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    सूरए आराफ़, आयतें 11-15, (कार्यक्रम 234)

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    आइये सूरए आराफ़ की 11वीं और 12वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ خَلَقْنَاكُمْ ثُمَّ صَوَّرْنَاكُمْ ثُمَّ قُلْنَا لِلْمَلَائِكَةِ اسْجُدُوا لِآَدَمَ فَسَجَدُوا إِلَّا إِبْلِيسَ لَمْ يَكُنْ مِنَ السَّاجِدِينَ (11) قَالَ مَا مَنَعَكَ أَلَّا تَسْجُدَ إِذْ أَمَرْتُكَ قَالَ أَنَا خَيْرٌ مِنْهُ خَلَقْتَنِي مِنْ نَارٍ وَخَلَقْتَهُ مِنْ طِينٍ (12)और निसंदेह हमने तुम्हारी रचना की, फिर तुम्हारे चेहरे बनाए, फिर फ़रिश्तों से कहा कि आदम को सज्दा करो तो सबने सज्दा किया सिवाए इब्लीस के जो सज्दा करने वालों में न था। (ईश्वर ने) कहाः किस चीज़ ने तुझे रोका कि तूने मेरे आदेश के बाद भी सज्दा न किया? (7:11) शैतान ने कहाः मैं उससे उत्तम हूं, तूने मुझे आग से बनाया है जबकि उसे मिट्टी से बनाया है। (7:12)इससे पहले धरती में ईश्वर की अनुकंपाओं और मनुष्य द्वारा उनसे लाभान्वित होने की ओर संकेत किया गया था। यह आयतें सृष्टि के आरंभ में मनुष्य के स्थान की ओर संकेत करते हुए कहती हैं। न केवल धरती बल्कि आकाश वाले और फ़रिश्ते भी मनुष्य के समक्ष नतमस्तक हैं। मनुष्य की श्रेष्ठता यहां तक है कि ईश्वर ने अपने फ़रिश्तों को आदेश दिया कि वे आदम अलैहिस्सलाम को सज्दा करें। इस बीच केवल इब्लीस ने ईश्वर के इस आदेश की उद्दंडता की। वह फ़रिश्तों के साथ रहता था किन्तु फ़रिश्ता न था।क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों से पता चलता ह कि इब्लीस जिन्न था परंतु ईश्वर की अत्यधिक उपासना के कारण फ़रिश्तों की पंक्ति में आ गया था अतः ईश्वर के संबोधन का पात्र वह भी था।इब्लीस ने न केवल यह कि अपनी इस उद्दंडता के कारण क्षमा नहीं मांगी और न ही उसे पछतावा हुआ बल्कि उसने अपनी इस उद्दंडता का औचित्य दर्शाया और कहा कि हे ईश्वर! तूने मुझे आग से बनाया है जबकि आदम को मिट्टी से, तथा आग को मिट्टी पर श्रेष्ठता प्राप्त है। जबकि आदम को सज्दा करने का ईश्वरीय आदेश उनकी भौतिक रचना के आधार पर नहीं था कि इब्लीस इस प्रकार का दावा करता बल्कि ईश्वर का आदेश आदम की आध्यात्मिक श्रेष्ठता और उनमें ईश्वरीय आत्मा के फूंके जाने के कारण था।मूल रूप से ईश्वर के स्पष्ट आदेश के मुक़ाबले में किसी भी प्रकार के बहाने, अनुमान और तर्क का कोई स्थान नहीं है। मानो इब्लीस ये कहना चाहता था कि मैं ईश्वर से बेहतर समझता हूं, और उसने मुझे आदम के सज्दे का आदेश देकर ग़लती की है। खेद की बात है कि हम भी, ईश्वरीय आदेशों के मुक़ाबले में कभी कभी चाहते हैं कि अपनी बुद्धि के मानदंड के अनुसार किसी आदेश को स्वीकार करें और किसी को रद्द कर दें जबकि धर्म के अनेक आदेशों की तत्वदर्शिता हमारी सीमित बुद्धि में नहीं समा सकती। अतः बंदगी का आदेश है कि पालन किया जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य में ऐसे स्थान तक पहुंचने की क्षमता और योग्यता है कि फ़रिश्ते उसे सज्दा करें।जब ईश्वर के आदेश पर सभी फ़रिश्तों ने मनुष्य को सज्दा किया तो हमें भी ईश्वर को सज्दा करना चाहिए तथा उसके आदेशों की अवहलेना नहीं करनी चाहिए।जाति और मूल, श्रेष्ठता का तर्क नहीं हो सकता जिस प्रकार से कि आयु और अनुभव भी वरीयता का कारण नहीं है। मानदंड, ईश्वर के आदेशों का पालन है।