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    सूरए आराफ़, आयतें 16-19, (कार्यक्रम 235)

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    आइये सूरए आराफ़ की 16वीं और 17वीं आयतों की तिलावत सुनते हैंقَالَ فَبِمَا أَغْوَيْتَنِي لَأَقْعُدَنَّ لَهُمْ صِرَاطَكَ الْمُسْتَقِيمَ (16) ثُمَّ لَآَتِيَنَّهُمْ مِنْ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ وَعَنْ أَيْمَانِهِمْ وَعَنْ شَمَائِلِهِمْ وَلَا تَجِدُ أَكْثَرَهُمْ شَاكِرِينَ (17)शैतान ने कहाः तो जैसा तूने मुझे पथभ्रष्ट किया, मैं भी तेरे सीधे मार्ग पर बहकाने के लिए उनकी घात में बैठूंगा। (7:16) फिर उनके सामने से, उनके पीछे से, उनकी दाहिनी ओर से और उनकी बाईं ओर से उन पर आक्रमण करूंगा और तू उनमें से अधिकांश को कृतज्ञ न पाएगा। (7:17)इससे पहले हमने कहा था कि आदम को सज्दा करने के ईश्वर के आदेश की अवहेलना के कारण शैतान को ईश्वर के दरबार से निकाल दिया गया और वो ईश्वर के प्रकोप का पात्र बना परंतु चूंकि ईश्वरीय परम्परा के अनुसार दंड और पारितोषिक प्रलय में दिया जाएगा और अपराधियों को संसार में तौबा करने या फिर उनके पाप का घड़ा भरने तक कि मोहलत दी जाती है अतः शैतान को भी प्रलय तक जीवित रहने की मोहलत दी गयी।इस आयत में हम पढ़ते हैं कि शैतान मनुष्य से प्रतिशोध लेने के लिए सौगंध खाता है कि वह उसे भी अपनी भांति पथभ्रष्ट करेगा और ईश्वर के दरबार से उसके निकलने का मार्ग प्रशस्त करेगा। अतः वह कहता है कि मैं चारों ओर से मनुष्य पर आक्रमण करूंगा और जिस प्रकार से भी संभव होगा, मैं उसे बहकाऊंगा।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम कहते हैं कि जब शैतान ने यह सौगंध खाई कि मैं हर ओर से मनुष्य की घात में रहूंगा तो फ़रिश्तों ने कहाः पालनहार! तो मनुष्य किस प्रकार शैतान से बचेगा? ईश्वर ने कहाः ऊपर और नीचे के दो मार्ग खुले हुए हैं। जब भी कोई मनुष्य प्रार्थना के हाथ उठाएगा या धरती पर सज्दा करेगा तो वह शैतान के बहकावे से बचा रहेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि अपने पापों और उद्दंडता को ईश्वर की मर्ज़ी बताना, शैतानी कर्म है।शैतान मनुष्य का कट्टर शत्रु है और उसने मनुष्य को बहकाने की सौगंध खाई है। अतः हमें उसका अनुसरण करने के स्थान पर कृपालु ईश्वर के आदेशों का पालन करना चाहिए।शैतान के बहकावों ने मनुष्य को चारों ओर से घेर रखा है और वह सदैव मनुष्य की घात में रहता है, अतः सदैव उसकी ओर से सावधान रहना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की 18वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَ اخْرُجْ مِنْهَا مَذْءُومًا مَدْحُورًا لَمَنْ تَبِعَكَ مِنْهُمْ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنْكُمْ أَجْمَعِينَ (18)ईश्वर ने कहाः अपमान और धिक्कार के साथ यहां से निकल जा। निसंदेह इनमें से जो कोई तेरा अनुसरण करेगा तो अवश्य ही नरक को मैं तुम सबसे भर दूंगा। (7:18)इस आयत के आधार पर, ईश्वर ने शैतान की सौगंध के उत्तर में जिसने कहा था कि मैं मनुष्यों को बहकाऊंगा, कहा कि तू और जो कोई तेरा अनुसरण करेगा वो अपमान और धिक्कार का पात्र बनेगा और नरक में जाएगा। इस स्थान से बाहर चला जा क्योंकि ये पवित्र लोगों और उपासकों का स्थान है।