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    सूरए आराफ़, आयतें 154-156, (कार्यक्रम 266)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 154 की तिलावत सुनते हैंوَلَمَّا سَكَتَ عَنْ مُوسَى الْغَضَبُ أَخَذَ الْأَلْوَاحَ وَفِي نُسْخَتِهَا هُدًى وَرَحْمَةٌ لِلَّذِينَ هُمْ لِرَبِّهِمْ يَرْهَبُونَ (154)और फिर जब मूसा का क्रोध ठंडा पड़ गया तो उन्होंने तौरैत की तख़्तियों को उठा लिया और उनमें अपने पालनहार से डरने वालों के लिए मार्गदर्शन और दया की बातें हैं। (7:154)इससे पहले हमने बताया था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत से वापस आए और उन्होंने देखा कि बनी इस्राईल के लोग एक सोने के बछड़े की पूजा करने लगे हैं तो वे अत्याधिक क्रोधित हो गए और उन्होनें तौरैत की तख़्तियां एक किनारे डाल दीं तथा बनी इस्राईल को इस काम से रोकने का प्रयास किया।यह आयत कहती है कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम शांत हुए और उनका क्रोध ठंडा पड़ा तो वे तौरैत की तख़्तियां उठाकर बनी इस्राईल के पास लाए ताकि तौरैत की शिक्षाओं और आदेशों से उन्हें अवगत कराएं क्योंकि हर आसमानी किताब की भांति तौरैत भी मार्गदर्शन और दया का कारण है। अलबत्ता ऐसे लोग इस मार्गदर्शन और दया से लाभ उठा सकते है जो ईश्वर पर ईमान रखते हों और उसके आदेशों के विरोध से डरते हों।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का भय, मनुष्य पर दया के द्वार खोल देता है। ईश्वर के अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं जिससे मनुष्य को डरते रहना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 155 की तिलावत सुनते हैं।وَاخْتَارَ مُوسَى قَوْمَهُ سَبْعِينَ رَجُلًا لِمِيقَاتِنَا فَلَمَّا أَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ قَالَ رَبِّ لَوْ شِئْتَ أَهْلَكْتَهُمْ مِنْ قَبْلُ وَإِيَّايَ أَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ السُّفَهَاءُ مِنَّا إِنْ هِيَ إِلَّا فِتْنَتُكَ تُضِلُّ بِهَا مَنْ تَشَاءُ وَتَهْدِي مَنْ تَشَاءُ أَنْتَ وَلِيُّنَا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنْتَ خَيْرُ الْغَافِرِينَ (155)और मूसा ने हमारे वादे के स्थान (पर आने) के लिए अपनी जाति के सत्तर लोगों का चयन किया, तो जैसे ही (धरती के) एक झटके ने उन्हें आ लिया तो मूसा ने कहा कि प्रभुवर! यदि तू चाहता तो पहले ही इन्हें भी और मुझे भी मार सकता था। क्या तू हमारी जाति के मूर्खों के कर्मों के कारण हमें मार देगा? यह तो केवल तेरी परीक्षा है जिसके द्वारा जिसे तू चाहता है पथभ्रष्टता में छोड़ देता है और जिसे चाहता है उसका मार्गदर्शन करता है। तू ही हमारा स्वामी है तो हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर कि तू सबसे अधिक क्षमाशील है। (7:155)हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने लोगों को अत्यधिक चमत्कार दिखाए थे किन्तु उनमें से अधिकांश लोगों का इस बात पर आग्रह था कि वि ईश्वर को स्वयं अपनी आंखों से देखें या फिर उसकी आवाज़ सुन लें। इसीलिए हज़रत मूसा ने उनमें से सत्तर लोगों का चयन किया और उन्हें लेकर वे तूर पर्वत पर आए ताकि ईश्वर पहले ही की भांति तूर पर्वत पर अपना जलवा दिखाए और वे ईश्वर के कथन को सुन सकें।