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    सूरए आराफ़, आयतें 128-131, (कार्यक्रम 259)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 128 की तिलावत सुनते हैंقَالَ مُوسَى لِقَوْمِهِ اسْتَعِينُوا بِاللَّهِ وَاصْبِرُوا إِنَّ الْأَرْضَ لِلَّهِ يُورِثُهَا مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَالْعَاقِبَةُ لِلْمُتَّقِينَ (128)मूसा ने अपनी जाति (के लोगों) से कहाः ईश्वर से सहायता चाहो और धैर्य रखो कि निसंदेह धरती ईश्वर की है और वो अपने बंदो में से जिसे चाहता है, धरती का उत्तराधिकार दे देता है और (जान लो कि) परलोक, ईश्वर का भय रखने वालों के लिए (ही) है। (7:128)इससे पहले हमने बताया था कि मिस्र के जादूगरों से मुक़ाबले में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की विजय के पश्चात फ़िरऔन ने उनके अनुयाइयों को कड़ी यातनाएं देने और उनकी हत्या करने का निर्णय किया। इस प्रकार वो हज़रत मूसा के अनुयाइयों की संख्या भी कम करना चाहता था और अन्य लोगों द्वारा हज़रत मूसा के अनुसरण की संभावना को भी समाप्त करना चाहता था, अतः उसने आदेश दिया कि बनी इस्राईल के युवाओं की हत्या कर दी जाए और उनकी महिलाओं को दासी बना लिया जाए।फ़िरऔन की इस कार्यवाही के पश्चात हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के लोगों को, इन कठिनाइयों के मुक़ाबले में धैर्य और संयम का निमंत्रण दिया और कहा कि हे लोगो! धरती ईश्वर की है और वही इसका वास्तविक शासक है। यदि तुम फ़िरऔन के मुक़ाबले में डट जाओ और इस मार्ग में केवल ईश्वर से सहायता मांगों तो ईश्वर ने वचन दिया है कि वो तुम्हें धरती का उत्तराधिकारी और शासक बना देगा।यह मत देखो कि आज फ़िरऔन किस प्रकार धरती पर अपना साम्राज्य चला रहा है और स्वयं को ईश्वर कहता है, यदि तुम ईश्वर के मार्ग में उठ खड़े होगे तो अंततः विजय भी तुम्हारी ही होगी और परलोक में भी तुम्हीं को मोक्ष व कल्याण प्राप्त होगा। अलबत्ता यदि तुम सदा ईश्वर से डरते रहे तो।इस आयत से हमने सीखा कि अत्याचार शासनों पर विजय के लिए तीन बातें अत्यधिक आवश्यक हैं, धैर्य, प्रतिरोध और ईश्वर से भय।ईश्वर से भय रखने वालों का इस संसार में भी भला अंत होता है और प्रलय मे भी उन्हें स्वर्ग प्राप्त होता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 129 की तिलावत सुनते हैंقَالُوا أُوذِينَا مِنْ قَبْلِ أَنْ تَأْتِيَنَا وَمِنْ بَعْدِ مَا جِئْتَنَا قَالَ عَسَى رَبُّكُمْ أَنْ يُهْلِكَ عَدُوَّكُمْ وَيَسْتَخْلِفَكُمْ فِي الْأَرْضِ فَيَنْظُرَ كَيْفَ تَعْمَلُونَ (129)(हज़रत मूसा की जाति के लोगों ने उनसे) कहाः हमारे पास आपके आने से पूर्व भी और बाद मे भी हमें यातनाएं दी गई हैं। (उन्होंने) कहाः आशा है कि ईश्वर तुम्हारे शत्रुओं को तबाह करके तुम्हें धरती में उनका उतराधिकार बनाएगा, फिर वह देखेगा कि तुम क्या करते हो। (7:129)बनी इस्राईल को आशा थी कि हज़रत मूसा के संघर्ष और मिस्र के जादूगरों से मुक़ाबले में उनकी विजय के पश्चात, फ़िरऔन उन पर अत्याचार करना छोड़ देगा और उन्हें शांति मिल जाएगी परंतु इसके विपरीत फ़िरऔन और उसके लोगों के अत्याचार बढ़ने लगे।यह देखकर बनी इस्राईल ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कहा कि आपके संघर्ष का कोई लाभ नहीं हुआ। आपके आने से पहले भी और आपके संघर्ष के पश्चात भी हम यातनाओं के पात्र बन रहे हैं।