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    सूरए आराफ़, आयतें 136-140, (कार्यक्रम 261)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 136 की तिलावत सुनते हैं।فَانْتَقَمْنَا مِنْهُمْ فَأَغْرَقْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِلِينَ (136)तो हमने उनसे प्रतिशोध लिया और उन्हें नदी में डुबो दिया क्योंकि उन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया था और वे उनकी ओर से निश्चेत थे। (7:136)इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की ओर से अनेक चमत्कार दिखाए जाने के बावजूद फ़िरऔन और उसके लोग, उनकी बातें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए बल्कि सदैव उन्हें धमकियां देते रहे और उन पर विभिन्न आरोप लगाते रहे।इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि उनकी इस हठधर्मी और द्वेष का परिणाम यह निकला कि उन्हें इसी संसार में ईश्वर के दंड का पात्र बनना पड़ा। नील को पार करते समय वे सबके सब उसमें डूब गए जबकि ईश्वर के आदेश से हज़रत मूसा व उनेक साथियों के लिए नदी के बीच में मार्ग बन गया और वे उस पर से गुज़र गए।जी हां, काफ़िरों से ईश्वर का प्रतिशोध, उनको दंडित किए जाने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता क्योंकि द्वेष कि जो मानव प्रतिशोध का स्रोत होता है, यह प्रतिशोध उन वास्तविकताओं को झुठलाने के कारण था जिसे वे समझते थे परंतु स्वीकार नहीं करते थे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर अत्याधिक दयावान भी है और प्रतिशोध लेने वाला भी है। उसकी दया, उसके क्रोध से निश्चेतना का कारण नहीं बनती।लोगों और जातियों का भविष्य स्वयं उन्हीं के हाथ में होता है। कुफ़्र और अत्याचार का परिणाम बर्बादी हे।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 137 की तिलावत सुनते हैं।وَأَوْرَثْنَا الْقَوْمَ الَّذِينَ كَانُوا يُسْتَضْعَفُونَ مَشَارِقَ الْأَرْضِ وَمَغَارِبَهَا الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ الْحُسْنَى عَلَى بَنِي إِسْرَائِيلَ بِمَا صَبَرُوا وَدَمَّرْنَا مَا كَانَ يَصْنَعُ فِرْعَوْنُ وَقَوْمُهُ وَمَا كَانُوا يَعْرِشُونَ (137)और जिन लोगों को कमज़ोर बना दिया गया था हमने उन्हें उस क्षेत्र के, जिसे हमने विभूतियां दी थीं, पूर्व और पश्चिम का उत्तराधिकारी बना दिया। और तुम्हारे पालनहार का अचछा (और सच्चा) वादा बनी इस्राईल के बारे में उनकी दृढ़ता के कारण पूरा हुआ और हमने वह सब नष्ट कर दिया जो फ़िरऔन और उसकी जाति वालों ने बनाया और उठाया था। (7:137)फ़िरऔन की जाति वालों को मिलने वाले दंड के पश्चात ईश्वर बनी इस्राईल को धैर्य व संयम रखने तथा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का अनुसरण करने के काण मिलने वाले पारितोषिक का उल्लेख करते हुए कहता है कि जो लोग इससे पूर्व तक फ़िरऔन के नियंत्रण में थे और उन्हें तुच्छ व कमज़ोर समझा जाता था, वे नील नदी से गुज़रने के बाद शक्तिशाली बन गए और उन्हें वहां की सत्ता प्राप्त हो गई।