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    सूरए आराफ़, आयतें 150-153, (कार्यक्रम 265)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 150 की तिलावत सुनते हैंوَلَمَّا رَجَعَ مُوسَى إِلَى قَوْمِهِ غَضْبَانَ أَسِفًا قَالَ بِئْسَمَا خَلَفْتُمُونِي مِنْ بَعْدِي أَعَجِلْتُمْ أَمْرَ رَبِّكُمْ وَأَلْقَى الْأَلْوَاحَ وَأَخَذَ بِرَأْسِ أَخِيهِ يَجُرُّهُ إِلَيْهِ قَالَ ابْنَ أُمَّ إِنَّ الْقَوْمَ اسْتَضْعَفُونِي وَكَادُوا يَقْتُلُونَنِي فَلَا تُشْمِتْ بِيَ الْأَعْدَاءَ وَلَا تَجْعَلْنِي مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (150)और जब मूसा क्रोध और दुख के साथ अपनी जाति की ओर लौटे तो कहाः तुम लोगों ने मेरे बात बहुत बुरा किया, तुम क्या अपने पालनहार का आदेश आने से पहले ही जल्दी कर बैठे। और उन्होंने (तौरैत की) तख़्तियों को (धरती) पर डाल दिया और अपने भाई का सिर पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगे। (हारून ने) कहा कि हे भाई! वास्तविकता तो यह है कि इन लोगों ने मुझे कमज़ोर बना दिया और निकट था कि ये मेरी हत्या कर देते तो मुझको भला-बुरा कहने का शत्रुओं को अवसर न दीजिए और न ही अत्याचारियों में मुझे सम्मिलित कीजिए। (7:150)इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को ईश्वरीय किताब की प्राप्ति के लिए तीस दिनों के लिए तूर पर्वत पर जाना पड़ा था। बाद में इस अवधि में दस दिनों की वृद्धि कर दी गई। इस वृद्धि के कारण हज़रत मूसा की मृत्यु का समाचार फैल गया और बनी इस्राईल के लोग सामेरी नामक जादूगर के जाल में फंस गए।यह आयत कहती है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तूर पर्वत से वापसी के समय अपनी जाति के लोगों से भी कड़ा व्यवहार किया और अपने भाई से भी। उन्होंने बनी इस्राईल के लोगों से कहा कि तुमने मेरी अनुपस्थिति में बहुत बुरा किया, तुमने इतनी प्रतीक्षा भी नहीं की कि यह देखो कि तूर पर्वत पर जाने और वहां रहने हेतु ईश्वर का आदेश क्या है। तुम मेरे भाई हारून को छोड़कर सामेरी का अनुसरण करने लगे।हज़रत मूसा ने अपने भाई हारून के साथ भी कड़ा व्यवहार किया और क्रोध से उन्हें अपनी ओर खींचा तथा इस कारण उनकी आलोचना की कि वे बनी इस्राईल का सही ढंग से नेतृत्व नहीं कर सके किन्तु हज़रत हारून ने कहा कि इन लोगों ने मुझको छोड़ दिया है। इन्होंने मेरी बातें स्वीकार नहीं की बल्कि यह तो मेरी हत्या करना चाहते थे अतः मैं निर्दोष हूं और मुझे इन अत्याचारियों के साथ नहीं समझा जाना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि समाज में प्रचलित पथभ्रष्टताओं के संबंध में धार्मिक कड़ाई से काम लेना चाहिए और अपने क्रोध व राय को प्रकट करना चाहिए जैसा कि वर्तमान काल में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने “सैटेनिक वर्सेज़” नामक पुस्तक के संबंध में ऐसा ही किया।पथभ्रष्टता से मुक़ाबले में पद या रिश्तेदारी का ध्यान नहीं रखना चाहिए बल्कि कड़ाई से काम लेना चाहिए।