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    सूरए आराफ़, आयतें 147-149, (कार्यक्रम 264)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 147 की तिलावत सुनते हैंوَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَلِقَاءِ الْآَخِرَةِ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (147)और जिन लोगों ने हमारी निशानियों और प्रलय की भेंट को झुठलाया, उनके सारे कर्म अकारत हैं। क्या इन्हें उसके अतिरिक्त कुछ और बदला दिया जाएगा, जैसे ये कर्म करते थे? (7:147)इस्लाम की दृष्टि में कर्म का मूल्य उसके उद्देश्य और नियत पर निर्भर होता है। ऐसे कितने ही भले काम हैं जो बुरे और अमानवीय उद्देश्यों के अंतर्गत किए जाते हैं। ऐसे कर्मों का न केवल ये कि कोई मूल्य नहीं है बल्कि इनके लिए कर्म करने वाले को दंडित भी किया जाएगा। जैसे दिखावे के लिए किया जाने वाला कर्म।कभी-कभी ये कर्म इतना ख़तरनाक और हानिकारक होता है कि दूसरे भले कर्मों को ही तबाह कर देता है। उस विष की भांति जो मनुष्य, कठिनाइयां सहन न कर पाने के कारण पी लेता है और अपनी आयु को समाप्त कर देता है। यह आयत कहती है कि जो कोई ईश्वर की निशानियों को झुठलाता है और प्रलय का इन्कार करता है वह वस्तुतः अपने सारे कर्मों को सांसारिक उद्देश्य से करता है और प्रलय में ख़ाली हाथ पहुंचता है।जी हां! मनुष्य के कर्म एक दूसरे से संबंधित होते हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। एक कर्म के कारण, दूसरे कर्म का प्रभाव समाप्त होना, एक स्वाभाविक बात है और ये ईश्वर के न्याय से विरोधाभास नहीं रखता है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय जैसी महान वास्तविकता का इन्कार, मनुष्य के भले कर्मतं को संसार तक सीमित करके उन्हें तबाह कर देता है।प्रलय में दिया जाने वाला दंड और पारितोषिक, कर्म के आधार पर है परंतु ऐसा कर्म जो प्रलय तक पहुंच जाए और वहां के मापदंड के अनुअसार हो।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 148 की तिलावत सुनते हैं।وَاتَّخَذَ قَوْمُ مُوسَى مِنْ بَعْدِهِ مِنْ حُلِيِّهِمْ عِجْلًا جَسَدًا لَهُ خُوَارٌ أَلَمْ يَرَوْا أَنَّهُ لَا يُكَلِّمُهُمْ وَلَا يَهْدِيهِمْ سَبِيلًا اتَّخَذُوهُ وَكَانُوا ظَالِمِينَ (148)और मूसा की जाति (वालों) ने उनके (तूर पर्वत पर जाने के) पश्चात, अपने आभूषणों से बछड़े (का पुतला) बना लिया, जिसमें (से) गाय की आवाज़ (निकलती) थी। क्या उन्होंने नहीं देखा कि न वह बात कर सकता है और न ही कोई मार्ग दिखा सकता है? उन लोगों ने उसे (ईश्वर) बना लिया और वस्तुतः वे लोग अत्याचारी थे। (7:148)पिछले कार्यक्रमों में हमने बताया था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ईश्वर के आदेश तौरैत लेने के लिए तूर नामक पर्वत पर गए तथा तूर पर उनके आवास की अवधिक दस दिन बढ़ा दी गई। इस प्रकार हज़रत मूसा को चालीस दिनों तक तूर पर रहना पड़ा।बनी इस्राईल ने वर्षों तक मिस्र में विभिन्न आकार की मूर्तियां देखी थीं, और जब वे लोग नील नदी पार करके आ रहे थे तब भी उन्होंने मूर्तिपूजा करने वाली एक जाति देखी थी, उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से आग्रह किया कि वे उनके लिए भी कोई ऐसा ईश्वर बना दें जो मूर्तियों जैसा हो। हज़रत मूसा ने उन्हें समझाया कि ईश्वर कोई भौतिक चीज़ नहीं है कि उसे देखा जा सके। हज़रत मूसा ने उनके इस आग्रह को उनकी अज्ञानता का परिणाम समझा।