परंतु बनी इस्राईल ने जब ईश्वर का कथन सुना तो हज़रत मूसा से आग्रह करने लगे कि वे ईश्वर से कहें कि वह स्वयं को उन्हें दिखाए। इसी समय पर्वत में एक भीषण झटका आया और वे सबके सब भय से मर गए। यह बात हज़रत मूसा के लिए बहुत कठिन थी। ऐसी स्थिति में वे सोच रहे थे कि किसी प्रकार वापास जाएं जबकि बनी इस्राईल के सत्तर प्रतिशत लोग जो उनके साथ आए थे, मर चुके थे। अतः ईश्वर के आदेश से वे सब जीवित हो गए और अपने जाति वालों के पास लौट आए।यह घटना, एक प्रकार की ईश्वरीय परीक्षा थी जो यहूदियों द्वारा ईश्वर को देखने की अनुचित मांग का कारण घटी। यह घटना भी अन्य ईश्वरीय परीक्षाओं की ही भांति लोगों के मार्गदर्शन तथा कुछ के पथभ्रष्ट होने का कारण बनी।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर लोगों के साथ अपने व्यवहार में विदित बातों के अनुसार काम करते हैं न कि अपने गुप्त ईश्वरीय ज्ञान के आधार पर। यही कारण है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम द्वारा चुने गए लोग, अयोग्य सिद्ध हुए।कठिनाइयां और कटु घटनाएं, ईश्वरीय परीक्षा का मंच हैं। इनके द्वारा भले और बुरे लोगों को पहचाना जाता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 156 की तिलावत सुनते हैंوَاكْتُبْ لَنَا فِي هَذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآَخِرَةِ إِنَّا هُدْنَا إِلَيْكَ قَالَ عَذَابِي أُصِيبُ بِهِ مَنْ أَشَاءُ وَرَحْمَتِي وَسِعَتْ كُلَّ شَيْءٍ فَسَأَكْتُبُهَا لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَالَّذِينَ هُمْ بِآَيَاتِنَا يُؤْمِنُونَ (156)और (हे प्रभुवर!) हमारे लिए इस संसार और प्रलय में भलाई लिख दे कि निसंदेह हम तेरी ही ओर पलट आए हैं। ईश्वर ने कहाः मैं अपना दंड जिसे चाहता हूं देता हूं और मेरी दया ने हर वस्तु को अपने घेरे में ले रखा है तो मैं अपनी दया शीघ्र ही उन लोगों के लिए लिख दूंगा जो मुझसे डरते हैं और ज़कात देते हैं और हमारी आयतों पर ईमान रखते हैं। (7:156)पिछली आयत की बात को आगे बढ़ाते हुए यह आयत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की प्रार्थना का वर्णन करती है। हज़रत मूसा ने बनी इस्राईल के पापियों और हठधर्मियों को क्षमा करने की हज़रत मूसा की प्रार्थना के उत्तर में कहा कि मेरी दया अत्याधिक व्यापक है और हर वस्तु को अपने घेरे में ले लेती है किन्तु उसकी प्राप्ति की शर्त ईमान, ईश्वर से भय और वंचित लोगों का ध्यान रखना है। जो कोई भी ऐसा न हो उसने स्वयं को मेरी दया से वंचित कर लिया है और वि मेरे दंड और कोप का पात्र बनेगा।कहा गया है कि जब यह आयत उतरी तो शैतान को भी लालच आया और उसने कहा कि मैं भी ईश्वर की दया का पात्र बन सकता हूं क्योंकि ईश्वर ने इस आयत में कहा कि सभी वस्तुओं को मेरी दया अपने घेरे में लिए हुए है जबकि जबकि इस व्यापक दया की प्राप्ति के लिए ईमान और ईश्वर से भय की आवश्यकता होती है जो शैतान तथा उसके अनुयाइयों के पास नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रार्थना करना पैग़म्बरों से सीखना चाहिए कि जो लोक-परलोक दोनों में भलाई चाहते थे, एक को दूसरे की बलि नहीं चढ़ाते थे।ईश्वर की दया उसके कोप से भी अधिक व्यापक है, इसी कारण तौबा व प्रायश्चित द्वारा पापियों को ईश्वर के दंड से मुक्ति मिल जाती है और वे उसकी दया का पात्र बनते हैं।