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    सूरए आराफ़, आयतें 167-169, (कार्यक्रम 270)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 167 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكَ لَيَبْعَثَنَّ عَلَيْهِمْ إِلَى يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ يَسُومُهُمْ سُوءَ الْعَذَابِ إِنَّ رَبَّكَ لَسَرِيعُ الْعِقَابِ وَإِنَّهُ لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (167)और (याद करो) उस समय जब तुम्हारे पालनहार ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि वह प्रलय तक के लिए उस (अत्याचारी गुट) पर ऐसे लोगों को थोप देगा जो उन्हें निरंतर कड़े दंड में ग्रस्त रखेंगे। निसंदेह तुम्हारा पालनहार (अत्याचारियों को) अत्यंत शीघ्र दंडित करने वाला और (तौबा करने वालों के प्रति) क्षमाशील और दयावान है। (7:167)इससे पहले हमने बताया कि बनी इस्राईल के एक गुट ने शनिवार का दिन शिकार और काम की छुट्टी होने तथा इस दिन केवल उपासना करने के ईश्वर के आदेश की अवहेलना की और बड़ी चतुराई और धूर्तता के साथ शनिवार के दिन मछली का शिकार करना जारी रखा जिसके पश्चात उन लोगों पर ईश्वर का कड़ा दंड आया और वे सबके सब बंदर बन गए।इस आयत में ईश्वर कहता है कि जो लोग ईश्वरीय आदेशों का परिहास करेंगे या ईश्वर की शिक्षाओं से खिलवाड़ करेंगे, ईश्वर इसी संसार में उन्हें कड़े दंड में ग्रस्त कर देगा और ऐसा मार्ग प्रशस्त कर देगा कि वे सदैव कठिनाइयों में घिरे रहें। अलबत्ता यदि इस प्रकार के लोग सच्चे मन से तौबा और प्रायश्चित कर लें तो ईश्वर उन्हें क्षमा करके अपनी दया का पात्र बना लेगा।इस आयत से हमने सीखा कि यहूदी जाति के अत्याचारी प्रलय तक कठिनाइयों और मुसीबतों में घिरे रहेंगे, उन्हें कभी भी चैन का सांस लेना नसीब नहीं होगा।ईश्वरीय दया की आशा के साथ ही दंड का भय, मनुष्य की प्रगति और उसके प्रशिक्षण का कारण बनता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 168 की तिलावत सुनते हैं।وَقَطَّعْنَاهُمْ فِي الْأَرْضِ أُمَمًا مِنْهُمُ الصَّالِحُونَ وَمِنْهُمْ دُونَ ذَلِكَ وَبَلَوْنَاهُمْ بِالْحَسَنَاتِ وَالسَّيِّئَاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ (168)और हमने बनी इस्राईल को विभिन्न जातियों और गुटों में बांट दिया उनमें से कुछ अच्छे (चरित्र और कर्म वाले) हैं और कुछ इसके विपरीत और हमने आराम और कठिनाइयों के माध्यम से उनकी परीक्षा ली कि शायद वे (सही मार्ग पर) पलट आएं। (7:168)पिछली आयत में प्रलय तक यहूदी जाति के अपमान की सूचना दी गई थी। यह आयत कहती है, वे लोग एकजुट संप्रदाय नहीं हैं बल्कि वे सदैव बंटे हुए और विभाजित रहे हैं और कभी भी उनका कोई स्थायी देश नहीं रहा है।अलबत्ता ऐसा नहीं है कि यहूदी जाति के सभी लोग पथभ्रष्ट और बुरे हों, बल्कि उनके बीच अच्छे लोग भी मौजूद हैं किन्तु चूंकि इस जाति के अधिकांश लोग हठधर्म थे अतः पूरे इतिहास में बनी इस्राईल के नसीब में अपमान ही अपमान रहा है।