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    सूरए अम्बिया, आयतें 89-94, (कार्यक्रम 586)

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    आइये पहले सूरए अम्बिया की 89 और 90वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَزَكَرِيَّا إِذْ نَادَى رَبَّهُ رَبِّ لَا تَذَرْنِي فَرْدًا وَأَنْتَ خَيْرُ الْوَارِثِينَ (89) فَاسْتَجَبْنَا لَهُ وَوَهَبْنَا لَهُ يَحْيَى وَأَصْلَحْنَا لَهُ زَوْجَهُ إِنَّهُمْ كَانُوا يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا وَرَهَبًا وَكَانُوا لَنَا خَاشِعِينَ (90)

    और (हे पैग़म्बर!) ज़करिया को भी याद कीजिए जब उन्होंने अपने पालनहार को पुकारा (और कहा) हे मेरे पालनहार! मुझे अकेला (व निसंतान) न छोड़ और तू तो सबसे अच्छा वारिस है। (21:89) तो हमने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उन्हें यहया (नामक पुत्र) प्रदान किया और उनकी पत्नी को (गर्भ धारण करने के लिए) स्वस्थ कर दिया। निश्चय ही वे भले कामों में एक-दूसरे के मुक़ाबले में जल्दी करते थे। और हमें चाहत और भय के साथ पुकारते थे और हमारे सामने निरंतर विनम्र रहते थे। (21:90)

    इससे पहले हज़रत अय्यूब, इदरीस व यूनुस अलैहिमुस्सलाम जैसे ईश्वरीय पैग़म्बरों का वर्णन किया गया था। ये आयतें हज़रत ज़करिया और उनके पुत्र हज़रत यहया के जीवन की ओर संकेत करती हैं। जैसा कि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी वर्णित है, हज़रत ज़करिया बूढ़े हो चुके थे और उनकी कोई संतान नहीं थी। इसका कारण यह था कि उनकी पत्नी बांझ थीं। हज़रत ज़करिया ने ईश्वर से दुआ की कि वह उन्हें एक पुत्र प्रदान करे ताकि उनका धर्म व उनके संस्कार बाक़ी रहें और वह धर्म के प्रचार के उनके कार्य को जारी रखे।

    ईश्वर ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उनकी पत्नी के बांझपन को समाप्त कर दिया। उसने उन्हें एक पुत्र प्रदान किया जिसका नाम यहया रखा गया। आगे चल कर आयत इस ईश्वरीय परिवार की विशेषताओं का वर्णन करती है और कहती है कि वे सब के सब हर स्थिति में चाहे कड़ाई का समय हो या आराम के दिन हों, ईश्वर की उपासना और उससे दुआ करते रहते थे और वे भले कर्म करने तथा वंचितों व दरिद्रों की सहायता करने में एक दूसरे से बाज़ी मार ले जाने का प्रयास करते थे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि किसी भी स्थिति में ईश्वरीय दया की ओर से निराश नहीं होना चाहिए। हमारा दायित्व प्रार्थना करना और कठिन कार्यों को सरल बनाने की दुआ करना है यदि ईश्वर ने उचित समझा तो वह हमारी प्रार्थना को स्वीकार कर लेगा।

    अच्छा परिवार, वह परिवार है जिसके सदस्य, भले कर्मों में एक दूसरे से सहयोग करते हैं और कभी भी वंचितों को नहीं भूलते।

    ईश्वर से प्रार्थना करते समय अपनी आवश्यकता को भी बयान करना चाहिए और अपनी ग़लतियों पर क्षमा भी मांगनी चाहिए।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 91 की तिलावत सुनें।

    وَالَّتِي أَحْصَنَتْ فَرْجَهَا فَنَفَخْنَا فِيهَا مِنْ رُوحِنَا وَجَعَلْنَاهَا وَابْنَهَا آَيَةً لِلْعَالَمِينَ (91)

    और (हे पैग़म्बर!) उस महिला को भी याद कीजिए जिसने अपने सतीत्व की रक्षा की तो हमने उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे व उसके बेटे को पूरे संसार के लिए एक (बड़ी) निशानी बना दिया (21:91)

    हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से पहले के अंतिम पैग़म्बर थे। यह आयत उनके जन्म की घटना की ओर संकेत करती है और कहती है कि हज़रत मरयम अलैहस्सलाम की आत्मिक पवित्रता और उनके सतीत्व के कारण ईश्वर ने अपनी विशेष कृपा के माध्यम से उनके द्वारा हज़रत ईसा जैसे महान पैग़म्बर को अस्तित्व प्रदान किया।

