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    सूरए आराफ़ आयतें 170-174 (कार्यक्रम 271)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 170 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ يُمَسِّكُونَ بِالْكِتَابِ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ إِنَّا لَا نُضِيعُ أَجْرَ الْمُصْلِحِينَ (170)और जो लोग आसमानी किताब से जुड़े रहते हैं (अर्थात उसके आदेशों का पालन करते हैं) और उन्होंने नमाज़ भी स्थापित की है तो निसंदेह हम भले कर्म वालों के प्रतिफल को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। (7:170)इससे पहले की आयतों में क़ुरआने मजीद ने उन लोगों की आलोचना की थी जिनके पास आसमानी किताब तो है किन्तु उन्होंने भौतिक हितों के लिए उसे छोड़ दिया है और उसके आदेशों का पालन नहीं करते।इस आयत में क़ुरआने मजीद उन लोगों की सराहना करता है जो आसमानी किताब से जुड़े रहते हैं और उसके आदेशों विशेषकर नमाज़ और प्रार्थना पर ध्यान देते हैं। यद्यपि नमाज़ आसमानी किताबों की सिफ़ारिशों का ही एक अंश है किन्तु उसका अलग से उल्लेख हुआ है क्योंकि नमाज़ को सभी ईश्वरीय धर्मों में उच्च और विशेष स्थान प्राप्त रहा है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कथनानुसार नमाज़, धर्म का चेहरा और उसकी पहचान है।इस आयत से हमने सीखा कि आसमानी किताबों को केवल पढ़ना और कंठस्थ करना पर्याप्त नहीं है, उनके आदेशों का पालन करना चाहिए ताकि वे हमारे लिए मोक्ष व कल्याण का कारण बनें।व्यक्ति और समाज का वास्तविक सुधार, धार्मिक आदेशों के पालन पर निर्भर है और ईश्वरीय शिक्षाओं से अनभिज्ञ समाज सुधार के दावेदारों को कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है।आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 171 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ نَتَقْنَا الْجَبَلَ فَوْقَهُمْ كَأَنَّهُ ظُلَّةٌ وَظَنُّوا أَنَّهُ وَاقِعٌ بِهِمْ خُذُوا مَا آَتَيْنَاكُمْ بِقُوَّةٍ وَاذْكُرُوا مَا فِيهِ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ (171)और जब हमने (तूर) पर्वत को उसके स्थान से उखाड़ कर उनके (सिरों के) ऊपर छत की भांति ढांक दिया और उन्होंने सोच लिया कि निसंदेह वह उन पर गिरने (ही) वाला है। (तो) हमने उनसे कहा कि हमने जो कुछ (आदेश) तुम्हें दिए हैं उन्हें मज़बूती से पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसे याद करो कि शायद तुम में ईश्वर का भय उत्पन्न हो जाए। (7:171)इस आयत में कि जो बनी इस्राईल के बारे में सूरए आराफ़ की अंतिम आयत है, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के काल में प्रकट होने वाले एक अन्य ईश्वरीय चमत्कार का वर्णन हुआ है जिसे लोगों ने अपनी आंखों से देखा था। जब हज़रत मूसा तूर पर्वत से वापस लौटे और उन्होंने तौरैत की तख़्तियां अपनी जाति को दिखाईं तो बनी इस्राईल ने उनका विरोध किया और ईश्वरीय आदेश को स्वीकार नहीं किया।ईश्वर ने उन लोगों को सचेत करने के लिए तूर पर्वत को उसके स्थान से उखाड़ कर उनके सिरों के ऊपर खड़ा कर दिया। वे सब भयभीत होकर सज्दे में गिर पड़े और फिर उन्होंने आज्ञापालन का वचन दिया किन्तु इसके बावजूद उनमें से कुछ लोग धर्म से बाहर निकल गए।इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी ईश्वर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है ताकि सोए और निश्चेत लोगों को सचेत करे।