाने बनाया करते थे, कभी वे कहते थे कि वे एक साधारण व्यक्ति से अधिक कुछ नहीं हैं और उनकी बातों का प्रभाव जादू के अतरिक्त कुछ नहीं हो सकता। कभी कहते थे कि जो कुछ वे ईश्वरीय संदेश वहि के रूप में प्रस्तुत करते हैं वह बिखरे हुए सपने हैं जिन्हें वे वास्तविकता समझ बैठे हैं। इसी प्रकार कभी वे दावा करते थे कि पैग़म्बर एक शायर हैं और उनकी बातें शायरों की कल्पनाएं हैं जिन्हें वे झूठ में ईश्वर से संबंधित कर रहे हैं। अंत में वे कहते थे कि यदि वे सच बोल रहे हैं कि वे ईश्वर के पैग़म्बर हैं तो फिर वे हमारे समक्ष चमत्कार प्रस्तुत करें।

    इनमें से कुछ बातों का उत्तर पहले दिया जा चुका है। ये आयतें कहती हैं कि पूरे इतिहास में सभी पैग़म्बर मानव जाति के ही थे और ईश्वर ने कभी भी किसी फ़रिश्ते को पैग़म्बर बना कर नहीं भेजा है। यदि विरोधी इस बात को नहीं जानते हैं तो वे पिछली जातियों के विद्वानों से पूछ लें ताकि बाद में कोई बहाना न बनाएं और यह न कहें कि काश, मनुष्य के स्थान पर किसी फ़रिश्ते को पैग़म्बर बनाया गया होता ताकि उसमें मनुष्य का प्राकृतिक आवश्यकताएं न होतीं और उसकी आयु भी अनंत होती।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य में ईश्वर से संपर्क और उसके विशेष संदेश वहि को प्राप्त करने की क्षमता है किंतु यह हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है बल्कि ईश्वर जिसे चाहता है यह क्षमता प्रदान करता है।

    ज्ञानियों और विद्वानों से प्रश्न करना, क़ुरआने मजीद की सिफ़ारिशों में से एक है।

    भौतिक आयाम और मानवीय आवश्यकताओं की दृष्टि से पैग़म्बरों व अन्य लोगों में कोई अंतर नहीं है। वे भी सभी लोगों की भांति इस संसार से जाते हैं और अमर नहीं होते।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत संख्या 9 की तिलावत सुनें।

    ثُمَّ صَدَقْنَاهُمُ الْوَعْدَ فَأَنْجَيْنَاهُمْ وَمَنْ نَشَاءُ وَأَهْلَكْنَا الْمُسْرِفِينَ (9)

    फिर हमने (शत्रुओं की पराजय और ईमान वालों की विजय के बारे में) उन्हें जो वचन दिया था उसे सच्चा कर दिखाया तो हमने उन्हें और जिसे हमने चाहा मुक्ति दिला दी और सीमा से बढ़ जाने वालों को तबाह करदिया (21:9)

    यह आयत ईमान वालों को शुभ सूचना और विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहती है कि हमने पैग़म्बरों से वादा किया था कि शत्रुओं के षड्यंत्रों को विफल बना देंगे और यदि वे हठधर्मी नहीं छोड़ेंगे और सीमा से आगे बढ़ जाएंगे तो हम उन्हें विनष्ट कर देंगे। अंततः हमने अपना वचन पूरा कर दिया और भले व ईमान वाले लोगों को मुक्ति दिला दी तथा अत्याचारियों व सीमा से बढ़ जाने वालों को तबाह कर दिया।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों को विजय का जो वचन दिया है वह निश्चित है। इतिहास साक्षी है कि सदैव अत्याचारी तबाह हुए हैं जबकि सत्य बाक़ी रहा है।

    सीमा से बढ़ना केवल भौतिक मामलों में नहीं होता बल्कि जो सत्य के मुक़ाबले में खड़ा हो जाता है वह अपने आप पर अत्याचार करता है और यह अपनी सीमा से बढ़ना ही है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत संख्या 10 की तिलावत सुनें।

    لَقَدْ أَنْزَلْنَا إِلَيْكُمْ كِتَابًا فِيهِ ذِكْرُكُمْ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (10)

    निश्चित रूप से हमने तुम्हारी ओर एक किताब भेजी है जिसमें तुम्हारे लिए उपदेश (का साधन) है। तो क्या तुम बुद्धि से काम नहीं लेते? (21:10)

    क़ुरआने मजीद को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का सपना और कल्पना बताने पर आधारित विरोधियों की अनुचित बातों के उत्तर में यह आयत कहती है कि क़ुरआने मजीद की आयतें लोगों की चेतना का माध्यम हैं। ये आयतें उन बातों का उल्लेख करती हैं जो मनुष्य के कल्याण और उसकी संतुष्टि के लिए आवश्यक हैं और जो बातें उसकी तबाही और विनाश का कारण बनती हैं उनके बारे में चेतावनी देती हैं।

    अलबत्ता क़ुरआने मजीद के इन उपदेशों से केवल वही लोग पाठ सीख सकते हैं जो चिंतन करते हैं तथा बुद्धि से काम लेते हैं। जो लोग अपनी तुच्छ आंतरिक इच्छाओं के पालन के विचार में रहते हैं वे क़ुरआन की आयतों से लाभान्वित नहीं हो सकते। यद्यपि विरोधी क़ुरआने मजीद के बारे में अनुचित दावे करते हैं किंतु यह किताब सभी लोगों को अपनी आयतों में चिंतन का निमंत्रण देती है और कहती है कि क़ुरआन की शिक्षाओं से लाभान्वित होने के लिए चिंतन-मनन आवश्यक है।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद मानव समाज की प्रगति व चेतना का कारण है। अपने और अपने अस्तित्व में निहित पूंजी कि ओर से मनुष्य की निश्चेतना उसके लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा है और उसे निश्चेतना से बाहर निकालता है।

    ईश्वरीय पैग़म्बरों तथा उनकी जीवनदायक शिक्षाओं को झुठलाना, बुद्धिहीनता का चिन्ह है क्योंकि क़ुरआन की शिक्षाएं, बुद्धि से समन्वित हैं।