islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आराफ़, आयतें 124-127, (कार्यक्रम 258)

    सूरए आराफ़, आयतें 124-127, (कार्यक्रम 258)

    Rate this post

    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 124 और 125 की तिलावत सुनते हैं।لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ مِنْ خِلَافٍ ثُمَّ لَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ (124) قَالُوا إِنَّا إِلَى رَبِّنَا مُنْقَلِبُونَ (125)(फ़िरऔन ने जादूगरों से कहा) में तुम्हारे हाथ-पांव विपरीत दिशाओं से कटवा दूंगा (और) फिर सबको सूली पर चढ़ा दूंगा। (7:124) उन्होंने उत्तर में कहा, निसंदेह हम अपने पालनहार की ओर लौटने वाले हैं। (7:125)इससे पहले हमने बताया था कि जब मिस्र के जादूगरों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार देखा तो वे समझ गए कि उनका चमत्कार जादू-टोना नहीं है अतः वे उन पर ईमान ले आए और उन्होंने स्वीकार कर लिया कि हज़रत मूसा ईश्वर के पैग़म्बर हैं परंतु फ़िरऔन अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सका और उसने उन पर आरोप मढ़ दिया कि तुम लोग मूसा से मिले हुए हो और तुम सबने मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचा है।यह आयतें कहती हैं कि फ़िरऔन ने उन पर आरोप लगाने के अतिरिक्त उन्हें कड़ी धमकी भी दी और कहा कि मैं तुम्हें सबसे कड़ा दंड दूंगा और तुम्हारे हांथ-पाव कटवा दूंगा और वह भी विपरीत दिशा से अर्थात तुम्हारा सीधा पांव और उल्टा हाथ, या सीधा हाथ और उल्टा पांव कटवा दूंगा और दिशा में तुम्हें सूली पर चढ़ा दूंगा ताकि दूसरे लोग इससे पाठ सीखें।परंतु जादूगर वास्तविकता देखने और सत्य समझने के पश्चात हृदय की गहराइयों से हज़रत मूसा पर ईमान लाए थे। वे इन धमकियों से न केवल भयभीत नहीं हुए बल्कि उन्होंने फ़िरऔन की उपेक्षा करते हुए कहा कि यदि तुम हमको सूली पर चढ़ा दोगे तो हम ईश्वर के मार्ग में शहीद होकर उसके पास लौट जाएंगे। तुम हमें शहादत से डरा रहे हो जबकि शहादत ईमान वाले व्यक्ति के लिए कल्याण व मोक्ष का कारण है।इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचारी शासकों का तर्क केवल धमकी, यातनाएं और हत्या पर आधारित होता है, वे यह नहीं समझ पाते कि ईश्वर पर ईमान रखने वाले शहादत के स्वागत के लिए स्वयं ही आगे बढ़ते हैं।मनुष्य भ्रष्ट शासकों और वातावरण के अधीन नहीं होता, वह ईमान और दृढ़ संकल्प द्वारा इन सभी के समक्ष डट सकता है।न हमें अपने पहले ईमान लाने पर घमंड करना चाहिए और न ही काफ़िरों के ईमान न लाने पर निराश होना चाहिए। काफ़िर जादूगरों ने एक ही क्षण में अपना कुफ़्र त्याग दिया और पक्के ईमान वाले बन गए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 126 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا تَنْقِمُ مِنَّا إِلَّا أَنْ آَمَنَّا بِآَيَاتِ رَبِّنَا لَمَّا جَاءَتْنَا رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَتَوَفَّنَا مُسْلِمِينَ (126)(हे फ़िरऔन!) तू हमसे केवल इसलिए प्रतिरोध ले रहा है कि जब हमारे पालनहार की निशानियां हमारे पास आईं तो हम उन पर ईमान ले आए। हे हमारे पालनहार! तू हम पर धैर्य और संयम की वर्षा कर और हमें मुसलमान अर्थात अपना आज्ञाकारी बना कर ही इस संसार से उठाना। (7:126)फ़िरऔन ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले में अपनी पराजय का बदला लेने के लिए उन पर तथा जादूगरों पर सत्ता हथियाने के लिए षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया। इस आयत में जादूगर फ़िरऔन को उत्तर देते हैं कि तू स्वयं जानता है कि हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था। आज यदि तू हमें यातनाएं देना और हमारी हत्या करना चाहता है तथा हमसे प्रतिशोध ले रहा है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि हम मूसा के ईश्वर पर ईमान ले आए हैं।