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    सूरए अम्बिया, आयतें 79-82, (कार्यक्रम 584)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 79वीं आयत की तिलावत सुनें।

    فَفَهَّمْنَاهَا سُلَيْمَانَ وَكُلًّا آَتَيْنَا حُكْمًا وَعِلْمًا وَسَخَّرْنَا مَعَ دَاوُودَ الْجِبَالَ يُسَبِّحْنَ وَالطَّيْرَ وَكُنَّا فَاعِلِينَ (79)

    तो हमने सुलैमान को (वास्तविक फ़ैसला) समझा दिया और दोनों में से प्रत्येक को हमने तत्वदर्शिता और ज्ञान प्रदान किया था। और हमने पहाड़ों और पक्षियों को वशीभूत कर दिया था कि वे दाऊद के साथ (ईश्वर का) गुणगान करें। और ऐसा करने वाले हम ही थे। (21:79)

    इससे पहले की आयतों में कहा गया कि दो लोगों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया और वे फ़ैसले के लिए हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के पास आए। उन्होंने अपने पुत्र सुलैमान से कहा कि वे उनके बीच फ़ैसला करें। हज़रत दाऊद और हज़रत सुलैमान दोनों ही ने फ़ैसला सुनाया कि जिस व्यक्ति को घाटा उठाना पड़ा है उसकी क्षतिपूर्ति होनी चाहिए किंतु दोनों की शैली अलग अलग थी।

    हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के विचार में नुक़सान की तत्काल और एक साथ क्षतिपूर्ति होनी चाहिए थी किंतु हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के अनुसार धीरे-धीरे और एक वर्ष के भीतर नुक़सान की भरपाई की जानी चाहिए थी। यह आयत कहती है कि ईश्वर ने फ़ैसला करने की शक्ति हज़रत सुलैमान को प्रदान की जिसके कारण वे ऐसा सही फ़ैसला कर सके।

    आगे चलकर आयत दोनों पैग़म्बरों के ईश्वरीय पद पर बल देते हुए कहती है कि जो कुछ पैग़म्बरी के लिए आवश्यक था, अर्थात ज्ञान व तत्वदर्शिता वह हमने दाऊद और सुलैमान को प्रदान किया, अलबत्ता हज़रत दाऊद के संबंध में हमने यह भी किया कि  पक्षी और पर्वत भी उनकी प्रार्थना से समन्वित हो कर ईश्वर का गुणगान करते थे। निश्चित रूप से पक्षियों और पर्वतों सहित सृष्टि की हर वस्तु स्वाभाविक रूप से ईश्वर का गुणगान करती है किंतु हज़रत दाऊद के साथ समन्वित हो कर उनका गुणगान करना वह भी इस प्रकार से कि अन्य लोगों के लिए भी आभास योग्य हो, हज़रत दाऊद की पैग़म्बरी को सिद्ध करने के लिए एक ईश्वरीय चमत्कार था।

    इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का दायित्व धर्म का प्रचार और लोगों को नसीहत करने के अतिरिक्त उनके बीच फ़ैसला करना भी था।

    सृष्टि में विवेक पाया जाता है और वह अपने पालनहार का गुणगान करती है किंतु हमारे पास उसे सुनने वाले कान नहीं हैं और हम उसे समझ नहीं पाते।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 80वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَعَلَّمْنَاهُ صَنْعَةَ لَبُوسٍ لَكُمْ لِتُحْصِنَكُمْ مِنْ بَأْسِكُمْ فَهَلْ أَنْتُمْ شَاكِرُونَ (80)

    और हमने दाऊद को तुम्हारे लिए एक ज़िरह अर्थात कवच बनाने की शैली भी सिखाई ताकि युद्ध में वह तुम्हारी रक्षा करे। तो क्या तुम आभार मानते हो? (21:80)

    यह आयत हज़रत दाऊद पर ईश्वर की एक अन्य अनुकंपा की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वे न केवल एकांत में ईश्वर की उपासना करने वाले व्यक्ति थे बल्कि कुशल योद्धा और ईश्वर के मार्ग में जेहाद करने वाले भी थे। वे शत्रु की धारदार तलवारों से अपने सिपाहियों की रक्षा के लिए कवच बनाया करते थे। ईश्वर ने उन्हें लोहे को नर्म करने की विधि सिखाई थी। वे पहले लोहे को पिघला कर नर्म कर लेते थे और फिर उसकी छोटी छोटी कड़ियां बनाते थे और अंततः उन्हें एक दूसरे में डाल कर कवच बना लेते थे। सूरए सबा की आयतों के अनुसार ईश्वर ने हज़रत दाऊद को यह सब सिखाया था और इस पर लोगों को ईश्वर का कृतज्ञ होना चाहिए था।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य द्वारा किए जाने वाले आविष्कार, ईश्वर की कृपा के कारण हैं कि वह उसके मन में नए नए विचार डालता है।

    पैग़म्बरों को संसार के साधारण काम करने में कोई समस्या नहीं थी और वे सामान्य ढंग से ही जीवन बिताया करते थे।

