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    सूरए अम्बिया, आयतें 95-99, (कार्यक्रम 587)

    सूरए अम्बिया, आयतें 95-99, (कार्यक्रम 587)
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    आइये पहले सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 95 की तिलावत सुनें।

    وَحَرَامٌ عَلَى قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا أَنَّهُمْ لَا يَرْجِعُونَ (95)

    और जिस बस्ती को हमने विनष्ट कर दिया उसके (लोगों के) लिए असंभव है कि (वे संसार में वापस लौटें) वे कदापि वापस न लौटेंगे। (21:95)

    इससे पहले की आयतों में उन भले कर्म करने वाले मोमिनों के बारे में कहा गया कि ईश्वर उनके कर्मों को प्रलय तक अंकित करता रहता है और उनके कर्मों का संपूर्ण प्रतिफल दिया जाता है। यह आयत विपक्षी गुट की ओर संकेत करती है और कहती है कि इस संसार में पापों के कारण दंड में ग्रस्त होने वाले काफ़िर और अत्याचारी मरने के बाद इस बात की कामना करेंगे कि वे संसार में पुनः लौट जाएं किंतु काफ़िरों की और ईश्वरीय दया की वापसी वर्जित हो चुकी है और इस प्रकार की कामनाओं का कोई लाभ नहीं होगा।

    पापियों की इस कामना के संबंध में क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों में कहा गया है कि जब वे मृत्यु की निशानियों को देख लेंगे तो ईश्वर से आग्रह करेंगे कि वह उन्हें संसार में लौटा दे ताकि वे उन भले कर्मों की भरपाई कर सकें जिन्हें उन्होंने अंजाम नहीं दिया था किंतु उन्हें यही उत्तर मिलेगा कि यह बात संभव नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि जब तक हम जीवित हैं, भले कर्म करने और पिछली ग़लतियों की क्षतिपूर्ति का प्रयास करते रहें क्योंकि मरने के बाद कोई अवसर नहीं मिलेगा।

    लोक-परलोक की व्यवस्था, एक अत्यंत ठोस एवं अभेद व्यवस्था है जिससे दूर भागना संभव नहीं है।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 96 और 97 की तिलावत सुनें।

    حَتَّى إِذَا فُتِحَتْ يَأْجُوجُ وَمَأْجُوجُ وَهُمْ مِنْ كُلِّ حَدَبٍ يَنْسِلُونَ (96) وَاقْتَرَبَ الْوَعْدُ الْحَقُّ فَإِذَا هِيَ شَاخِصَةٌ أَبْصَارُ الَّذِينَ كَفَرُوا يَا وَيْلَنَا قَدْ كُنَّا فِي غَفْلَةٍ مِنْ هَذَا بَلْ كُنَّا ظَالِمِينَ (97)

    यहाँ तक कि जब याजूज और माजूज (के लिए मार्ग) खोल दिए जाएँ और वे हर ऊँची जगह से निकल पड़ें (और आक्रमण करने लगें।) (21:96) और सच्चा वादा निकट आ जाए तो काफ़िरों की आँखें फटी रह जाएंगी (और वे कहेंगे) हाय हमारा दुर्भाग्य! हम इस (दिन) की ओर से निश्चेत रहे बल्कि हम ही अत्याचारी थे। (21:97)

    इस संसार की समाप्ति और प्रलय के आरंभ होने का चिन्ह, उस बांध का टूटना है जिसे ज़ुलक़रनैन ने बनाया था और उसके माध्यम से याजूज व माजूज नामक जाति के आक्रमण को रोका गया था। सूरए कहफ़ की आयत क्रमांक 98 और 99 में कहा गया कि यह जाति अन्य क्षेत्रों पर आक्रमण करके उन्हें तबाह कर देती थी। यहां तक कि ज़ुलक़रनैन ने उनके क्षेत्र के सामने इस्पात की एक बहुत ऊंची दीवार बना कर उनके आक्रमण को रोक दिया। उन्होंने इस दीवार का निर्माण पूरा होने पर कहा था कि जब मेरे पालनहार का वादा पूरा होने का समय निकट आएगा तो यह बांध टूट जाएगा और उसी दिन सूर फूंका जाएगा तथा सभी लोगों को एकत्रित कर दिया जाएगा।

    ये आयतें भी कहती हैं कि संसार का समय इसी प्रकार से गुज़रता रहेगा, यहां तक कि याजूज व माजूज नामक जाति पूरे विश्व में फैल जाएगी और इस जाति के लोग हर ऊंचे स्थान से तेज़ी से गुज़र कर लोगों पर आक्रमण करने लगेंगे। सूर फूंके जाने और संसार की समाप्ति की घोषणा के बाद काफ़िर इस प्रकार से भय व आतंक में ग्रस्त होंगे कि उनकी आंखें फटी रह जाएंगी, घमंड एवं निश्चेतना के पर्दे हट जाएंगे और वे चिल्ला-चिल्ला कर कहेंगे कि क्यों हम इस दिन की ओर से निश्चेत थे और क्यों हमने पैग़म्बरों और ईमान वालों की बातों का परिहास किया था? इस प्रकार वे अपने पापों को स्वीकार करेंगे और स्वयं को अत्याचारी बताएंगे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पाश्विक जातियों का आक्रमण, संसार की समाप्ति और प्रलय के आरंभ की निशानियों में से है।

    सत्य के इन्कार और कुफ़्र का मुख्य कारण निश्चेतना व अनभिज्ञता है और प्रलय के दिन काफ़िर इस वास्तविकता को स्वीकार करेंगे किंतु तब कोई लाभ नहीं होगा।

    आइये अब सूरए अम्बिया की आयत क्रमांक 98 और 99 की तिलावत सुनें।

    إِنَّكُمْ وَمَا تَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ حَصَبُ جَهَنَّمَ أَنْتُمْ لَهَا وَارِدُونَ (98) لَوْ كَانَ هَؤُلَاءِ آَلِهَةً مَا وَرَدُوهَا وَكُلٌّ فِيهَا خَالِدُونَ (99)

    निश्चय ही तुम और जिनकी तुम अल्लाह को छोड़कर उपासना करते हो नरक का ईंधन बनोगे और उसमें प्रविष्ट होगे। (21:98) यदि ये (मूर्तियां) पूज्य होतीं तो नरक में प्रविष्ट न होतीं किंतु वे सब सदैव उसमें रहेंगे। (21:99)

    जो लोग प्रलय में अपने कुफ़्र व अत्याचार को स्वीकार करेंगे तो उनकी इस स्वीकारोक्ति का उन्हें कोई लाभ नहीं होगा और वे नरक में जाने से और उसके दंड में ग्रस्त होने से बच नहीं पाएंगे। न केवल वे बल्कि उनके काल्पनिक देवता भी नरक में जाएंगे और ईंधन के टुकड़ों की भांति नरक की आग में डाले जाएंगे।

    पत्थर व लकड़ी की निर्जीव प्रतिमाएं उनके साथ खड़ी होंगी ताकि उन्हें पता चल जाए कि वे भी उनके लिए कुछ नहीं कर सकतीं और उनकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है जबकि अनेकेश्वरवादी, इस संसार में उन मूर्तियों की इस लिए उपासना करते थे कि वे उन्हें मुक्ति दिलाएंगी और उनकी सुरक्षा करेंगी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पापियों का शरीर नरक की आग को और अधिक भड़का देगा।

    अत्याचारी लोग इतने महत्वहीन होते हैं कि प्रलय के दिन उनके साथ लकड़ी व अन्य जड़ वस्तुओं की भांति व्यवहार किया जाएगा।