यह आयत आगे चलकर कहती है कि हमने न केवल फ़िरऔन और उसके साथियों को नील नदी में डुबा दिया बल्कि उनके महलों और बाग़ों को भी नष्ट कर दिया जबकि उनके अधीन शासन क्षेत्र इतना बड़ा था कि क़ुरआन कहता है कि उनकी धरती के पूर्व और पश्चिम के भाग हमने बनी इस्राईल को दे दिए।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का शासन, कमज़ोर बनाए गये लोगों का शासन है न कि अत्याचारियों और साम्राज्यवादियों का। पैग़म्बरों की शिक्षाओं की छाया में कमज़ोर लोग, साम्राज्यवादियों के चंगुल से स्वतंत्र होकर स्वयं सत्ता प्राप्त करते हैं।ईश्वर के ठोस वादे के अंतर्गत, धैर्य व संयम की स्थिति में ईमान वालों को विजय प्राप्त होगी।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 138 से 140 की तिलावत सुनते हैं।وَجَاوَزْنَا بِبَنِي إِسْرَائِيلَ الْبَحْرَ فَأَتَوْا عَلَى قَوْمٍ يَعْكُفُونَ عَلَى أَصْنَامٍ لَهُمْ قَالُوا يَا مُوسَى اجْعَلْ لَنَا إِلَهًا كَمَا لَهُمْ آَلِهَةٌ قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ (138) إِنَّ هَؤُلَاءِ مُتَبَّرٌ مَا هُمْ فِيهِ وَبَاطِلٌ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (139) قَالَ أَغَيْرَ اللَّهِ أَبْغِيكُمْ إِلَهًا وَهُوَ فَضَّلَكُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ (140)और हमने बनी इस्राईल को नदी के पार करा दिया। फिर वे ऐसे लोगों के पास पहुंचे जो मूर्तियों की पूजा करते थे। बनी इस्राईल ने कहा कि हे मूसा! हमारे लिए भी कोई ऐसा ही देवता बना दो जैसे इनके देवता हैं। (मूसा ने) कहा कि निसंदेह तुम अज्ञानी लोग हो। (7:138) निसंदेह ये लोग जिसमें लगे हुए हैं वह बर्बाद होने वाला है और जो कुछ यह कर रहे हैं वह मिथ्या है। (7:139) (फिर मूसा ने) कहा कि क्या मैं ईश्वर के अतिरिक्त तुम्हारे लिए कोई देवता ढूंढूं जबकि वही है जिसने तुम्हें पूरे ब्रह्मांड पर वरीयता दी है। (7:140)हमने बताया था कि ईश्वर ने अपनी कृपा द्वारा बनी इस्राईल को फ़िरऔन के चंगुल से रिहाई दिलाई और उन्हें सीरिया तथा फ़िलिस्तीन के क्षेत्र का शासक बना दिया परंतु स्वतंत्रता मिलते ही यह लोग विभिन्न वैचारिक परिवर्तनों में ग्रस्त हो गए। उदाहरण स्वरूप वे मूर्तिपूजा करने वाली एक जाति से मिले तो उसके विचारों से प्रभावित हो गए।बनी इस्राईल के इन अज्ञानी लोगों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कहा था कि वे उनके लिए भी पत्थरों और लकड़ी के देवता बना दें ताकि वे भी उस जाति की ही भांति उनके समक्ष नतमस्तक हो सकें। इस अवसर पर हज़रत मूसा अलैहस्सलाम अत्यधिक दुखी हो गए। उन्होंने कहा कि तुमने कैसी अनुचित बात कही है। क्या तुम इतनी जल्दी ईश्वर की कृपा को भूल गए? क्या तुम्हें नहीं पता है कि यह सब नश्वर वस्तुएं हैं? क्या यह उचित है कि तुम उस ईश्वर को, जिसने तुम्हें श्रेष्ठता और विजय प्रदान की, छोड़ कर दूसरों की शरण में जाने की बात करो।इन आयतों से हमने सीखा कि बुरा व पथभ्रष्ट वातावरण लोगों को प्रभावित करता है। जब तक हम अपने ईमान और आस्थाओं में पक्के न हो जाएं उस समय तक हमको ग़लत वातावरण से दूर रहना चाहिए।कभी-कभी अज्ञानी मित्रों और अनुयाइयों ने, शत्रुओं से अधिक ईश्वरीय नेताओं को कष्ट पहुंचाया है।