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    सूरए आराफ़, आयतें 103-108, (कार्यक्रम 255)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 103 की तिलावत सुनते हैं।ثُمَّ بَعَثْنَا مِنْ بَعْدِهِمْ مُوسَى بِآَيَاتِنَا إِلَى فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَظَلَمُوا بِهَا فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ (103)फिर उनके पश्चात हमने मूसा को फ़िरऔन तथा उसके सरदारों के पास अपनी निशानियों के साथ भेजा (परंतु) उन्होंने हमारी निशानियों (का इन्कार करते हुए उन) के साथ अत्याचार किया तो देखो कि बुराई फैलाने वालों का परिणाम क्या हुआ? (7:103)सूरए आराफ़ के आरंभ से लेकर अब तक की आयतों में हज़रत हूद, हज़रत सालेह हज़रत शुऐब और हज़रत लूत अलैहिमुस्सलाम जैसे पैग़म्बरों की घटनाओं का वर्णन किया गया। यह आयत कहती है कि इन पैग़म्बरों के पश्चात ईश्वर ने हज़तर मूसा अलैहिस्सलाम को पैग़म्बर बनाया और प्रथम चरण में उन्हें फ़िरऔन तथा बनी इस्राईल के सरदारों के मार्गदर्शन का दायित्व सौंपा। यद्यपि इस काम के लिए हज़रत मूसा के पास स्पष्ट निशानियां और चमत्कार थे जो पैग़म्बरी के उनके दावे की सत्यता को सिद्ध करते थे परंतु फ़िरऔन और उसके साथियों ने न केवल हज़रत मूसा की बात स्वीकार नहीं की बल्कि अपने तर्कहीन और हठधर्मी व्यवहार द्वारा उन पर और उनकी निशानियों पर अत्याचार किया और उसी प्रकार बुराइयों में डूबे रहे।क़ुरआने मजीद में हज़रत मूसा का नाम 136 बार आया है। क़ुरआन के विभिन्न सूरों में उनके जन्म, बचपन, मिस्र से मदयन पलायन, पैग़म्बर बनने, फ़िरऔन के साथ उनके व्यवहार, फ़िरऔन के चंगुल से बनी इस्राईल को मुक्ति दिलाने तथा बनी इस्राईल के साथ उनके व्यवहार का विस्तार से वर्णन किया गया है।इस आयत से हमने सीखा कि अत्याचारियों और बुराई फैलाने वालों से संघर्ष, ईश्वरीय पैग़म्बरों का सबसे पहला कार्यक्रम रहा है क्योंकि समाज में सुधार के लिए मुख्य लोगों को ही पकड़ना चाहिए।अत्याचारियों की अस्थाई सरकारों की चमक-दमक से हमारी आंखें चकाचौंध न हो जाए क्योंकि महत्त्वपूर्ण बात अच्छा अंत है न कि उनकी वर्तमान चमक-दमक।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 104 और 105 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ مُوسَى يَا فِرْعَوْنُ إِنِّي رَسُولٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَمِينَ (104) حَقِيقٌ عَلَى أَنْ لَا أَقُولَ عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ قَدْ جِئْتُكُمْ بِبَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّكُمْ فَأَرْسِلْ مَعِيَ بَنِي إِسْرَائِيلَ (105)और मूसा ने कहा कि हे फ़िरऔन! निसंदेह मैं ब्रह्मांड के पालनहार का पैग़म्बर हूं। (7:104) मेरे लिए आवश्यक है कि ईश्वर के बारे में सत्य के अतिरिक्त कुछ न कहूं। निसंदेह मैं तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए स्पष्ट निशानियां और तर्क लाया हूं तो बनी इस्राईल को मेरे साथ भेज दे। (7:105)फ़िरऔन दावा करता था कि वह संसार का पालनहार है। वह कहता था कि मैं तुम्हारा बड़ा पालनहार हूं। अतः हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बर बनने के पश्चात उससे अपनी पहली भेंट में कहा कि मैं ब्रहमांड के पालनहार की ओर से आया हूं। मैं जो कुछ कहता हूं वह उसकी ओर से है। मेरे इस दावे का प्रमाण वह चमत्कार है जिन्हें तुम देख रहे हो, यह सब उसी की ओर से है। हे फ़िरऔन अत्याचार करना छोड़ दे और बनी इस्राईल को स्वतंत्र कर दे ताकि ये लोग मेरे साथ रहें और स्वेच्छा से काम करें।इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य के अतिरिक्त पैग़म्बर कोई बात नहीं करते थे और इस मार्ग में वे किसी भी अत्याचारी से नहीं घबराते थे।