परंतु हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की अनुपस्थिति में दस दिन की वृद्धि होने के पश्चात, उनके मरने की अफ़वाह फैल गई। सामेरी नामक एक व्यक्ति ने एक षड्यंत्र रचा। सामेरी एक अच्छा कलाकार था परंतु पथभ्रष्ट था। उसने बनी इस्राईल की महिलाओं के आभूषण एकत्रित किए और सोने से बछड़े का एक पुतला बनाया और फिर लोगों को उसकी पूजा के लिए आमंत्रित किया।उसने बड़ी चतुराई से पुतला कुछ इस प्रकार बनाया कि उसमें से बछड़े की सही आवाज़ आती थी। इसी कारण लोग अधिक संख्या में उसकी ओर आकृष्ट हुए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सामेरी ने हज़रत मूसा के पैरों की धूल उस पुतले में डाल दी थी और ईश्वरीय पैग़म्बर के पैरों में लगने के कारण धूल में यह प्रभाव आ गया कि जब उसे पुतले में डाला गया तो वह बोलने लगा।क़ुरआने मजीद बनी इस्राईल के लोगों के इस काम को नकारते हुए कहता है। यद्यपि सोने का पुतला सुन्दर है और उसकी आवाज़ भी ध्यान आकृष्ट करती हैं परंतु क्या यह लोगों का मार्गदर्शन भी कर सकता है? क्या हज़रत मूसा की बातों को छोड़कर एक बछड़े के पुतले की निरर्थक आवाज़ पर ध्यान देना, स्वयं पर अत्याचार नहीं है?इस आयत से हमने सीखा कि समाज से ईश्वरीय नेताओं की अनुपस्थिति पथभ्रष्टों द्वारा ग़लत प्रचार की भूमि समतल करती हैं।पथभ्रष्ट लोग, जनता को बहकाने के लिए कला का भी सहारा लेते हैं। हमें पथभ्रष्टों का चकाचौंध और कुप्रयासों से धोखा नहीं खाना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 149 की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا سُقِطَ فِي أَيْدِيهِمْ وَرَأَوْا أَنَّهُمْ قَدْ ضَلُّوا قَالُوا لَئِنْ لَمْ يَرْحَمْنَا رَبُّنَا وَيَغْفِرْ لَنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ (149)और जब वे अपने किए पर पछताए और उन्होंने देख लिया कि वे बहक गए हैं तो उन्होंने कहाः यदि हमारा पालनहार हम पर दया न करे और हमें क्षमा न करे तो निसंदेह हम लोग घाटा उठाने वालों में से होंगे। (7:149)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की तूर पर्वत से वापसी और उनके मार्गदर्शन के पश्चात बनी इस्राईल के लोगों को अपने किए पर पछतावा हुआ और उन्होंने तौबा व प्रायश्चित करते हुए ईश्वर से प्रार्थना की कि वो उन्हें क्षमा कर दें।अलबत्ता हज़रत मूसा ने शाब्दिक उपदेश और मार्गदर्शन के अतिरिक्त उन्हें यह समझाने के लिए कि यह पुतला न केवल यह कि ईश्वर नहीं है बल्कि इसमें स्वयं की रक्षा की क्षमता भी नहीं है, उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसे जलाकर उसकी राख नदी में डाल दी ताकि उसका कोई चिन्ह बाक़ी न रहे। उनके इस काम से, बनी इस्राईल के लोगों के समक्ष वास्तविकता स्पष्ट हो गई और एक पुतले की पूजा करने की ग़लती का उन्हें आभास हो गया और उन्होंने तौबा कर ली।जी हां! कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद के प्रतीकों को समाप्त करना, ईश्वरीय पैग़म्बरों का काम है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने भी मक्का नगर पर विजय प्राप्त करने के पश्चात, अनेकेश्वरवादियों को क्षमा कर दिया किन्तु उनकी मूर्तियों को तोड़ कर तबाह कर दिया।इस आयत से हमने सीखा कि केवल उपदेश पर्याप्त नहीं है बल्कि समाज से पथभ्रष्टता के साधनों को समाप्त करना चाहिए।मनुष्य का वास्तविक घाटा, ईश्वरीय दया व कृपा से उसकी दूरी है। {