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    सूरए आराफ़, आयतें 163-166, (कार्यक्रम 269)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 163 की तिलावत सुनते हैं।وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ لَا تَأْتِيهِمْ كَذَلِكَ نَبْلُوهُمْ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ (163)(हे पैग़म्बर!) यहूदियों से उस बस्ती के बारे में पूछिए जो समुद्र के किनारे स्थित थी कि जिसके लोग शनिवार के बारे में ईश्वरीय क़ानून की सीमा तोड़ते थे क्योंकि शनिवार की छुट्टी के दिन मछलियां समुद्र के किनारे उनके निकट आ जाती थीं और जिस दिन छुट्टी नहीं होती थी मछलियां उनके निकट नहीं आती थीं। हमने उनकी उद्दंडता के कारण उनकी इस प्रकार परीक्षा ली। (7:163)यहूदी जाति के लिए एक ईश्वरीय आदेश शनिवार की छुट्टी का था। इस दिन उन्हें सांसारिक काम-काज छोड़ कर ईश्वर की उपासना करनी होती थी। यह क़ानून आज भी यहूदियों के बीच सम्मानीय है किंतु बनी इस्राईल का एक गुट, जो समुद्र तट के निकट जीवन व्यतीत करता था, देखा करता था कि शनिवार के दिन जब वे मछलियां नहीं पकड़ते तो मछलियां तट पर उनके सामने आ जाती हैं किंतु अन्य दिनों में ऐसा नहीं होता और उन्हें मछलियां पकड़ने के लिए समुद्र में जाना पड़ता है।उन लोगों ने ईश्वरीय आदेश के पालन और मछलियों को भी हाथ से न जाने देने के लिए एक चाल चली और तट पर छोटे छोटे हौज़ और गढ़े बना दिए। शनिवार को वे मछलियों को इनमें पकड़ लेते थे और समुद्र में वापस न जाने देते थे। फिर अगले दिन उन हौज़ों और गढ़ों में से मछलियों को निकाल लेते थे।क़ुरआने मजीद ईश्वरीय आयत के प्रति इस प्रकार के रवैये को भी क़ानून की सीमा का उल्लंघन बताता है। वह कहता है कि मछलियों का आना और न आना उन लोगों के लिए ईश्वर की परीक्षा थी ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि उनकी दृष्टि में ईश्वर का आदेश महत्त्वपूर्ण है या कुछ मछलियों का शिकार? इस आयत से हमने सीखा कि धोखे और बहानेबाज़ी से पाप की बुराई समाप्त नहीं होती बल्कि इससे पाप का ख़तरा बढ़ जाता है क्योंकि मनुष्य उसे पाप ही नहीं मानता और न ही तौबा करता है।संसार में कभी कभी हलाल अर्थात वैध वस्तुओं से भी परीक्षा ली जाती है और मनुष्य को ईश्वर के लिए हलाल वस्तुए भी छोड़ देनी चाहिए। मछली पकड़ना वैध है किन्तु उनके लिए अनिवार्य था कि वे शनिवार के दिन मछली न पकड़ें।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 164 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَى رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ (164)और जब बनी इस्राईल के एक गुट ने (लोगों को बुराई से रोकने वाले एक अन्य गुट से) कहा कि क्यों तुम ऐसी जाति को उपदेश देते हो जिसे ईश्वर समाप्त करने वाला है या कम से कम जिसे अत्यंत कड़ा दंड देने वाला है? उन्होंने (उत्तर में) कहाः इसलिए ताकि हमारे लिए तुम्हारे पालनहार के निकट बताने को कोई बात रहे और शायद यह लोग ईश्वर से डरने ही लगें। (7:164)क़ुरआने मजीद बनी इस्राईल के लोगों को तीन गुटों में बांटता है, एक क़ानून तोड़ने वाला गुट, दूसरा उपदेश करने वाला गुट और तीसरा तटस्थ रहने वाला गुट।