मनुष्य, ऐसे शैतान का अनुसरण क्यों करे जो मनुष्य को सज्दा करने के लिए तैयार नहीं हुआ।आइये अब सूरए आराफ़ की 13वीं आयत की तिलावत सुनते हैंقَالَ فَاهْبِطْ مِنْهَا فَمَا يَكُونُ لَكَ أَنْ تَتَكَبَّرَ فِيهَا فَاخْرُجْ إِنَّكَ مِنَ الصَّاغِرِينَ (13)(ईश्वर ने इब्लीस से) कहाः यहां से उतर जा कि तुझे यहां घमंड करने का अधिकार नहीं है, तो निकल जा कि निसंदेह तू अपमानित लोगों में से है। (7:13)यह आयत, शैतान की उद्दंडता के मुख्य कारण के रूप में अहं और घमंड का उल्लेख करते हुए कहती है। शैतान ने हज़ारों वर्षों तक ईश्वर की उपासना करके जो स्थान प्राप्त किया था, वह उसकी एक उद्दंडता से उसके हाथ से निकल गया। ईश्वर ने उसे फ़रिश्तों की पंक्ति से बाहर निकाल दिया और कहा कि तेरे इस घमंड का दंड, अपमान है।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम कहते हैं कि जो कोई विनम्रता अपनाता है, ईश्वर उसे उच्च स्थान प्रदान करता है और जो कोई अहं और घमंड से काम लेता है ईश्वर उसे अपमानित और तुच्छ बना देता है। प्रलय में ऐसा व्यक्ति लोगों के पैरों से रौंदा जाएगा।इस आयत से हमने सीखा कि केवल ज्ञान और उपासना से मुक्ति प्राप्त नहीं होती, ईश्वर का आज्ञापालन भी आवश्यक है। शैतान ईश्वर को पहचानता भी था और उसकी उपासना भी करता था, परंतु ईश्वर के आदेशों के संपूर्ण पालन के लिए तैयार न था।अहं व घमंड मनुष्य के सभी भले कर्मों की तबाही का कारण बनता है और मनुष्य को तबाही के मुंहाने तक ले जाता है।आइये अब सूरए आराफ़ की 14वीं और 15वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।قَالَ أَنْظِرْنِي إِلَى يَوْمِ يُبْعَثُونَ (14) قَالَ إِنَّكَ مِنَ الْمُنْظَرِينَ (15)(इब्लीस ने तौबा और प्रायश्चित के स्थान पर) कहाः मुझे उस समय तक की मोहलत दे जब लोग (मृत्यु के पश्चात) उठाए जाएंगे। (7:14) ईश्वर ने कहाः तू मोहलत पाने वालों में से है। (7:15)ईश्वर के दरबार से इब्लीस के निकाले जाने के पश्चात उसने ईश्वर से कहा कि उसे प्रलय तक जीवित रहने की मोहलत दी जाए। ईश्वर ने उसकी यह बात स्वीकार कर ली और उसे प्रलय से पहले कुछ निर्धारित समय तक का जीवन प्रदान कर दिया।यहां पर यह प्रश्न सामने आया है कि ईश्वर ने शैतान को क्यों मोहलत दी? इसके उत्तर में कहना चाहिए कि दंड और पारितोषिक का आधार प्रलय है। ईश्वर सभी पापियों को उनके सभी पापों और अपराधों के साथ मोहलत देता है। ऐसा नहीं है कि जो कोई बड़ा पाप या अपराध करे उसे ईश्वर तत्काल मार दे या दंडित करे।इसके अतिरिक्त मनुष्य की परीक्षा के संबंध में ईश्वर की परंपरा के आधार पर सदैव भलाई और बुराई के साधनों को एक साथ होना चाहिए ताकि अधिकार का अर्थ पूरा हो सके। शैतान, मनुष्यों की परीक्षा का एक साधन है।अलबत्ता शैतान किसी को भी पाप पर विवश नहीं करता बल्कि उसका काम पाप के लिए उकसाना और पाप का मार्ग प्रशस्त करना है। मनुष्य का अधिकार कभी भी उसके हाथ से नहीं जाता।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पापियों को मोहलत देता है। भाग्यशाली हैं वे लोग जो तौबा और प्रायश्चित करके इस मोहलत और अवसर से लाभ उठाते हैं। अपने पापों में वृद्धि नहीं करते।हर लम्बी आयु मूल्यवान नहीं होती। शैतान की भी बड़ी लम्बी आयु है। अपनी लम्बी आयु से लाभ उठाना महत्त्वपूर्ण होता है।इब्लीस प्रलय को समझता था परंतु ईश्वर और प्रलय पर उसे ईमान नहीं था अतः उसने तौबा और प्रायश्चित का विचार नहीं किया।