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    सूरए आराफ़ आयतें 160-162, (कार्यक्रम 268)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 160 की तिलावत सुनते हैं।وَقَطَّعْنَاهُمُ اثْنَتَيْ عَشْرَةَ أَسْبَاطًا أُمَمًا وَأَوْحَيْنَا إِلَى مُوسَى إِذِ اسْتَسْقَاهُ قَوْمُهُ أَنِ اضْرِبْ بِعَصَاكَ الْحَجَرَ فَانْبَجَسَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًا قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍ مَشْرَبَهُمْ وَظَلَّلْنَا عَلَيْهِمُ الْغَمَامَ وَأَنْزَلْنَا عَلَيْهِمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَى كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (160)और हमने मूसा की जाति के लोगों को बारह गुटों में बांट दिया और जब उनकी जाति वालों ने उनसे पानी मांगा तो हमने मूसा की ओर अपना विशेष संदेश “वहि” भेजा कि अपनी लाठी को उस पत्थर पर मारो। (जब उन्होंने ऐसा किया) तो उस पत्थर से बारह सोते फूट पड़े। और हर गुट ने अपने घाट को पहचान लिया। और हमने उनके सिरों पर बादल की छाया की और उनके लिए मन्न व सल्वा (जैसे व्यंजन) भेजे (और कहा कि) हमने तुम्हें जो पवित्र और उत्तम वस्तुएं दी हैं उन्हें खाओ (किन्तु उन्होंने विरोध करके) हमारे ऊपर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने अपने आप पर अत्याचार किया। (7:160)हेब्रू भाषा में इस्राईल का अर्थ होता है ईश्वर का बंदा और इस्राईल हज़रत याक़ूब की उपाधि थी अतः बनी इस्राईल का अर्थ है, याक़ूब के पुत्र कि जो 12 थे। उनमें से हर एक बनी इस्राईल जाति का पूर्वज बना।इस आयत में ईश्वर कहता है कि अपनी जाति वालों के लिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का एक चमत्कार ये भी था कि जिस लाठी को नील नदी पर उन्होंने मारा तो पानी की धारा बीच से फट गई और नदी के भीतर से मार्ग प्रकट हो गया और बनी इस्राईल उस पर से गुज़र गए, उसी लाठी से उन्होंने पहाड़ पर मारा तो उसमें से बारह सोते फूट निकले और बनी इस्राईल के सभी बारह गुट एक एक सोते का प्रयोग करने लगे।इसी प्रकार तीह के मरुस्थल में बनी इस्राईल के चालीस वर्षों के जीवन में बादल, उनके सिरों पर छाया करने के लिए ठहरे रहते ताकि धूप और गर्मी से उन्हें सुरक्षित रखें। इसी प्रकार भुने हुए स्वादिष्ट पक्षियों का मांस आकाश से नीचे आता था ताकि उन्हें भोजन की ओर से कोई चिंता न रहे।किन्तु सारी अनुकंपाओं और चमत्कारों के बावजूद, बनी इस्राईल के अधिकांश लोगों ने अकृतज्ञता से काम लिया और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के आदेशों की अवहेलना की। यह आयत अंत में कहती है कि लोग यह न सोचें कि ईश्वर के आदेशों की अवहेलना करके, उन्होंने ईश्वर को क्षति पहुंचाई है, नहीं बल्कि उन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया और स्वयं को घाटा पहुंचाया।इस आयत से हमने सीखा कि लक्ष्य में एकता को सुरक्षित रखते हुए लोगों का विभिन्न गुटों में बंटना, बुरा नहीं है बल्कि कभी कभी यह कामों के बंटवारे और सामाजिक कार्यों को सरल बनाने के लिए आवश्यक है।कठिनाइयों से मुक्ति के लिए पैग़म्बरों को माध्यम बनाना, एकेश्वरवाद से विरोधाभास नहीं रखता बल्कि इससे प्रार्थना शीघ्र स्वीकार होने की संभावना है।