ईश्वरीय आदेशों को केवल सीख लेना पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें सदैव याद करते रहना चाहिए ताकि हम उन्हें भूल न जाएं।आसमानी किताब को गंभीरता से लेना चाहिए और उसके आदेशों का गंभीरता से पालन करना चाहिए।आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 172 से 174 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذْ أَخَذَ رَبُّكَ مِنْ بَنِي آَدَمَ مِنْ ظُهُورِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَأَشْهَدَهُمْ عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ قَالُوا بَلَى شَهِدْنَا أَنْ تَقُولُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ إِنَّا كُنَّا عَنْ هَذَا غَافِلِينَ (172) أَوْ تَقُولُوا إِنَّمَا أَشْرَكَ آَبَاؤُنَا مِنْ قَبْلُ وَكُنَّا ذُرِّيَّةً مِنْ بَعْدِهِمْ أَفَتُهْلِكُنَا بِمَا فَعَلَ الْمُبْطِلُونَ (173) وَكَذَلِكَ نُفَصِّلُ الْآَيَاتِ وَلَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ (174)और जब तुम्हारे पालनहार ने आदम के बेटों की पीठ से उनकी संतान को निकाला और उन्हें स्वयं उनके ऊपर गवाह बनाया (और पूछा) कि क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूं? उन्होंने कहाः क्यों नहीं, हम (इस बात की) गवाही देते हैं। यह (स्वीकारोक्ति हमने इसलिए ली) है कि प्रलय के दिन तुम यह न कहो कि हम इससे अनभिज्ञ थे। (7:172) या यह कहो कि हमसे पूर्व हमारे पूर्वज अनेकेश्वरवादी थे। और हम तो उनके पश्चात उनकी संतान हैं (और उनका मार्ग जारी रखने पर विवश थे) तो क्या तू हमें ग़लत कर्म करने वालों के बदले तबाह करेगा। (7:173) और इस प्रकार हम (अपनी) निशानियों को विस्तारपूर्वक बयान करते हैं और शायद वे (सही मार्ग पर) पलट आएं। (7:174)ये आयतें दर्शाती हैं कि पालनहार के प्रति मनुष्य की आवश्यकता, उसके व्यक्तित्व का अटूट अंग है। ये आयतें इस बात की ओर संकेत करती है कि ईश्वर ने समस्त मानवजाति से अपने पालनहार होने की स्वीकारोक्ति ली है और सभी मनुष्यों ने उसके पालनहार होने को स्वीकार किया है और ईश्वर प्रलय के दिन इस वचन के बारे में में उनसे प्रश्न करेगा।यद्यपि क़ुरआने मजीद ने इस प्रतिज्ञा की शैली के बारे में संकेत नहीं किया है किन्तु क़ुरआन के व्याख्याकारों ने इस संबंध में विभिन्न बातें कहीं हैं। कुछ व्याख्याकार इस वचन को प्रवृत्ति का वचन मानते हैं और कहते है कि पिताओं की पीठ से निकलकर माताओं की कोख में आने के समय उनकी संतानों में ईश्वर, सत्य की खोज और एकेश्वरवाद की प्रवृत्ति रख देता है और यह बात सभी मनुष्यों की प्रवृत्ति में मौजूद है।अतः हर व्यक्ति अपने हृदय में ईश्वर को पाता है और उसकी ओर झुकाव रखता है। यह ईश्वरीय वचन इसलिए है कि मनुष्य प्रलय में यह न कह सके कि हम अपने अनेकेश्वरवादी पूर्वजों के अनुसरण में अनेकेश्वरवादी बन गए और हमारे पास इसके अतिरिक्त कोई मार्ग न था या यह कि हम इस बात की ओर से निश्चेत थे और पालनहार के संबंध में हमें कोई पहचान न थी।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की खोज एक स्वाभाविक बात है और सभी मनुष्यों की प्रवृत्ति में पाई जाती है अतः यह वस्तु मानवजीवन में परिवर्तन व प्रगति तथा तकनीक के विकास से समाप्त नहीं होती।पूर्वजों का सम्मान, सत्य की ओर से मनुष्य की पथभ्रष्टता का कारण नहीं बनना चाहिए। ग़लत आस्थाओं और विचारों में पूर्वजों का अनुसरण औचित्य योग्य नहीं है।