जादूगर अपनी बात जारी रखते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि प्रभुवर हमें इतना धैर्य दे कि हम इस प्रकार के आरोपों और धमकियों के मुक़ाबले में डटे रहें और पूरे ईमान के साथ इस संसार से जाएं।इस आयत से हमने सीखा कि केवल ईश्वर पर ईमान लाना पर्याप्त नहीं है बल्कि ईश्वर के मार्ग के शत्रुओं के समक्ष डट जाना भी आवश्यक है।सच्चे ईमान वाले प्रयास भी करते हैं कि ईश्वर से प्रार्थना भी। इन दोनों में से केवल एक ही पर्याप्त नहीं है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 127 की तिलावत सुनते हैंوَقَالَ الْمَلَأُ مِنْ قَوْمِ فِرْعَوْنَ أَتَذَرُ مُوسَى وَقَوْمَهُ لِيُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ وَيَذَرَكَ وَآَلِهَتَكَ قَالَ سَنُقَتِّلُ أَبْنَاءَهُمْ وَنَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ وَإِنَّا فَوْقَهُمْ قَاهِرُونَ (127)फ़िरऔन की जाति के सरदारों ने उससे कहा कि क्या तू मूसा व उनके अनुयाइयों को यूंही छोड़ देगा कि वे धरती में बिगाड़ फैलाएं और तुझे तथा तेरे ईश्वरों को छोड़ दें। फ़िरऔन ने कहा कि मैं शीघ्र ही उनके पुत्रों की हत्या कर दूंगा तथा उनकी महिलाओं को जीवित रखूंगा और निसंदेह हमें उन पर पूरा नियंत्रण और वर्चस्व प्राप्त है। (7:127)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और मिस्र के जादूगरों के मामले में फ़िरऔन ने जादूगरों का दंड निर्धारित कर दिया और उन्हें मृत्युदंड देने का आदेश दिया गया परंतु हज़रत मूसा के बारे में उसने कोई दंड निर्धारित नहीं किया। फ़िरऔन के निकटवर्ती लोगों ने, जो हज़रत मूसा के अस्तित्व को अपने हितों के लिए ख़तरनाक समझ रहे, फ़िरऔन पर दबाव डालना आरंभ किया कि मूसा के लिए दंड निर्धारित करे क्योंकि यह समस्त समस्याएं मूसा के ही कारण हैं। वह ही लोगों को तुम्हें छोड़कर किसी अन्य ईश्वर की ओर आमंत्रित कर रहे हैं। तुम उनको यदि यूंही छोड़ दोगो तो बनी इस्राईल के लोग विद्रोह कर देंगे और तुम्हारा शासन समाप्त हो जाएगा।फ़िरऔन ने, जो यह देख रहा था कि लोगों के बीच हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का एक विशेष स्थान बन चुका है और उनकी हत्या से उसके शासन पर कड़े नकारात्मक परिणाम पड़ेंगे, हज़रत मूसा के बारे में कोई निर्णय नहीं किया और घोषणा की कि मूसा के अनुयाइयों को अत्यंत कड़ा दंड दिया जाएगा। बनी इस्राईल में से जो भी पुरुष मेरे मुक़ाबले में खड़ा होगा। उसकी हत्या कर दी जाएगी और उन लोगों की बेटियों और महिलाओं को अपने दरबार की दासी बनाकर जीवित रखूंगा। क्योंकि बनी इस्राईल पर मेरा पूरा विश्वास है और मेरी शक्ति उनकी शक्ति से कहीं अधिक है। इस आयत से हमने सीखा कि अत्याचारी शासक जो स्वयं बुराई की जड़ होते हैं वे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जैसे सुधारकों पर बुराई फैलाने का आरोप मढ़ते हैं।युवा पीढ़ी को विनाश की ओर ढकेलना तथा महिलाओं और लड़कियों को अश्लीलता की ओर उन्मुख करना फ़िरऔनी नीति है। वर्तमान युग में पश्चिमी संसार ने युवाओं को नशे और अन्य बुराइयों की लत लगा दी है। उन्होंने महिलाओं को पुरुषों को रिझाने का साधन बना दिया है।