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    सूरए आराफ़, आयतें 117-123, (कार्यक्रम 257)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 117 और 118 की तिलावत सुनते हैं।وَأَوْحَيْنَا إِلَى مُوسَى أَنْ أَلْقِ عَصَاكَ فَإِذَا هِيَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ (117) فَوَقَعَ الْحَقُّ وَبَطَلَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (118)और हमने मूसा पर वहि की (अर्थात उनके पास अपना विशेष संदेश भेजा) कि अपनी लाठी को फेंक दो तो सहसा ही (लाठी अजगर बन गई और) उसने जादूगरों के जादू के सभी झूठे सांपों को निगल लिया। (7:117) तो सत्य सिद्ध हो गया और जो कुछ जादूगर करते थे वह झूठ हो गया। (7:118)पिछली आयतों की समीक्षा के दौरान हमने बताया था कि फ़िरऔन ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अपमानित करने के लिए पूरे मिस्र से जादूगरों को एकत्रित करने का आदेश दिया ताकि लोगों के सामने जादूगरों और हज़रत मूसा के बीच मुक़ाबला हो। अपने विचार में फ़िरऔन इस प्रकार के कार्य से हज़रत मूसा को पराजित करना चाहता था।जादूगर एक बड़े पारितोषिक की आशा में फ़िरऔन के दरबार में उपस्थित हुए। मुक़ाबले वाले दिन उन्होंने अपने जादू का प्रदर्शन करते हुए अपने साधन ज़मीन पर फेंके जो अचानक ही लोगों को छोटे-बड़े सांपों के रूप में दिखाई दिए, लोग भयभीत हो गए परंतु हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम यद्यपि अकेले थे किन्तु उन्होंने ईश्वर पर भरोसा रखा और डटे रहे और फिर ईश्वर के आदेश से अपनी लाठी ज़मीन पर फेंक दी।यह आयतें कहती हैं कि हज़रत मूसा की लाठी, वास्तविक अजगर बन गई और उसने जादूगरों के सभी साधनों को निगल लिया। इस प्रकार सत्य विजयी हुआ और असत्य को पराजय हुई।इन आयतों से हमने सीखा कि असत्य विभिन्न स्वांग भर कर धोखा देना चाहता है किन्तु सत्य का केवल एक जलवा, असत्य के हज़ारों स्वांगों को मिट्टी में मिला सकता है।अंततः सत्य ही विजयी और असत्य पराजित तथा समाप्त होता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 119 और 120 की तिलावत सुनते हैंفَغُلِبُوا هُنَالِكَ وَانْقَلَبُوا صَاغِرِينَ (119) وَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سَاجِدِينَ (120)तो सबके सब पराजित हो गए और अपमानित होकर पलट आए। (7:119) और सारे के सारे जादूगर सज्दे में गिर पड़े। (7:120)जादूगरों की पराजय और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की विजय से फ़िरऔन की साख को काफ़ी धक्का लगा। फ़िरऔन ने जो यह चाह रहा था कि मुक़ाबले में मूसा को पराजित करवाके, लोगों पर उन पर ईमान लाने से रोक दे, साहसा ही यह देखा कि उसके जादूगर भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आए हैं और उनके ईश्वर के समक्ष नतमस्तक हैं।वह जादूगर जो सोने के कुछ सिक्कों के लोभ में फ़िरऔन के दरबार में आए थे, अब सब कुछ भूल कर वास्तविक ईश्वर के समक्ष सज्दे में गिर पड़े थे और हज़रत मूसा के साथ हो गए थे।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि मनुष्य में द्वेष और हठधर्म न हो तो वह सत्य को समझते ही उसे स्वीकार कर लेता है।सत्य के प्रति समर्पित होने की सबसे स्पष्ट निशानी सज्दा है।अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 121, 122 और 123 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا آَمَنَّا بِرَبِّ الْعَالَمِينَ (121) رَبِّ مُوسَى وَهَارُونَ (122) قَالَ فِرْعَوْنُ آَمَنْتُمْ بِهِ قَبْلَ أَنْ آَذَنَ لَكُمْ إِنَّ هَذَا لَمَكْرٌ مَكَرْتُمُوهُ فِي الْمَدِينَةِ لِتُخْرِجُوا مِنْهَا أَهْلَهَا فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ (123)जादूगरों ने कहा कि हम ब्रह्ममांड के पालनहार पर ईमान लाए। (7:121) जो मूसा व हारून का पालनहार है। (7:122) फ़िरऔन ने कहा कि क्या तुम मेरी अनुमति के बिना ही उस पर ईमान ले आए। निसंदेह यह तुम्हारी चाल है जो तुम नगर में चल रहे हो ताकि लोगों को नगर से बाहर निकाल सको तो शीघ्र ही तुम्हें (इसके परिणाम का) ज्ञान हो जाएगा। (7:123)हमने बताया कि मिस्र के जादूगर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ईश्वरीय चमत्कार के समक्ष नतमस्तक हो गए और उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उनका काम जादू-टोना नहीं है बल्कि वस्तुतः एक ईश्वरीय चमत्कार है। अतः उन्होंने सज्दे से उठकर फ़िरऔन तथा सभी लोगों के सामने घोषणा की कि हज़रत मूसा ईश्वर के पैग़म्बर हैं और हम उनके ईश्वर पर कि जो समस्त ब्रह्मांड का पालनहार है, ईमान लाते हैं।फ़िरऔन ने जिसे इस बात की बिल्कुल अपेक्षा नहीं थी, उन लोगों पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ सांठगांठ का आरोप लगाया और कहा कि तुम लोगों ने मूसा के साथ मिलकर इस काम की योजना बनाई थी अतः तुम भी मूसा के अपराध में सहभागी हो।फ़िरऔन ने उन लोगों पर सत्ता लोलुपता का आरोप लगाते हुए कहा कि तुम मुझे सत्ता से हटाकरर स्वयं सत्ता में आना और हमें इस देश से निकालना चाहते थे परंतु जान लो कि तुम्हारा मुक़ाबला फ़िरऔन से है और मैं तुम्हें कदापि ऐसा नहीं करने दूंगा बल्कि तुम्हें इस प्रकार दंडित करूंगा कि दूसरे उससे पाठ लेंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य विवश नहीं बल्कि स्वतंत्र है। वातावरण और शासन भी उसे किसी आस्था को स्वीकार करने पर विवश नहीं कर सकते। फ़िरऔन के शासन के अधीन रहने वाले जादूगर, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आए। इस प्रकार फ़िरऔन की पत्नी ने भी हज़रत मूसा के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया।अत्याचारी शासक अपने विचारों के अतिरिक्त किसी भी विचार को स्वीकार करने की सहनशक्ति नहीं रखते। वे सोचते हैं कि लोगों को अपने धर्म के चयन में भी उनसे अनुमति लेनी चाहिए।दूसरों पर आरोप लगाना अत्याचारी शासकों के बीच प्रचलित सबसे सामान्य पद्धति है। जिन लोगों के पास कोई तर्क नहीं होता है वे सत्यवादियों पर केवल आरोप लगाने का ही प्रयास करते हैं।हत्या की धमकी, यातनाएं और धौंस देना आदि अवैध और अप्रजातांत्रिक सरकारों के हथकंडे हैं।