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    सूरए आराफ़, आयतें 143-146, (कार्यक्रम 263)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 143 की तिलावत सुनते हैंوَلَمَّا جَاءَ مُوسَى لِمِيقَاتِنَا وَكَلَّمَهُ رَبُّهُ قَالَ رَبِّ أَرِنِي أَنْظُرْ إِلَيْكَ قَالَ لَنْ تَرَانِي وَلَكِنِ انْظُرْ إِلَى الْجَبَلِ فَإِنِ اسْتَقَرَّ مَكَانَهُ فَسَوْفَ تَرَانِي فَلَمَّا تَجَلَّى رَبُّهُ لِلْجَبَلِ جَعَلَهُ دَكًّا وَخَرَّ مُوسَى صَعِقًا فَلَمَّا أَفَاقَ قَالَ سُبْحَانَكَ تُبْتُ إِلَيْكَ وَأَنَا أَوَّلُ الْمُؤْمِنِينَ (143)और जब मूसा हमारे निर्धारित किए हुए समय और स्थान पर वादा पूरा करने के लिए आए और उनके पालनहार ने उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि प्रभुवर! मुझे अपना जलवा दिखा ताकि मैं तुझे देख सकूं। ईश्वर ने कहा कि तुम मुझे कदापि नहीं देख सकते परंतु इस पर्वत की ओर देखो यदि यह स्थान पर स्थिर रहा गया तो फिर तुम मुझे देख सकते हो। तो जब उनका पालनहार पर्वत पर आलोकित हुआ तो पर्वत चूर-चूर हो गया और मूसा बेहोश होकर गिर पड़े। तो जब उन्हें होश आया तो उन्होंने कहा (तू इस बात से परे है) कि तुझे देखा जाए, मैं तेरे समक्ष तौबा करता हूं और मैं सबसे पहले ईमान लाने वाला हूं। (7:143)इससे पहले हमने कहा कि ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तौरैत प्रदान करने के लिए चालीस दिनों तक तूर पर्वत पर रहने के लिए कहा। यह आयत कहती है कि मूसा निर्धारित समय पर तूर पर्वत पर आ गए और ईश्वर ने एक पेड़ के माध्यम से उनसे बात की। हज़रत मूसा से बनी इस्राईल का एक आग्रह यह था कि वे स्वयं अपनी आंखों से ईश्वर को देखें। इसी कारण हज़रत मूसा ने यह आग्रह ईश्वर के समक्ष रखा और कहा कि प्रभुवर! यदि संभव हो तो तू स्वयं को मुझे दिखा दे ताकि मैं तुझे अपनी आंखों से देख लूं और अपनी जाति वालों से कहूं कि मैंने ईश्वर को देखा है।परंतु ईश्वर का उत्तर आया कि हे मूसा तुम भी मुझे नहीं देख सकते क्योंकि मुझे देखा ही नहीं जा सकता परंतु तुम मेरी शक्ति और महानता का जलवा देख सकते हो, तो इस पर्वत को देखो कि यह किस प्रकार मेरी इच्छा और इरादे से चकनाचूर हो जाता है।यह काम इतना अधिक वैभवपूर्व था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बेहोश होकर धरती पर गिर पड़े और जब उन्हें होश आया तो उन्होंने कहा कि प्रभुवर! मैं वह पहला व्यक्ति हूं जो तेरी और तेरी महानता तथा शक्ति की गवाही देता हूं और इस प्रकार का अनुचित आग्रह करने के लिए क्षमा चाहता हूं। निसंदेह तू इस बात से परे है कि तुझे आंखों से देखा जा सके।हज़रत अली अलैहिस्सलाम से एक व्यक्ति ने प्रश्न किया कि क्या आपने ईश्वर को देखा है कि जो उसकी प्रकार उपासना करते हैं? उन्होंने उत्तर में कहाः मैं ऐसे ईश्वर की उपासना नहीं करता जिसे मैंने आंखों से न देखा हो किन्तु लौकिक आंखों से नहीं बल्कि दिल की आंखों से। इसी प्रकार आपने एक अन्य स्थान पर कहा कि मैंने किसी भी वस्तु को नहीं देखा सिवाए इसके कि इसके कि उसके आगे, पीछे और साथ में ईश्वर को न देखा हो।क़ुरआने मजीद भी सूरए अनआम की आयत संख्या 103 में स्पष्ट रूप से कहता है कि आंखें उसे पा नहीं सकतीं किन्तु वह आंखों को पा लेता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर को पहचानने के लिए सृष्टि में मौजूद उसकी शक्ति और महानता के जलवों पर ध्यान देना चाहिए।