    सामरिक उद्योग, वर्चस्ववाद और भूविस्तार के लिए नहीं अपितु लोगों की रक्षा और शत्रु के अतिक्रमण को रोकने के लिए होना चाहिए।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 81वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَلِسُلَيْمَانَ الرِّيحَ عَاصِفَةً تَجْرِي بِأَمْرِهِ إِلَى الْأَرْضِ الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا وَكُنَّا بِكُلِّ شَيْءٍ عَالِمِينَ (81)

    और हमने तेज़ वायु को सुलैमान के वशीभूत कर दिया था, जो उनके आदेश से उस भूभाग की ओर चलती थी जिसे हमने विभूति प्रदान की थी और हम हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान रखते हैं। (21:81)

    पिछली आयत में ईश्वर ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के बारे में कहा था कि पर्वतों को उनके वशीभूत कर दिया गया था। यह आयत कहती है कि ईश्वर ने हवाओं को उनके नियंत्रण में दे दिया था ताकि वे जहां चाहें, हवा उन्हें वहां ले जाए। इस आयत से पता चलता है कि सृष्टि और उसमें मौजूद सभी वस्तुएं ईश्वर की युक्ति और उसके आदेश के अधीन हैं। न केवल यह कि वह उन पर पूर्ण नियंत्रण रखता है बल्कि अपने बंदों में से भी जिसे चाहता है उन्हें उसके वशीभूत कर देता है ताकि वे उसके आदेशों का पालन करें।

    सूरए सबा की आयतों के अनुसार हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम हवा की शक्ति द्वारा काफ़ी लम्बी यात्राएं करते थे। उस काल में जो यात्रा स्वाभाविक रूप से एक महीने में होती थी वे हवा के माध्यम से आधे दिन में पूरी कर लिया करते थे।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदे ईश्वर की अनुमति से सृष्टि के मामलों में हस्तक्षेप कर सकते हैं और सृष्टि की वस्तुओं पर नियंत्रण कर सकते हैं।

    ईश्वर सृष्टि का रचयिता है और वह उसकी हर बात से अवगत है, कोई भी वस्तु ईश्वर के ज्ञान व शक्ति की परिधि से बाहर नहीं है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की 82वीं आयत की तिलावत सुनें।

    وَمِنَ الشَّيَاطِينِ مَنْ يَغُوصُونَ لَهُ وَيَعْمَلُونَ عَمَلًا دُونَ ذَلِكَ وَكُنَّا لَهُمْ حَافِظِينَ (82)

    और जिन्नों के कई गुट (भी सुलैमान के अधीन) थेजो उसके लिए ग़ोते लगाते और इसके अतिरिक्त दूसरे काम भी किया करते थे और हम उनकी देख-रेख करने वाले थे। (21:82)

    न केवल हवा जैसी सृष्टि की वस्तुएं बल्कि जिन्नों के कई गुट भी हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के अधीन थे और उनके दरबार में काम किया करते थे। पानी में ग़ोता लगाना उनके कामों में से एक था किंतु उनकी कला केवल ग़ोता लगाने तक सीमित नहीं थी। क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतों में उनके कुछ कामों की ओर संकेत किया गया है जैसे बड़ी-बड़ी व सुन्दर इमारतें बनाना और देग तथा बड़ी बड़ी थालियों जैसे जीवन के विभिन्न साधन तैयार करना।

    यद्यपि इस आयत में उनके लिए शैतान शब्द का प्रयोग किया गया है किंतु सूरए सबा में जिन्न शब्द का भी प्रयोग हुआ है जिससे पता चलता है कि इनके बीच कोई विरोधाभास नहीं है क्योंकि शैतान भी जिन्नों में से ही हैं। जिन्न ऐसे जीव हैं जिनमें बुद्धि और विवेक होता है तथा ईश्वर की ओर से उन पर कुछ दायित्व भी अनिवार्य किए गए हैं। उनमें भी मनुष्य की भांति काफ़िर और ईमान वाले जिन्न होते हैं। शैतान, काफ़िर जिन्न होते हैं जो मनुष्यों को पथभ्रष्ट करने के प्रयास में रहते हैं।

    ईश्वर ने शैतानों को भी हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के वशीभूत कर दिया था। उन्होंने उनमें से बहुत से शैतानों को क़ैद कर दिया था जबकि कुछ अन्य को ग़ोताख़ोरी जैसे कड़े कार्य करने पर विवश किया। अतः आगे चल कर आयत कहती है कि ईश्वर इन उद्दंडी शैतानों पर दृष्टि रखता था ताकि वे हज़रत सुलैमान के आदेशों की अवहेलना न कर सकें।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्यों के अतिरिक्त जिन्नों में भी विवेक, इच्छाशक्ति और दायित्व होता है अतः उनमें भी मनुष्यों की भांति ईमान वाले व काफ़िर जिन्न होते हैं।

    कुछ पैग़म्बरों को पैग़म्बरी के अतिरिक्त शासक का पद भी प्राप्त हुआ और लोगों के सांसारिक मामलों का संचालन भी उनके ज़िम्मे था।