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    सूरए आराफ़, आयतें 141-142, (कार्यक्रम 262)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 141 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ أَنْجَيْنَاكُمْ مِنْ آَلِ فِرْعَوْنَ يَسُومُونَكُمْ سُوءَ الْعَذَابِ يُقَتِّلُونَ أَبْنَاءَكُمْ وَيَسْتَحْيُونَ نِسَاءَكُمْ وَفِي ذَلِكُمْ بَلَاءٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَظِيمٌ (141)(हे बनी इस्राईल!) याद करो उस समय को कि जब हमने तुम्हें फ़िरऔन वालों से मुक्ति दिलाई। वे तुम्हें बहुत बुरी यातनाएं देते थे, तुम्हारे पुत्रों की हत्या कर देते थे और तुम्हारी महिलाओं को (सेवा के लिए) जीवित रखते थे, और इसमें तुम्हारे लिए, तुम्हारे पालनहार की ओर से बड़ी परीक्षा थी। (7:141)इससे पहले हमने कहा था कि बनी इस्राईल के लोगों ने फ़िरऔन से मुक्ति पाने और नील नदी पार करने के पश्चात जब मूर्ति पूजा करने वाली जाति को देखा तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से आग्रह किया कि वे उनके लिए भी वैसी ही मूर्तियां बना दें।यह आयत कहती है कि क्या तुमने इतनी जल्दी मूसा के ईश्वर को भुला दिया और पत्थर तथा लकड़ी की कुछ मूर्तियां देखकर उनकी पूजा करना चाहते हो? क्या तुम भूल गए हो कि मूसा के ईश्वर ने ही तुम्हें फ़िरऔन के चंगुल से छुटकारा दिलाया था और तुम्हें शक्ति प्रदान की थी? क्या तुम यह भी भूल गए कि फ़िरऔन के लोग तुम्हारे और तुम्हारी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार करते थे। वे तुम्हारे बेटों की विभिन्न बहानों से हत्या कर देते थे और तुम्हारी महिलाओं को अपनी दासियां बन लेते थे।अंत में आयत कहती है कि यद्यपि यह सब कठिनाइयां फ़िरऔन की ओर से थीं परंतु ईश्वर भी तुम्हारी परीक्षा ले रहा था ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि कौन प्रतिरोध करता है और कौन समर्पण।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय अनुकंपाओं से निश्चेतना, समाज की पथभ्रष्टता का कारण बनती है। ईश्वरीय प्रतिनिधियों ने सदैव ही लोगों के समक्ष ईश्वर की अनुकंपाओं का वर्णन किया ताकि लोग कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद से दूर रह सकें।जीवन की मधुर व कटु घटनाएं, ईश्वरीय परीक्षा का अवसर हैं, इसी प्रकार धन-संपन्नता और निर्धनता भी उसकी परीक्षा का स्थान है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 142 की तिलावत सुनते हैंوَوَاعَدْنَا مُوسَى ثَلَاثِينَ لَيْلَةً وَأَتْمَمْنَاهَا بِعَشْرٍ فَتَمَّ مِيقَاتُ رَبِّهِ أَرْبَعِينَ لَيْلَةً وَقَالَ مُوسَى لِأَخِيهِ هَارُونَ اخْلُفْنِي فِي قَوْمِي وَأَصْلِحْ وَلَا تَتَّبِعْ سَبِيلَ الْمُفْسِدِينَ (142)और हमने (तौरैत भेजने के लिए) मूसा से तीस रातों का वचन लिया और दस रातें बढ़ा कर हमने उसे संपूर्ण कर दिया। तो इस प्रकार मूसा के पालनहार का वचन चालीस रातों का हो गया। और मूसा ने (निर्धारित स्थान अर्थात तूर पर्वत पर जाने से पूर्व) अपने भाई हारून से कहा कि तुम मेरी जाति में मेरे उत्तराधिकार बनो और सुधार करते रहो और बुराई फैलाने वालों का अनुसरण न करो। (7:142)ईश्वर के आदेश पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का सबसे पहला कार्यक्रम बनी इस्राईल को फ़िरऔन के चंगुल से छुड़ाना था। हज़रत मूसा अत्याधिक कठिनाइयां झेलने और ख़तरों का मुक़ाबला करने के पश्चात उन्हें स्वतंत्र कराने में सफल हुए किन्तु स्वाभाविक रूप से फ़िरऔनी व्यवस्था से स्वतंत्र होने वाले लोगों के व्यक्तिगत व पारिवारिक मामलों तथा सामाजिक व्यवस्था को संतुलित व नियंत्रित करने के लिए लिखित व स्पष्ट क़ानूनों तथा आदेशों की आवश्यकता थी।