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    सूरए आराफ़, आयतें 157-159, (कार्यक्रम 267)

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    आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 157 की तिलावत सुनते हैंالَّذِينَ يَتَّبِعُونَ الرَّسُولَ النَّبِيَّ الْأُمِّيَّ الَّذِي يَجِدُونَهُ مَكْتُوبًا عِنْدَهُمْ فِي التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ يَأْمُرُهُمْ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَاهُمْ عَنِ الْمُنْكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ الطَّيِّبَاتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيْهِمُ الْخَبَائِثَ وَيَضَعُ عَنْهُمْ إِصْرَهُمْ وَالْأَغْلَالَ الَّتِي كَانَتْ عَلَيْهِمْ فَالَّذِينَ آَمَنُوا بِهِ وَعَزَّرُوهُ وَنَصَرُوهُ وَاتَّبَعُوا النُّورَ الَّذِي أُنْزِلَ مَعَهُ أُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (157)(ईश्वरीय दया का पात्र) वे लोग (बनते हैं) जो किसी से पाठ न पढ़े हुए पैग़म्बर का अनुसरण करते हैं जिसकी निशानियां अपने पास तौरैत और इंजील में लिखी हुई पाते हैं। वह पैग़म्बर उन्हें भलाइयों का आदेश देता है और बुराईयों से रोकता है और पवित्र वस्तुओं को उनके लिए वैध करता है और बुरी वस्तुओं को वर्जित करता है और उन पर से (कड़े आदेशों के) बोझ और फंदे को हटा देता है। तो जो लोग उस पर ईमान लाए और उसका सम्मान किया और उसकी सहायता की और उसके साथ आने वाले नूर अर्थात प्रकाश का अनुसरण किया तो वस्तुतः ऐसे ही लोग सफल हैं। (7:157)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के उन लोगों के बारे में, जो अपनी अनुचित बहानेबाज़ी और हठधर्मी के कारण ईश्वरीय कोप में ग्रस्त हो गए थे, प्रार्थना की ओर ईश्वर से क्षमा व दया का अनुरोध किया। ईश्वर ने कहा कि मेरी दया का पात्र सभी वस्तुएं हैं किन्तु केवल ईमान वाले और पवित्र लोग ही उससे लाभ उठाते हैं।यह आयत आगे चलकर कहती है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल के यहूदियों और ईश्वरीय किताब वालों में से भी वही लोग ईश्वरीय दया का पात्र बनते हैं कि जो अंतिम पैग़म्बर का अनुसरण करते हैं। वह ऐसा पैग़म्बर है जिसकी निशानियां उनके पास मौजूद तौरैत और इंजील में भी वर्णित हैं। वह ऐसा पैग़म्बर है जो भलाई का आदेश देता है और बुराइयों से रोकता है। वह ऐसा पैग़म्बर है जो ग़लत विचारों और अंधविश्वासों की ज़ंजीरों से उन्हें मुक्ति दिलाता है।यह पैग़म्बर सभ्यता से दूर अरब की धरती पर आया है और इसने किसी भी शिक्षक से शिक्षाप्राप्त नहीं की है किन्तु इसके कथन सबसे अच्छे हैं और यह सबसे अच्छे मार्ग की ओर लोगों को बुलाता है और यह उसकी बातों के ईश्वरीय कथन होने का सबसे अच्छा उदाहरण है।इस आयत से हमने सीखा कि पिछले पैग़म्बरों ने पैग़म्बरे इस्लाम के आगमन की शुभ सूचना दी है ता उनके नाम और चिन्हों का लिखित रूप से तौरैत व इंजील में वर्णन हुआ है।ग़लत प्रथाएं और अंधविश्वास आदि की ज़ंजीरें हैं जो लोगों को अपने बंधन में बांधे रखती है, पैग़म्बर लोगों को इन ज़ंजीरों से स्वतंत्र कराने के लिए आए हैं।ईश्वर के पैग़म्बरों पर ईमान लाना ही केवल काफ़ी नहीं है बल्कि उनका सम्मान भी करना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 158 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ فَآَمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ النَّبِيِّ الْأُمِّيِّ الَّذِي يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَكَلِمَاتِهِ وَاتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ (158)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि निसंदेह मैं तुम सबकी ओर ईश्वर का भेजा हुआ पैग़म्बर हूं कि जिसके पास आकाशों और धरती का स्वामित्व है। उसके अतिरिक्त कोई भी पूज्य नहीं है। वही जीवित करता है और मृत्यु देता है, तो ईश्वर पर और उसके पैग़म्बर पर ईमान लाओ और उसका अनुसरण करो कि जिसने किसी से भी शिक्षा प्राप्त नहीं की और जो ईश्वर तथा उसके कथनों पर ईमान रखता है। शायद तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो जाए। (7:158)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के वैश्विक होने की ओर संकेत करते हुए कहती है कि हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा को सभी लोगों के मार्गदर्शन के लिए भेजा गया था। वे किसी विशेष जाति या संप्रदाय के लिए नहीं आए थे। हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को भी उसी तत्वदर्शी ईश्वर ने भेजा है जिसने पिछले पैग़म्बरों को भेजा था। वे सबसे पहले ईश्वर तथा उसके कथनों पर ईमान रखते थे। अतः मनुष्य के मार्गदर्शन व कल्याण का मार्ग उनका तथा उनकी बातों का अनुसरण है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम धर्म के आने के पश्चात सभी धर्मों के अनुयाइयों का कर्तव्य यह है कि वे अंतिम आसमानी और ईश्वरीय संदेश पर ईमान लाएं और उसका अनुसरण करें।पैग़म्बरे इस्लाम के चरित्र को दृष्ट में रखते हुए ही क़ुरआने मजीद का अनुसरण मार्गदर्शन का कारण बनता है, इसके बिना क़ुरआन से मार्गदर्शन प्राप्त नहीं किया जा सकता।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 159 की तिलावत सुनते हैं।وَمِنْ قَوْمِ مُوسَى أُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِهِ يَعْدِلُونَ (159)और मूसा की जाति में एक गुट ऐसा भी है जो सत्य के साथ मार्गदर्शन करता है और सत्य के आधार पर न्याय से काम लेता है। (7:159)इस आयत में क़ुरआने मजीद बनी इस्राईल और यहूदियों के एक गुट की प्रशंसा करता है कि जो दूसरों के विपरीत सत्य व न्याय प्रेमी है तथा अन्य लोगों को भी न्याय की ओर बुलाता है ऐसा गुट हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के काल में भी मौजूद था कि जो हठधर्मी और बहानेबाज़ी के स्थान पर उनका तथा उनके आदेशों का पालन करता था और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल में भी मौजूद था जिसने उनके निमंत्रण को स्वीकार किया और वह उन पर ईमान लाया।इस आयत से हमने सीखा कि अपने विरोधियों के साथ भी न्याय करना चाहिए तथा उनकी भलाइयों और सेवाओं को नहीं भूलना चाहिए।क़ुरआन बनी इस्राईल के बुरे लोगों की भी बात करता है और उसके अच्छे लोगों का भी वर्णन करता है।केवल लोगों को सत्य और न्याय की ओर आमंत्रित करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि हमें व्यवहारिक रूप से भी सत्य तथा न्यायप्रेमी होना चाहिए।