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    सूरए अम्बिया, आयतें 74-78, (कार्यक्रम 583)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 74वीं और 75वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     وَلُوطًا آَتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا وَنَجَّيْنَاهُ مِنَ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ تَعْمَلُ الْخَبَائِثَ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمَ سَوْءٍ فَاسِقِينَ (74) وَأَدْخَلْنَاهُ فِي رَحْمَتِنَا إِنَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ (75)

    और हमने लूत को तत्वदर्शिता व ज्ञान प्रदान किया और उन्हें उस बस्ती से छुटकारा दिलाया जो बुरे कर्म करती थी। निश्चित रूप से वे बहुत ही बुरे व अवज्ञाकारी लोग थे। (21:74) और हमने लूत को अपनी अनुकंपा में प्रविष्ट कराया। निसंदेह वे अच्छे लोगों में से थे। (21:75)

    इससे पहले की आयतों में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के जीवन के कुछ भागों का वर्णन किया गया था। ये आयतें एक अन्य ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के बारे में कहती हैं कि लोगों के मार्गदर्शन के लिए जो कुछ आवश्यक था वह ईश्वर ने उन्हें प्रदान किया क्योंकि उनमें इस महान दायित्व को भली भांति निभाने की पूरी क्षमता थी।

    अलबत्ता उनकी जाति के लोगों ने समलैंगिकता जैसे बुरे कर्मों को नहीं छोड़ा और जब ईश्वर की ओर से दंड आया तो उसने हज़रत लूत को, जिन्होंने अपने दायित्व का पालन किया था, दंड से बचा लिया। लोगों में यह बात प्रचलित है कि जब आपदा आती है तो अच्छे और बुरे दोनों ही उसमें ग्रस्त हो जाते हैं किंतु क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार केवल बुरे लोग या अच्छे कर्म करने वाले वे लोग, दंड में ग्रस्त होते हैं जिन्होंने पापियों को समझाने और पापों से रोकने के संबंध में अपने दायित्वों का निर्वाह नहीं किया था।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कभी किसी अवसर पर हो जाने वाले पाप को ईश्वर क्षमा कर सकता है किंतु उस पाप को निरंतर करने तथा उस पर आग्रह से ईश्वरीय दंड का मार्ग प्रशस्त होता है।

    भले लोग, ईश्वर की कृपा का पात्र बनते हैं और उसकी व्यापक दया से लाभान्वित होते हैं।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 76वीं और 77वीं आयतों की तिलावत सुनें।

     وَنُوحًا إِذْ نَادَى مِنْ قَبْلُ فَاسْتَجَبْنَا لَهُ فَنَجَّيْنَاهُ وَأَهْلَهُ مِنَ الْكَرْبِ الْعَظِيمِ (76) وَنَصَرْنَاهُ مِنَ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمَ سَوْءٍ فَأَغْرَقْنَاهُمْ أَجْمَعِينَ (77)

    और (हे पैग़म्बर!) नूह को भी याद कीजिए जब उन्होंने (इब्राहीम व लूत से) पहले हमें (सहायता के लिए) पुकारा तो हमने उनकी सुन ली और उन्हें और उनके परिजनों को बड़ी यात्ना से बचा लिया। (21:76) और हमने उस जाति के (लोगों के) मुक़ाबले में उनकी सहायता की जिन्होंने हमारी आयतों को झुठला दिया था। निश्चय ही वे बहुत बुरे लोग थे तो हमने उन सबको डुबो दिया। (21:77)

    हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वृत्तांत विस्तार से और हज़रत लूत की घटना संक्षेप में बयान करने के बाद क़ुरआने मजीद एक अन्य महान ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के बारे में कहता है कि वे इन दोनों पैग़म्बरों से पहले थे और उनकी जाति के लोग अत्यंत हठधर्मी थे। वे उन्हें जितना भी उपदेश देते थे, उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था और अत्यंत कम लोग उनकी बातों को स्वीकार किया करते थे। हज़रत नूह, ईश्वर की ओर से जो कुछ बयान करते थे उसे उनकी जाति के लोग झूठ बताते थे और अपनी ग़लत बातों पर आग्रह करते थे।

    हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने साढ़े नौ सौ वर्षों तक अपनी जाति के लोगों के बीच ईश्वरीय धर्म का प्रचार किया, उन्हें सदकर्म करने का उपदेश दिया किंतु बहुत कम लोग उनकी बातों पर ईमान लाए। अंततः उन्होंने ईश्वर से कहा कि वह पापियों व अपराधियों को दंडित करे। ईश्वर ने उनकी बात को स्वीकार करते हुए उन लोगों को इसी संसार में अपने दंड का स्वाद चखा दिया।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पिछले लोगों के इतिहास का ज्ञान, पापियों के लिए पाठ और भले लोगों के लिए संयम का कारण है।

    जिस समाज के अधिकांश लोग पाप व बुराइयों में ग्रस्त हों उसे अपने आपको ईश्वरीय दंड व कोप से सुरक्षित नहीं समझना चाहिए क्योंकि ईश्वर का दंड, लोगों के कर्मों की ही प्रतिक्रिया है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 78वीं आयत की तिलावत सुनें।

     وَدَاوُودَ وَسُلَيْمَانَ إِذْ يَحْكُمَانِ فِي الْحَرْثِ إِذْ نَفَشَتْ فِيهِ غَنَمُ الْقَوْمِ وَكُنَّا لِحُكْمِهِمْ شَاهِدِينَ (78)

    और (याद कीजिए उस समय को) जब दाऊद और सुलैमान खेती (के एक झगड़े) का फ़ैसला कर रहे थे जिसकी फ़स्ल को रात के समय कुछ लोगों की भेड़ों ने तबाह कर दिया था। और हम उन लोगों के फ़ैसले को देख रहे थे। (21:78)

    पिछली आयतों में कुछ पैग़म्बरों का उल्लेख करने के बाद क़ुरआने मजीद इस आयत में हज़रत दाऊद और फिर उनके पुत्र हज़रत सुलैमान अलैहिमस्सलाम की एक घटना की ओर संकेत करते हुए कहता है कि एक झगड़े का फ़ैसला करते समय दोनों की राय अलग अलग थी और ईश्वर ने हज़रत सुलैमान की राय की पुष्टि की।

    मामला यह था कि भेड़ों का एक रेवड़ रात के समय अंगूर के एक बाग़ में घुस गया था और अंगूर के पत्तों तथा गुच्छों को खा गया था। बाग़ के मालिक ने हज़रत दाऊद के पास आ कर शिकायत की। उन्होंने फ़ैसला दिया कि बाग़ के मालिक को जो नुक़सान हुआ है उसकी क्षतिपूर्ति में सभी भेड़ें उसको दे दी जाएं।

    किंतु उनके पुत्र हज़रत सुलैमान ने एक अन्य उपाय सुझाया और कहा कि चूंकि भेड़ों ने स्वयं बाग़ को तबाह नहीं किया बल्कि बाग़ से होने वाले लाभ या दूसरे शब्दों में उसकी फ़स्ल को तबाह किया है इस लिए, बाग़ के मालिक को भेड़ें देने के स्थान पर उनसे होने वाले लाभ अर्थात उनके दूध व ऊन को एक साल तक उसे दिया जाए। इस प्रकार बाग़ के मालिक की भी क्षतिपूर्ति हो जाएगी और भेड़ों के मालिक की मूल संपत्ति भी सुरक्षित रहेगी।

    स्वाभाविक है कि दोनों पैग़म्बरों का फ़ैसला, नुक़सान की मात्रा के आकलन और उसकी क्षतिपूर्ति पर आधारित था किंतु एक ने त्वरित क्षतिपूर्ति का प्रस्ताव दिया जबकि दूसरे ने एक वर्ष के भीतर क्रमशः क्षतिपूर्ति करने का उपाय सुझाया।

    इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के अधिकारों का सम्मान और उन्हें पहुंचने वाले नुक़सान की क्षतिपूर्ति चाहे वह जान बूझ कर पहुंचाया गया हो या ग़लती से पहुंचा हो, समाज में न्याय के क्रियान्वयन के लिए आवश्यक है।

    धार्मिक नेताओं का कर्तव्य केवल लोगों को उपदेश देना नहीं है बल्कि लोग अपने सामाजिक मामलों में भी उनसे परामर्श करते हैं तथा समाज की समस्याओं के निवारण के लिए भी उन्हीं से संपर्क करते हैं।