यह आयत कहती है कि तटस्थ रहने वाले लोग, उपदेशकों से कहते थे कि अकारण स्वयं को मत थकाओ। पापियों पर तुम्हारे उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। इनका हिसाब तो ईश्वर के हाथ में है, वह चाहेगा तो इन्हें दंडित करेगा या फिर इन्हें समाप्त ही कर देगा।किन्तु लोगों की भलाई चाहने और उपदेशो देने वाले कहते कि प्रथम तो हमारे उपदेश प्रभावहीन नहीं हैं, बहुत से ऐसे लोग हो सकते हैं जो इन उपदेशों के कारण पाप करना छोड़ दें या फिर कम पाप करें और दूसरे यह कि यदि वे हमारी बात न भी मानें तो कम से कम हम ईश्वर से यह कह सकेंगे कि हमने लोगों को बुराई से रोकने के अपने ईश्वरीय दायित्व का निर्वाह किया है और ईश्वर इस संबंधं में हमें दंडित नहीं करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि कुछ लोग न स्वयं उपदेश देते हैं न दूसरों को उपदेश देते देखना चाहते हैं, वे पापियों पर आपत्ति करने के स्थान पर उपदेशकों पर आपत्ति करते हैं।लोगों को बुराई से रोकना एक अनिवार्य काम है, चाहे उसका प्रभाव न होने की संभावना हो तब भी। हमारा काम दायित्व का निर्वाह करना है, उसके परिणाम का हम पर कोई दायित्व नहीं है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 165 और 166 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِهِ أَنْجَيْنَا الَّذِينَ يَنْهَوْنَ عَنِ السُّوءِ وَأَخَذْنَا الَّذِينَ ظَلَمُوا بِعَذَابٍ بَئِيسٍ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ (165) فَلَمَّا عَتَوْا عَنْ مَا نُهُوا عَنْهُ قُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِئِينَ (166)तो उन्होंने उन उपदेशों को जो उन्हें दिए गए थे, भुला दिया तो हमने बुराइयों से रोकने वालों को बचा लिया और अत्याचारियों को उनकी अवज्ञा के कारण कड़े दंड में ग्रस्त कर दिया। (7:165) तो जब उन्होंने रोके जाने के बाद भी वही काम किया तो हमने उनसे कह दिया कि धिक्कारे हुए बंदर बन जाओ। (7:166)पिछली आयतों में हमने बताया कि बनी इस्राईल के कुछ लोग पापी थे, कुछ पापों से रोकने वाले और कुछ तटस्थ। ये आयतें कहती हैं कि इन तीन गुटों में से केवल उन्हीं लोगों को मुक्ति मिली जो पापों से रोकते थे। तटस्थ लोग भी पापियों के दंड में सहभागी हुए और वह भी अत्यंत कड़ा दंड कि जिसके परिणाम स्वरूप वे लोग बंदर बन गए।इस संबंध में कहा गया है कि वे लोग शारीरिक दृष्ट से बंदरों की भांति हो गए थे और कुछ दिनों से अधिक जीवित न रह सके और उनका वंश समाप्त हो गया।इन आयतों से हमने सीखा कि बुराइयों से रोकना यदि दूसरों के मार्गदर्शन का कारण न बन सके तो कम से कम ईश्वरीय दंड से मनुष्य की मुक्ति का कारण तो बनता ही है।अपने लिए उपदेश का मार्ग बंद करना, स्वयं के लिए ईश्वरीय कोप का द्वार खोलने के समान है।पापियों और अत्याचारियों के मुक़ाबले में चुप रहना, मनुष्य को उनके दंड में भागीदार बना देता है।जो लोग ईश्वर के आदेश में फेरबदल करते हैं, उनके चेहरे भी बदल जाते हैं, जो लोग ईश्वरीय धर्म के साथ खिलवाड़ करते हैं वे बंदरों के समान हो जाते हैं।