islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आराफ़, आयतें 1-5, (कार्यक्रम 232)

    सूरए आराफ़, आयतें 1-5, (कार्यक्रम 232)

    Rate this post

    अब हम क़ुरआने मजीद के सातवें सूरे की व्याख्या आरंभ करेंगे जिसका नाम सूरए आराफ़ है, तो पहले इस सूरे की पहली और दूसरी आयतों की तिलावत सुनते हैं।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ المص (1) كِتَابٌ أُنْزِلَ إِلَيْكَ فَلَا يَكُنْ فِي صَدْرِكَ حَرَجٌ مِنْهُ لِتُنْذِرَ بِهِ وَذِكْرَى لِلْمُؤْمِنِينَ (2)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। अलिफ़ लाम मीम साद (7:1) (हे पैग़म्बर) यह किताब आपकी ओर उतारी गयी है तो आप के सीने में इस ओर से (कोई संदेह और) संकोच न हो ताकि आप इसके द्वारा लोगों को (ईश्वर से) डराएं और यह किताब ईमान वालों के लिए नसीहत है। (7:2)आराफ़ प्रलय में, स्वर्ग और नरक की ही भांति एक ठिकाने का नाम है। लोगों का एक गुट यहीं रहेगा। इस सूरे की 46वीं और 48वीं आयत में इस गुट का नाम लिया गया है अतः यह सूरा आराफ़ के नाम से जाना जाता है। क़ुरआने मजीद के 114 सूरों में से 29 सूरों का आरंभ हुरूफ़े मुक़त्तेआत से होता है जिनमें सूरे आराफ़ भी है।जैसा कि हमने सूरए बक़रह की व्याख्या आरंभ करते समय कहा था कि हुरूफ़े मुक़त्तेआत, ईश्वर और पैग़म्बर के बीच रहस्य हैं और विश्वास है कि इमाम महदी अलैहिस्सलाम के आने के बाद इस रहस्य से पर्दा उठ जाएगा और इसका अर्थ स्पष्ट हो जाएगा परंतु जो बात विदित रूप से प्रतीत होती है वह यह है कि ईश्वर कहना चाहता है कि मैंने क़ुरआन को इन्हीं अक्षरों से बनाया है, न मैं कोई नई भाषा लाया हूं न कोई नए अक्षर बल्कि मैंने अरबी के इन्हीं साधारण अक्षरों से ऐसी किताब बना दी है कि तुम ऐसी किताब लाने में सक्षम नहीं हो।दूसरी आयत इस बात की ओर संकेत करते हुए कहती है कि हे पैग़म्बर! निसंदेह यह किताब ईश्वर की ओर से आपके पास आई है और इसकी सारी बातें सत्य हैं। काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों द्वारा इसे अस्वीकार किए जाने के कारण आप इसमें संदेह न करें और अन्य मानसिक दबावों का शिकार न हों क्योंकि आपका दायित्व केवल लोगों को डराने के लिए उन तक ईश्वर की बात पहुंचाना है, इसके अतिरिक्त आपका कोई कर्तव्य नहीं है। लोगों को भी इस बात का अधिकार है कि चाहें तो आप की बात स्वीकार करें, चाहें तो न मानें।इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार और ईश्वर के मार्ग पर लोगों को आमंत्रित करने के लिए उदारता और सहनशक्ति की आवश्यकता होती है।पैग़म्बरों का दायित्व, लोगों को ईश्वर से डराना और सचेत करना है न कि ईमान लाने पर उन्हें विवश करना।आइये अब सूरए आराफ़ की तीसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।اتَّبِعُوا مَا أُنْزِلَ إِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ وَلَا تَتَّبِعُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِيَاءَ قَلِيلًا مَا تَذَكَّرُونَ (3)जो कुछ तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे पास भेजा गया है उसका अनुसरण करो और उसके अतिरिक्त किसी को अभिभावक मान कर अनुसरण न करो कि तुम बहुत कम नसीहत मानते हो। (7:3)पिछली आयत में लोगों को ईश्वर से डराने के संबंध में पैग़म्बर के दायित्व का वर्णन किया गया था। यह आयत क़ुरआन को स्वीकार करने के संबंध में लोगों के दायित्व का वर्णन करती है क्योंकि पैग़म्बर के पास आने वाला क़ुरआन वस्तुतः लोगों के लिए आया है और पैग़म्बर केवल इसके माध्यम और व्याख्याकार हैं।एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह आयत, क़ुरआन का अनुसरण करने की सिफ़ारिश के साथ ही मनुष्य को अन्य लोगों की पद्धति के पालन से रोकती है, दूसरे शब्दों में यह आयत सत्य और कल्याण के मार्ग को ईश्वरीय किताब के अनुसरण में सीमित समझती है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय अभिभावक्ता का आवश्यक अंश, मनुष्य के कल्याण और मार्गदर्शन के लिए, आवश्यक आदेशों का भेजा जाना है।जो ईश्वर को अपना मालिक स्वीकार नहीं करता वो अनेक लोगों को अपना मालिक स्वीकार कर लेता है और एक ईश्वर को स्वयं से राज़ी व प्रसन्न करने के स्थान पर अनेक अभिभावकों को स्वयं से राज़ी करने पर विवश होता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत नंबर चार और पांच की तिलावत सुनते हैं।وَكَمْ مِنْ قَرْيَةٍ أَهْلَكْنَاهَا فَجَاءَهَا بَأْسُنَا بَيَاتًا أَوْ هُمْ قَائِلُونَ (4) فَمَا كَانَ دَعْوَاهُمْ إِذْ جَاءَهُمْ بَأْسُنَا إِلَّا أَنْ قَالُوا إِنَّا كُنَّا ظَالِمِينَ (5)और कितनी ही बस्तियां हैं जिन्हें हमने (उनके कुफ़्र के चलते) तबाह कर दिया। उन पर हमारा दंड रात को सोते समय या दिन में आराम करते समय आ पहुंचा। (7:4) फिर हमारा दंड आने के पश्चात उनकी पुकार इसके अतिरिक्त कुछ न थी कि निसंदेह हम अत्याचारी थे। (7:5)क़ुरआन और ईश्वरीय धर्म के अनुसरण की आवश्यकता पर पिछली आयतों में बल देने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है। लोगों के मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बरों ने जो कष्ट उठाए और इस मार्ग में जितनी कठिनाइयां सहन कीं उन सबके बावजूद कम ही लोग हैं जिन्होंने उनकी बात को स्वीकार किया और सीधे मार्ग पर आ गये हैं।यही कारण है कि मानव समाज में अत्याचार, द्वेष और अवज्ञा का प्रचलन हो गया जिसके चलते कभी कभी उन्हें दंड भी भुगतना पड़ता है। यद्यपि कर्मों पर असली दंड या पारितोषिक प्रलय में दिया जाएगा परंतु अन्य लोगों पर अत्याचार करने जैसे कुछ पाप ऐसे होते हैं जिन पर संसार में भी दंड दिया जाता है। और यह ऐसा दंड है जो दिन रात में कभी भी आ सकता है। यह दंड सोते में भी आ सकता है। ऐसे समय में मनुष्य को चेतना आ जाती है और वह स्वीकार करता है कि उसने अत्याचार किया था और वह इस दंड का योग्य है।यद्यपि उसकी इस चेतना और स्वीकारोक्ति का कोई लाभ नहीं है और उसे मुक्ति नहीं मिलेगी परंतु यह बात दूसरों के लिए सीख बन सकती है। सरकारों और उनके अत्याचारी शासकों के इतिहास का संक्षेप में अध्ययन करने से हमें ज्ञात हो जाता है कि ईरान और रोम जैसे बड़े साम्राज्य, जनता पर अत्याचार के कारण, विघटित हो गये और उनके स्थान पर दूसरे शासन आ गये।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय दंड प्रलय से विशेष नहीं है कि हम संसार में स्वयं को सुरक्षित समझें। पापी समाजों को विभिन्न रूपों में ईश्वरीय दंड की प्रतीक्षा करनी चाहिए।दंडित होने और अपने पापों की स्वीकारोक्ति से पूर्व हमें ईश्वर के दरबार में तौबा व प्रायश्चित द्वारा, दंड को भी रोकना चाहिए और ईश्वरीय दया का पात्र भी बनना चाहिए।