प्रत्येक क्रांतिकारी और सुधारवादी कार्य में रूढ़िवाद जैसी कठिनाइयां आती ही हैं अतः समाज के नेताओं को इनके बारे में पूर्वनियोजित कार्यक्रम बनाने चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 151 की तिलावत सुनते हैंقَالَ رَبِّ اغْفِرْ لِي وَلِأَخِي وَأَدْخِلْنَا فِي رَحْمَتِكَ وَأَنْتَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ (151)मूसा ने कहा कि प्रभुवर! मुझे और मेरे भाई को क्षमा कर दे तथा हमें अपनी दया का पात्र बना कि तू सबसे अधिक दयावान है। (7:151)जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का क्रोध ठंडा हुआ तो उन्होंने इस बात के लिए ईश्वर से क्षमा चाही कि उन्होंने लोगों के सामने हज़रत हारून को बुरा भला कहा। और इस बात के दृष्टिगत कि संभवतः उनके भाई ने अपने दायित्व के निर्वाह में ढिलाई की हो, उनके लिए भी क्षमा याचना की क्योंकि क्षमा मांगना ईश्वरीय दया की कुंजी है। ईश्वर इस दया का स्रोत है और इस व्यापक दया का पात्र बनने का मार्ग क्षमा है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 152 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ اتَّخَذُوا الْعِجْلَ سَيَنَالُهُمْ غَضَبٌ مِنْ رَبِّهِمْ وَذِلَّةٌ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَكَذَلِكَ نَجْزِي الْمُفْتَرِينَ (152)निसंदेह जिन लोगों ने बछड़े की पूजा की, शीघ्र ही उनके पालनहार की ओर से उनकी ओर कोप आएगा, और उनके लिए सांसारिक जीवन में भी अपमान है और हम झूठ गढ़ने वालों को इसी प्रकार दंड दिया करते हैं। (7:152)यद्यपि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत से वापस आ गए थे और उन्होंने लोगों को बछड़े की पूजा करने पर आलोचना भी की थी किन्तु कुछ लोगों ने अपना यह काम नहीं छोड़ा था। ईश्वर इस आयत में कहता है कि ऐसे लोग इसी संसार में ईश्वरीय प्रकोप का पात्र बनकर अपमानित होते हैं क्योंकि उन्होंने सत्य को देखा परंतु उसका इनकार कर दिया।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के प्रिय बंदों का क्रोध ईश्वर के क्रोध का कारण बनता है। पिछली आयतों में हज़रत मूसा के क्रोध की बात कही गई थी। इस आयत में ईश्वर के कोप की बात कही गई है।ईश्वरीय नेताओं को छोड़कर झूठे नेताओं की शरण में जाने से संसार में अपमान सहना पड़ता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 153 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ عَمِلُوا السَّيِّئَاتِ ثُمَّ تَابُوا مِنْ بَعْدِهَا وَآَمَنُوا إِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (153)और जिन लोगों ने बुरे कर्म किए फिर तौबा करके ईमान ले आए तो निसंदेह इसके पश्चात तुम्हारा पालनहार अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (7:153)यह आयत उन लोगों से संबंधित है जिन्होंने आरंभ में बछड़े की पूजा की किन्तु हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम द्वारा सावधान किए जाने के पश्चात उन्हें चेतना आ गई और वे अपने कार्य पर पछताने लगे। इस गुट के बारे में ईश्वर कहता है कि यदि यह लोग प्रायश्चित करें और अनेकेश्वरवाद को त्याग कर पुनः ईमान ले आएं तो फिर ईश्वर उनकी तौबा को स्वीकार करके उन पर अपनी दया के द्वार खोल देगा।इस आयत से हमने सीखा कि तौबा का मार्ग सदैव खुला हुआ है और यह किसी समय से विशेष नहीं है।ईश्वर की दया व क्षमा की ओर से निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि ईश्वर बड़े से बड़े पाप को भी क्षमा कर सकता है।ईश्वर पापी को क्षमा करने के अतिरिक्त उसे अपनी दया का पात्र भी बनाता है।