इसी कारण ईश्वर ने हज़रत मूसा को आदेश दिया था कि वे ईश्वरीय किताब तौरैत प्राप्त करने के लिए अपनी जाति के लोगों से अलग होकर चालीस रातों के लिए तूर नामक पर्वत पर आ जाएं। इस अवधि के लिए वे अपने भाई हज़रत हारून को जो कि स्वयं भी पैग़म्बर थे, अपना उत्तराधिकारी बना दें।क़ुरआने मजीद ने इस अवधि को चालीस रातें इस कारण कहा कि ईश्वरसे प्रार्थना करने और विशेष ईश्वरीय अनुकंपाएं प्राप्त करने का सबसे अच्छा समय रात ही होता है। तौरेत में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम भी चालीस दिनों तक अपने परिवार से दूर होकर हिरा नामक गुफा में प्रार्थना व उपासना करते रहे ताकि ईश्वर की विशेष अनुकंपाएं प्राप्त कर सकें।इसी आधार पर यह बात किस प्रकार स्वीकार की जा सकती है कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम चालीस दिनों के लिए अपनी जाति से दूर जाएं तो किसी को अपना उत्तराधिकारी निर्धारित करके जाएं परंतु पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने अपने बाद के वर्षों के लिए कोई विचार ही न किया हो और किसी को अपना उत्तराधिकारी निर्धारित न किया हो बल्कि इसे लोगों पर ही छोड़ दिया हो?पैग़म्बरे इस्लाम ने तबूक नामक युद्ध के लिए जाते समय भी कि मदीने से बहुत अधिक दूर न था, हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और कहा कि हे अली! मुझसे तुम्हारा वही संबंध है जो हारून को मूसा से था अतः मेरी अनुपस्थिति में, मदीने में मेरे उत्तराधिकारी के रूप में रहो यहां तक कि मैं वापस आ जाऊं।हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तूर पर्वत पर जाते समय अपने भाई और उत्तराधिकार हज़रत हारून से कहा था कि वे ध्यान रखें कि समाज का संचालन बुराई फैलाने वालों के हाथ में न चला जाए, और वे स्वयं भी उनसे दूर रहें। परंतु हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की इतनी नसीहतों और सिफ़ारिशों के बावजूद इतिहास इस बात का साक्षी है कि लोगों ने हज़रत हारून को छोड़ दिया और वे सामेरी नामक एक व्यक्ति का अनुसरण करने लगे। मूर्तियां बनाने वाले इस व्यक्ति ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की अनुपस्थिति का अनुचित लाभ उठाते हुए सोने के एक बछड़े की मूर्ति बनाकर लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया।इस आयत से हमने सीखा कि रात की उपासना और प्रार्थना बड़े दायित्वों का सहारा होती हैं। समाज में किसी भी व्यक्ति की सक्रियता को उसकी उपासनाओं और प्रार्थनाओं में बाधा नहीं बनना चाहिए।समाज ईश्वरीय नेता की उपस्थिति के बिना नहीं रह सकता। यदि हज़रत मूसा को तूर नामक पर्वत पर जाना ही होता तो उनकी अनुपस्थिति में हज़रत हारून को उनका उत्तराधिकारी बनना ही पड़ेगा।ईश्वर के पैग़म्बरों और ईश्वरीय नेताओं का मुख्य कर्तव्य, समाज का सुधार करना और उसमें व्याप्त सभी बुराईयों को दूर करना होता है।