जो पाप ईश्वर के दरबार से शैतान के निकलने का कारण बना वो उसका अहं और घमंड था। जो भी ईश्वरीय आदेश के सामने घमंड से काम लेगा वो शैतान के मार्ग पर होगा और शैतान ही की भांति वो भी अपमान और धिक्कार का पात्र बनेगा।इस आयत से हमने सीखा कि शैतान बुरे काम के लिए उकसाता है परंतु वह पाप करने के लिए किसी को विवश नहीं करता। स्वयं मनुष्य निर्णय करता है और शैतान के मार्ग पर चलता है।संसार में शैतान का अनुसरण, प्रलय में उसी के साथ रहने का कारण है।आइये अब सूरए आराफ़ क 19वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَيَا آَدَمُ اسْكُنْ أَنْتَ وَزَوْجُكَ الْجَنَّةَ فَكُلَا مِنْ حَيْثُ شِئْتُمَا وَلَا تَقْرَبَا هَذِهِ الشَّجَرَةَ فَتَكُونَا مِنَ الظَّالِمِينَ (19)(ईश्वर ने कहाः) हे आदम! तुम और तुम्हारी पत्नी दोनों स्वर्ग में रहो, और जो चाहो खाओ परंतु (सावधान!) इस पेड़ के निकट (भी) न जाना वरना तुम दोनों अत्याचारियों में से हो जाओगे। (7:19)शैतान द्वारा आदम को सज्दा करने से इन्कार और उसके परिणाम स्वरूप ईश्वर के दरबार से उसके निष्कासन का उल्लेख करने के पश्चात, इस आयत और बाद की आयतों में क़ुरआने मजीद, हज़रत आदम और उनकी पत्नी के स्वर्ग में हने की ओर संकेत करता है और कहता है कि ईश्वर के आदेश का पालन न करने के कारण, वे स्वर्ग से निकलने पर विवश हुए और अनेक कठिनाइयों में ग्रस्त हुए।ये आयत कहती है कि ईश्वर ने हज़रत आदम और उनकी पत्नी को स्वर्ग में स्थान दिया जिसमें विभिन्न प्रकार के पेड़ और फल थे। ईश्वर ने उन्हें सभी प्रकार के फलों के प्रयोग की अनुमति प्रदान की थी और केवल एक विशेष पेड़ से दूर रहने को कहा था परंतु उन्होंने उस पेड़ का फल खा लिया और अपने आप पर अत्याचार किया। मनुष्य द्वारा ईश्वर के आदेश की यह पहली अवहेलना थी जो बाद में उसके लिए कठिनाइयों का कारण बनी।यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि प्रतिबंधित पेड़ के पास न जाने के लिए आदम को ईश्वर का आदेश, उन आदेशों में से नहीं था कि जिनका पालन न करने से मनुष्य पापी बनता है, बल्कि इसका लक्ष्य यह था कि उस पेड़ के समीप न जाने में आदम की भलाई है, क्योंकि हज़रत आदम ईश्वर के पैग़म्बर थे और पैग़म्बर कभी भी पाप नहीं करते परंतु चूंकि ईश्वर के निकट हज़रत आदम का अत्यंत उच्च स्थान था, अतः यह छोटी भूल भी ईश्वर को अच्छी नहीं लगी।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने मनुष्य का आराम चाहा था परंतु ये स्वयं मनुष्य था जिसने अपनी उद्दंडता से अपने लिए कठिनाइयां और समस्याएं खड़ी कीं।अपने पेट और खाने पीने का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि आदम की पहली उद्दंडता पेट ही इच्छा पूरी करने हेतु थी।प्रतिबंधित और वर्जित बातों के वर्णन से पूर्व हमें वैध और हलाल मार्गों का उल्लेख करना चाहिए ताकि स्वाभाविक रूप से आवश्यकताओं की पूर्ति की भूमि समतल हो जाए।न केवल पाप बल्कि पाप के क्षेत्र के निकट जाने से भी ईश्वर ने रोका है क्योंकि पाप के निकट जाने से मनुष्य उससे दूषित हो जाता है।