अत्याचारियों के चंगुल से लोगों को स्वतंत्र कराना, पैग़म्बरों के सबसे महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों में से एक है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 106 और 107 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ إِنْ كُنْتَ جِئْتَ بِآَيَةٍ فَأْتِ بِهَا إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ (106) فَأَلْقَى عَصَاهُ فَإِذَا هِيَ ثُعْبَانٌ مُبِينٌ (107)फ़िरऔन ने कहा कि यदि तुम सच्चों में से हो और अपने साथ चमत्कार लाए हो तो उसे प्रस्तुत करो। (7:106) तो मूसा ने अपनी लाठी (धरती पर) फेंक दी तो सहसा वह एक अजगर बन गई। (7:107)फ़िरऔन और उसके सरदारों ने पहले चरण में कहा कि मूसा की परीक्षा ली जाए शायद वे चमत्कार पेश न कर सकें, इस प्रकार यदि उनका दावा झूठा हुआ तो वह स्वयं अपमानित हो जाएंगे और यदि वे चमत्कार प्रस्तुत कर देते हैं तो हम उन पर जादू- टोने का आरोप लगाएंगे। अतः उन्होंने हज़रत मूसा से कहा कि यदि तुम सच्चे हो तो चमत्कार दिखाओ। हज़रत मूसा ने ईश्वर के आदेश पर पर अपनी लाठी फेंकी और वह एक बड़े अजगर का रूप धारण कर गई।अलबत्ता इससे पूर्व यह लाठी स्वयं हज़रत मूसा के सामने छोटे से सांप के रूप में प्रकट हो चुकी थी ताकि वे फ़िरऔन के सामने भयभीत न हो जाएं। इसी प्रकार जिस दिन फ़िरऔन के जादूगरों ने हज़रत मूसा को अपमानित करना चाहा था, यह लाठी एक बड़े से सांप के रूप में आ गई थी जिसने जादूगरों के सभी झूठे सांपों को निगल लिया और फिर अपने वास्तविक रूप में आ गई।यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी से कुछ अन्य चमत्कार भी प्रकट हुए हैं। सूखा पड़ने पर हज़तर मूसा ने इस लाठी को एक पत्थर पर मारा तो उससे बारह सोते प्रवाहित हो गए या जब हज़रत मूसा ने इस लाठी को नील नदी के पानी पर मारा तो नदी का पानी दो भागें में विभाजित हो गया और पानी के भीतर की धरती प्रकट हो गई तथा हज़रत मूसा अपने साथियों के साथ उस पर से गुज़र गये और नदी का पानी फिर एक हो गया।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय चमत्कार, पैग़म्बरी का प्रमाण है और पैग़म्बरों को चमत्कार प्रस्तुत करना चाहिए चाहे उन्हें यह ज्ञात हो कि फ़िरऔन जैसे लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे।पैग़म्बरों के चमत्कार उनके काल के ज्ञान के अनुकूल होते थे। जिस का ल में जादू होने का अत्याधिक चलन था, उस काल में हज़रत मूसा का चमत्कार जादू-टोने के समान परंतु वास्तविकता लिए हुए था।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 108 की तिलावत सुनते हैं।وَنَزَعَ يَدَهُ فَإِذَا هِيَ بَيْضَاءُ لِلنَّاظِرِينَ (108)और मूसा ने अपने हाथ को (वस्त्र से) बाहर निकाला तो सहसा ही वह देखने वालों के लिए अत्यंत सफ़ेद और चमकदार था। (7:108)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन के दरबार में जो दूसरा चमत्कार दिखायसा वह अपने हाथ को अत्यंत चमकदार बनाना था। इस प्रकार से कि उन्होंने अपने हाथ को अपनी जेब में डाला और जब उसे बाहर निकाला तो सूर्य की भांति चमक रहा था। यह देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए।जी हां, ईश्वर के पैग़म्बर ऐसे ही होते हैं। वे लाठी से अजगर में परिवर्तित होने वाले भयानक चमत्कार के साथ ही आशा और शुभ समाचार का प्रकाश भी लोगों के हृदयों पर डालते हैं ताकि भय के साथ ही साथ लोगों को ईश्वर की दया की ओर से आशावान रखें।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के प्रचारक को सही कथन और तर्क के साथ शक्ति और दया के साधनों से भी लैस होना चाहिए ताकि आवश्यक अवसरों पर उनका प्रयोग कर सकें, कभी ईश्वर के कोप को दिखाए तो कभी ईश्वर की दया को।