    सूरए अम्बिया की ये आयतें जो ईश्वरीय पैग़म्बर का वर्णन करती हैं, अंत में हज़रत मरयम की पवित्रता एवं सतीत्व की ओर संकेत करती हैं। इसका कारण यह है कि कोई यह न सोचे कि केवल पुरुष ही ईश्वर का सामिप्य प्राप्त कर सकते हैं बल्कि महिलाओं में भी इस बात की क्षमता है कि वे ईश्वर के निकट महान स्थान प्राप्त कर लें और उसकी विशेष कृपा का पात्र बनें, यहां तक कि उनका नाम, पूरे संसार के लिए आदर्श के रूप में पैग़म्बरों के नाम के साथ वर्णित हो।

    इस आयत से हमने सीखा कि मानवीय एवं ईश्वरीय परिपूर्णताएं प्राप्त करने में महिला व पुरुष के बीच कोई अंतर नहीं है और दोनों ही उच्च मानवीय व आध्यात्मिक दर्जों तक पहुंच सकते हैं।

    माता की पवित्रता व सतीत्व उन विशेषताओं में से है जो संतान के कल्याण एवं सौभाग्य में अत्यंत प्रभावी हैं।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 92 और 93 की तिलावत सुनें।

    إِنَّ هَذِهِ أُمَّتُكُمْ أُمَّةً وَاحِدَةً وَأَنَا رَبُّكُمْ فَاعْبُدُونِ (92) وَتَقَطَّعُوا أَمْرَهُمْ بَيْنَهُمْ كُلٌّ إِلَيْنَا رَاجِعُونَ (93)

    (हे लोगो!) निश्चय ही तुम्हारा यह समुदाय एक ही समुदाय है और मैं तुम्हारा पालनहार हूँ। अतः केवल मेरी ही उपासना करो। (21:92) किन्तु लोगों ने आपस में अपने मामलों को तितर-बितर कर दिया। वे सभी हमारी ही ओर पलटने वाले हैं। (21:93)

    पिछली कुछ आयतों में कुछ ईश्वरीय पैग़म्बरों के नामों का वर्णन करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में कहता है कि सभी पैग़म्बर एक ही समुदाय थे और उन सभी का एक ही लक्ष्य था, चाहे उन्होंने समय और स्थिति के भिन्न होने के कारण अपनी अपनी जातियों के लिए विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत किए। उन सभी ने एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया तथा अनेकेश्वरवाद, कुफ़्र एवं अत्याचार से संघर्ष का आह्वान किया। वे लोगों को एक ईश्वर की उपासना का निमंत्रण देते थे और उन्हें ईश्वर के अतिरिक्त किसी भी व्यक्ति या वस्तु की उपासना से रोकते थे किंतु बहुत से लोग, उनके बताए हुए मार्ग से दूर हो गए और उनके बीच फूट पड़ गई। वे एकेश्वरवाद की आस्था के बजाए अनेकेश्वरवाद के विचारों में ग्रस्त हो कर सत्य के मार्ग से भटक गए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों का धर्म व मत एक ही था और वे सभी एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे थे।

    सभी धर्मों का संदेश, एकेश्वरवाद है और इस्लाम ने सभी धर्मों के अनुयाइयों को एकेश्वरवाद के आधार पर एकता का निमंत्रण दिया है किंतु विभिन्न धर्मों के मानने वालों ने फूट और जुदाई का मार्ग चुना है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 94 की तिलावत सुनें।

    فَمَنْ يَعْمَلْ مِنَ الصَّالِحَاتِ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَا كُفْرَانَ لِسَعْيِهِ وَإِنَّا لَهُ كَاتِبُونَ (94)

    तो जो कोई ईमान के साथ अच्छे कर्म करेगा तो उसके प्रयास की उपेक्षा नहीं होगी और हम तो उसके लिए (उसके कर्मों को) लिख ही रहे हैं। (21:94)

    ईश्वर की एक परम्परा, भले कर्मों का पारितोषिक देना है। रोचक बात यह है कि ईश्वर सद्कर्म करने वालों के संबंध में स्वयं को कृतज्ञ बताता है और कहता है कि यह मत सोचो कि मैं तुम्हारे भले कर्मों को भुला दूंगा और उन पर कृतज्ञता नहीं जताऊंगा, बल्कि मैं तुम्हारे सभी सद्कर्मों से भली भांति अवगत हूं और सही समय पर पारितोषिक दूंगा।

    क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में प्रायः सभी भले कर्म करने को ईश्वर पर ईमान के लिए अपरिहार्य बताया गया है किंतु इस आयत में कहा गया है कि यदि ईमान वाले लोग कुछ ही भले कर्म करेंगे तब भी ईश्वर उन्हें स्वीकार करेगा और उनके कर्म पत्रों में उन्हें अंकित कर देगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम सदैव ही मानवीय व नैतिक कर्मों की प्रशंसा करता है, शर्त यह है कि भले कर्म करने वाला ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए वह काम करे।

    ईश्वरीय दृष्टिकोण में कोई भी भला व लाभदायक कर्म, ईश्वर की ओर से निरुत्तर नहीं रहता, चाहे दूसरे उस पारितोषिक को न देखें और उससे अवगत न हो पाएं।