आगे चलकर आयत कहती हैः ईश्वर की परंपरा, लोगों की परीक्षा की रही है और यहूदी जाति भी इससे अलग नहीं है। ईश्वर ने सदैव कड़ाई, कठिनाई, ऐश्वर्य और आराम के माध्यम से इस जाति की परीक्षा ली है ताकि शायद इस जाति के लोग सचेत हो जाएं और अतीत के बुरे कर्मों को छोड़ दें।इस आयत से हमने सीखा कि अपने विरोधियों के साथ भी न्याय से काम लेना चाहिए, उनकी बुराईयों के साथ उनकी भलाइयों का भी उल्लेख करना चाहिए।ईश्वर की परीक्षा का एक परिणाम मनुष्य का सचेत होना और तौबा करना है। आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 169 की तिलावत सुनते हैं।فَخَلَفَ مِنْ بَعْدِهِمْ خَلْفٌ وَرِثُوا الْكِتَابَ يَأْخُذُونَ عَرَضَ هَذَا الْأَدْنَى وَيَقُولُونَ سَيُغْفَرُ لَنَا وَإِنْ يَأْتِهِمْ عَرَضٌ مِثْلُهُ يَأْخُذُوهُ أَلَمْ يُؤْخَذْ عَلَيْهِمْ مِيثَاقُ الْكِتَابِ أَنْ لَا يَقُولُوا عَلَى اللَّهِ إِلَّا الْحَقَّ وَدَرَسُوا مَا فِيهِ وَالدَّارُ الْآَخِرَةُ خَيْرٌ لِلَّذِينَ يَتَّقُونَ أَفَلَا تَعْقِلُونَ (169)फिर उनके पश्चात ऐसे (बुरे) लोगों ने उनका स्थान ले लिया कि जो आसमानी किताब (तौरैत) के उत्तराधिकार (तो) बने (किन्तु) उन्होंने (उसका मूल्य नहीं समझा और) इस तुच्छ (संसार) का माल समेटते रहे और उन्होंने कहाः हमें शीघ्र ही क्षमा कर दिया जाएगा और यदि पुनः उन्हें वैसा ही (भौतिक) माल मिल जाए तो उसे भी ले लेते हैं। क्या ईश्वर की किताब में उनसे वचन नहीं लिया गया था कि सत्य के अतिरिक्त कोई और बात ईश्वर के संबंध में नहीं कहेंगे? और वे लोग उस किताब और उसमें वर्णित वचनों को अनेक बार पढ़ चुके हैं। निसंदेह प्रलय का घर, ईश्वर से डरने वालों के लिए अधिक बेहतर है, क्या तुम इसके बारे में विचार नहीं करते? (7:169)इन आयतों में यहूदी जाति के इतिहास का वर्णन करते हुए क़ुरआने मजीद कहता है वे लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम या बनी इस्राईल के अन्य पैग़म्बरों के काल में थे, और उन पैग़म्बरों को देखते तथा उनकी बातों को सुनते थे, उन्होंने हठधर्म, द्वेष या परिहास के कारण आसमानी किताब तथा ईश्वरीय पैग़म्बरों का मूल्य नहीं समझा और कड़े दंड में ग्रस्त हुए। जो लोग उनके बाद आए, यद्यपि उनके पास आसमानी किताब मौजूद है और वे उसकी बातों से अवगत हैं किन्तु फिर भी उन्होंने संसार को प्रलय पर प्राथमिकता दे रखी है और धन संपत्ति तथा सत्ता ने उन्हें अंधा बना दिया है। घमंड, अहं और वर्चस्व ने उन्हें इस प्रकार अपने घेरे में ले रखा है कि वे स्वयं को श्रेष्ठ जाति समझते हैं और कहते हैं कि यद्यपि हम संसार से प्रेम करते हैं और प्रलय के लिए कोई काम नहीं करते किन्तु ईश्वर प्रलय के दिन हमें क्षमा करके स्वर्ग में भेज देगा।इस आयत में ईश्वर कहता है कि ये किस प्रकार की व्यर्थ तथा निराधार बातें हैं जिन्हें तुम ईश्वर से संबंधित कर रहे हो। तुम जो तौरैत पढ़ चुके हो और जानते हो कि ऐसी कोई बात नहीं है तो क्यों ईश्वर से नहीं डरते और अपने कर्मों के बारे में क्यों विचार नहीं करते?इस आयत से हमने सीखा कि मायामोह और संसार प्रेम, धर्म के लिए एक बड़ी समस्या है और मनुष्य को प्रलय की ओर से निश्चेत कर देता है।बिना कर्म के ईश्वरीय दया की आशा रखना एक व्यर्थ और असंभव आशा है।