हज़रत मूसा ने उनके उत्तर में कहा कि शत्रु पर विजय तुरंत और बिना कठिनाई के प्राप्त नहीं होती। यदि तुम प्रतिरोध और संघर्ष करते रहो तो आशा है कि ईश्वर तुम्हारे शत्रुओं को तबाह करके तुम्हें उनके स्थान पर ले आए। अलबत्ता यदि तुम सत्ता में पहुंच गए तब भी ऐसा नहीं है कि पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो और जो चाहो करते रहो। ईश्वर तुम पर दृष्टि रखे हुए है ताकि यह देखे कि तुम भी फ़िरऔन की भांति लोगों पर अत्याचार करते हो या न्याय के साथ काम करते हो।इस आयत से हमने सीखा कि आराम और ऐश्वर्य की चाह ऐसी समस्या है जो ईश्वरीय धर्मों के अनुयाइयों को लक्ष्य तक पहुंचने से रोक देती है। धर्म के पालन में कठिनाइयां होती हैं और जो लोग सांसारिक जीवन में आराम चाहते हैं उनमें धार्मिक आदेशतं को स्वीकार करने की सहनशक्ति नहीं होती।सत्ता, अपने निजी और दलगत हितों की पूर्ति के लिए मुक़ाबले का मैदान नहीं बल्कि ईश्वरीय परीक्षा का मंच है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 130 और 131 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ أَخَذْنَا آَلَ فِرْعَوْنَ بِالسِّنِينَ وَنَقْصٍ مِنَ الثَّمَرَاتِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ (130) فَإِذَا جَاءَتْهُمُ الْحَسَنَةُ قَالُوا لَنَا هَذِهِ وَإِنْ تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ يَطَّيَّرُوا بِمُوسَى وَمَنْ مَعَهُ أَلَا إِنَّمَا طَائِرُهُمْ عِنْدَ اللَّهِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (131)और निसंदेह हमने फ़िरऔन के लोगों को अकाल और फ़स्ल की कमी में ग्रस्त रखा कि शायद वे नसीहत प्राप्त करें। (7:130) तो जब कोई भलाई उनके पास आती तो वे कहते यह तो हमारा अधिकार है और जब कोई बुराई आती तो वे उसे मूसा और उनके साथियों का अपशकुन बताते। जान लो कि उनके अपशकुन (के स्रोत) ईश्वर के पास हैं, परंतु उनमें से अधिकांश लोग (इसे) नहीं जानते। (7:131)ईश्वर इन आयतों में कहता है कि ऐसा नहीं था कि केवल बनी इस्राईल कठिनाइयों में ग्रस्त थे और फ़िरऔन तथा उसके लोग पूर्ण रूप से आराम और ऐश्वर्य में डूबे हुए थे। हमने उन्हें भी सूखे और अकाल में ग्रस्त कर रखा था ताकि वे समझ जाएं कि सारे मामले उन्हीं के हाथ में नहीं हैं और वे धरती के ईश्वर नहीं हैं।परंतु उन लोगों ने इस बातों से सीख लेने के स्थान पर सूखे और अकाल को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तथा उनके साथियों का अपशकुन बताया और कहा कि इन्हीं लोगों के कारण यह कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हैं। जब भी कोई बुराई घटना होती तो वे कहते कि बनी इस्राईल के लोग अशुभ हैं औ जहां कहीं भी जाते हैं अपशकुन अपने साथ ले जाते हैं।फ़िरऔन के लोग इतने स्वार्थी थे कि स्वयं को सभी अच्छाइयों का स्रोत मानते थे और कहते थे कि हमारी योग्यताओं के कारण ही सारी भलाइयां हमारी ओर आती हैं। इसके उत्तर में ईश्वर कहता है कि न तो ऐसा है कि बनी इस्राईल के लोग अपशकुन वाले हैं और न ही ऐसा है कि फ़िरऔन वाले भलाइयों का स्रोत हैं। बल्कि सारी चीज़ें ईश्वर के हाथ में है परंतु वे नहीं समझते।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर का इरादा भौतिक कारकों से परे है। हर बात को प्रकृति से संबंधित नहीं करना चाहिए। हो सकता है कि सूखा और अकाल, ईश्वरीय दंड या चेतावनी हो।जीवन की कटु और प्रसन्नतादायक घटनाओं की समीक्षा में ग़लती नहीं करनी चाहिए। कटु घटनाओं के लिए बाहरी कारकों की खोज में नहीं रहना चाहिए कि सारी ग़लतियों को दूसरों के सिर मंढ दें। हो सकता है कि ग़लतियां हमारे ही कारण हुई हों।