ईश्वर ने खाने पीने की पवित्र व हलाल वस्तुएं बड़ी सरलता से मनुष्य को उपलब्ध करा दी हैं, उसके पश्चात उसने मनुष्य से कहा कि वह हराम अर्थात वर्जित वस्तुओं का प्रयोग न करे। जब हलाल वस्तुएं, हराम वस्तुओं की तुलना में अधिक सरलता से उपलब्ध हैं तो हम ईश्वर के आदेश की अवहेलना क्यों करें?आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 161 और 162 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ قِيلَ لَهُمُ اسْكُنُوا هَذِهِ الْقَرْيَةَ وَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ وَقُولُوا حِطَّةٌ وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا نَغْفِرْ لَكُمْ خَطِيئَاتِكُمْ سَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ (161) فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًا مِنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَظْلِمُونَ (162)और जब बनी इस्राईल से कहा गया कि इस बस्ती (अर्थात बैतुलमुक़द्दस) में जा कर रहो और यहां जो चाहो खाओ (किन्तु बस्ती में प्रवेश से पूर्व) हित्ता कहो (अर्थात प्रभुवर! हमारे पापों को झाड़ दे) और (इसी प्रकार) सज्दा करते हुए बस्ती में प्रवेश करो ताकि हम तुम्हारी ग़ल्तियों को क्षमा कर दें, शीघ्र ही हम भले कर्म करने वालों के पारितोषिक में वृद्घि कर देंगे। (7:161) किन्तु बनी इस्राईल के अत्याचारियों ने जो शब्द उनसे कहा गया था उसे परिवर्तित कर दिया तो हमने उनकी इस उद्दंडता और अत्याचार के बदले में आकाश से उन पर दंड भेजा। (7:162)मरूस्थल के कठिन जीवन के पश्चात बनी इस्राईल को बैतुल मुक़द्दस में जा रहने की अनुमति मिली। किन्तु उनसे कहा गया कि बस्ती में प्रवेश के समय, अपनी उद्दंडता और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को सताने के कारण वे ईश्वर से क्षमा मांगे और ईश्वर के समक्ष नतमस्तक हों ताकि पापियों को क्षमा किया जाए और जिन्होंने पाप नहीं किए हैं उनके पारितोषिक में वृद्धि की जाए।किन्तु हठधर्मी जाति ने ईश्वर के इस आदेश का भी परिहास किया और हित्ता शब्द के स्थान पर हिन्ता अर्थात गेहूं कहना आरंभ किया। उन्होंने क्षमा याचना के स्थान पर परिहास किया अतः क़ुरआने मजीद कहता हे कि उन्हें ईश्वरीय दंड का पात्र बनना पड़ा और इसका कारण वह अत्याचार था जो उन्होंने स्वयं और ईश्वर के धर्म पर किया था और ईश्वरीय आदेश का परिहास किया था।इन आयतों से हमने सीखा कि तौबा व पापों पर क्षमा याचना, भौतिक अनुकंपाओं से भी मनुष्य के लाभान्वित होने की भी भूमि समतल करती है।ईश्वर ने मनुष्य की सभी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर दी है किन्तु मनुष्य के पाप अनुकंपाओं के मार्ग में बाधा और दंड का पात्र बनने का कारण बन जाते हैं किन्तु तौबा व प्रायश्चित द्वारा इन अनुकंपाओं को पुनः प्राप्त किया जा सकता है।मस्जिद जैसे पवित्र स्थल में प्रविष्ट होने के कुछ शिष्टाचारिक नियम होते हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए।न केवल हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पश्चात बल्कि स्वयं उनके जीवन में भी कुछ ईश्वरीय आयतों में परिवर्तन और फेर बदल किया गया।सारे दंड प्रलय से विशेष नहीं हैं बल्कि कुछ पाप ऐसे हैं जिनका दंड इसी संसार में दिया जाता है।