ईश्वर के बारे में किसी भी प्रकार के अनुचित विचार या आग्रह पर तौबा करनी चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 144 और 145 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا مُوسَى إِنِّي اصْطَفَيْتُكَ عَلَى النَّاسِ بِرِسَالَاتِي وَبِكَلَامِي فَخُذْ مَا آَتَيْتُكَ وَكُنْ مِنَ الشَّاكِرِينَ (144) وَكَتَبْنَا لَهُ فِي الْأَلْوَاحِ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَوْعِظَةً وَتَفْصِيلًا لِكُلِّ شَيْءٍ فَخُذْهَا بِقُوَّةٍ وَأْمُرْ قَوْمَكَ يَأْخُذُوا بِأَحْسَنِهَا سَأُرِيكُمْ دَارَ الْفَاسِقِينَ (145)ईश्वर ने कहाः हे मूसा! मैंने अपनी पैग़म्बरी और कथन के लिए सभी लोगों के बीच से तुम्हारा चयन किया है तो जो कुछ मैंने तुम्हें दिया है उसे ले लो और कृतज्ञों में से हो जाओ। (7:144) और हमने तौरैत की तख़्तियों में, हर वस्तु से नसीहत और हर वस्तु का विवरण लिख दिया है तो इसे मज़बूती से पकड़ लो और अपनी जाति के लोगों को आदेश दो कि वे इनमें से सर्वश्रेष्ठ को पकड़ लें, मैं शीघ्र ही तुम्हें अवज्ञाकारियों का ठिकाना दिखा दूंगा अर्थात उनके अंत से तुम्हें अवगत करा दूंगा। (7:145)जब हज़रत मूसा चालीस दिनों के लिए तूर पर्वत पर थे तो ईश्वर ने उन्हें पत्थर की तख़्तियों के रूप में पवित्र किताब तौरैत दी और उनसे कहा कि इसके आदेशों को मज़बूती से पकड़े रहें और अपनी जाति के लोगों को इनके पालन का आदेश दें।इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचारी शासन की समाप्ति और धार्मिक शासन की स्थापना के पश्चात, ईश्वरीय क़ानूनों और आदेशों को लागू होना चाहिए।आसमानी किताब की प्राप्ति की अनुकंपा पर विशेष कृतज्ञता आवश्यक है और अनुकंपा पर कृतज्ञता, ईश्वरीय आदेश है न कि एक शिष्टाचारिक सिफ़ारिश।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 146 की तिलावत सुनते हैं।سَأَصْرِفُ عَنْ آَيَاتِيَ الَّذِينَ يَتَكَبَّرُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَإِنْ يَرَوْا كُلَّ آَيَةٍ لَا يُؤْمِنُوا بِهَا وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الرُّشْدِ لَا يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا وَإِنْ يَرَوْا سَبِيلَ الْغَيِّ يَتَّخِذُوهُ سَبِيلًا ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَكَانُوا عَنْهَا غَافِلِينَ (146)मैं शीघ्र ही अपनी निशानियों की ओर से उन लोगों को मोड़ दूंगा जो अकारण धरती में अकड़ते फिरते हैं और ये लोग जिस निशानी को भी देख लें, ईमान लाने वाले नहीं हैं। ये यदि मार्गदर्शन की राह देख लें तो उसे नही अपनाएंगे और यदि टेढ़ा (और पथभ्रष्टता का) मार्ग देख लें तो (तत्काल) उसे अपना लेंगे। यह इसलिए है कि इन्होंने हमारी निशानियों को झुठलाया और सदैव उनकी ओर से निश्चित रहे। (7:146)पिछली आयत में, ईश्वरीय आदेशों के पालन और ईश्वर के इरादे के समक्ष नतमस्तक रहने पर बल देने के पश्चात इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि जो लोग ईश्वर के आदेशों के समक्ष नतमस्तक नहीं होते और घमंड करते हैं, वे सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होंगे चाहे वह ईश्वर की कितनी ही निशानियों को क्यों न देख लें और उसके मार्ग की सत्यता को समझ ही क्यों न लें। ऐसे लोग प्रगति और परिपूर्णता का मार्ग नहीं चाहते बल्कि सत्य से बचने के लिए पथभ्रष्टता मार्ग अपनाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की निशानियों को झुलाने और ईश्वर के इन्कार का मुख्य कारण, घमंड है।ईश्वर के मुक़ाबले में घमंड, ईश्वरीय मार्गदर्शन के अभाव का कारण बनता है। ईश्वर बिना किसी कारण के किसी को अपनी कृपा से वंचित नहीं रखता।