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    सूरए आराफ़ आयतें 175-178 (कार्यक्रम 272)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 175 की तिलावत सुनते हैं।وَاتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ الَّذِي آَتَيْنَاهُ آَيَاتِنَا فَانْسَلَخَ مِنْهَا فَأَتْبَعَهُ الشَّيْطَانُ فَكَانَ مِنَ الْغَاوِينَ (175)और (हे पैग़म्बर!) इन्हें उस व्यक्ति का हाल पढ़कर सुनाइए जिसे हमने अपनी (शक्ति की) निशानियां दी थीं परंतु उसने उन्हें छोड़ दिया तो शैतान ने उसे अपने पीछे लगा लिया अतः वह पथभ्रष्टों में से हो गया। (7:175)यह आयत बनी इस्राईल के एक विद्वान बलअम बाऊरा की घटना की ओर संकेत करती है कि जो ईमान वालों और हज़रत मूसा के साथियों में से था किन्तु शैतान के उकसावे में आकर पथभ्रष्ट हो गया और फ़िरऔन के दरबार में शामिल हो गया। संसार के मायामोह और संसार की चकाचौंध ने उसे इतना मंत्रमुग्ध कर दिया कि उसने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनके साथियों का विरोध किया तथा उसके विरुद्ध कार्यवाहियां की और अंततः बुरे परिणाम को पहुंचा। इस व्यक्ति की घटना तौरैत में भी वर्णित है।इस आयत से हमने सीखा कि मायामोह के ख़तरे में, धार्मिक विद्वान भी ग्रस्त रहते हैं तथा बलअम बाऊरा जैसे लोगों का अंत सभी धर्म गुरुओं के लिए पाठ होना चाहिए।जो ईश्वर से कट जाता है, वह शैतान का शिकार बन जाता है। मायामोह धर्मगुरुओं को भी शैतान के जाल में फंसा देता है।अपने अतीत पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि पतन का ख़तरा सदैव घात में रहता है। मनुष्य जितना ऊपर उठता जाता है, गिरने का ख़तरा भी उतना ही बढ़ता जाता है। आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 176 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ شِئْنَا لَرَفَعْنَاهُ بِهَا وَلَكِنَّهُ أَخْلَدَ إِلَى الْأَرْضِ وَاتَّبَعَ هَوَاهُ فَمَثَلُهُ كَمَثَلِ الْكَلْبِ إِنْ تَحْمِلْ عَلَيْهِ يَلْهَثْ أَوْ تَتْرُكْهُ يَلْهَثْ ذَلِكَ مَثَلُ الْقَوْمِ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا فَاقْصُصِ الْقَصَصَ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ (176)और यदि हम चाहते तो उन निशानियों के माध्यम से उसे ऊंचा उठा देते किन्तु वह धरती (और भौतिकवाद) से चिपक गया और अपनी (आंतरिक) इच्छाओं का अनुसरण करता रहा तो उसका उदाहरण कुत्ते की भांति है कि यदि उस पर बोझ लाद दो तो भी वह हांफता है और यदि छोड़ दो तब भी हांफता है। यही उदाहरण उस जाति (के लोगों ) का है जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया। तो आप इन क़िस्सों (और घटनाओं) का वर्णन करें कि शायद ये सोच विचार करने लगें। (7:176)इस आयत में ईश्वर कहता है कि हम बलअम बाऊरा को उच्च स्थान तक पहुंचाना चाहते थे किन्तु वो स्वयं धरती से चिपका हुब था और आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति करना चाहता था। हमने उसकी प्रगति और परिपूर्णता मार्ग प्रशस्त कर दिया था कन्तु वो स्वयं शिखर पर पहुंचना नहीं चाहता था बल्कि वो भौतिक व सांसारिक बातों को छोड़ने पर तैयार नहीं हुआ अतः शैतान के जाल में फंस गया और जो कुछ उसने अपने ज्ञान से प्राप्त किया था उसे गंवा बैठा।क़ुरआने मजीद, कि जिसने अज्ञानी व निश्चेत लोगों को चौपायों के समान बताया है, संसार के मायामोह में ग्रस्त विद्वानों को कुत्ते की भांति बताता है, जिसकी जीभ सदैव बाहर निकली रहती है, मानो उसका लोभ कभी समाप्त नहीं होता। अधिक धन और पद प्राप्त करने का लोभ कि जो घमंड और अंह के कारण अस्तित्व में आता है।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने कहा है कि जिस व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है किन्तु मार्गदर्शन में वृद्धि नहीं होती तो वह ज्ञान, ईश्वर से उस व्यक्ति के अधिक दूर होने का कारण बनता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आयतों का ज्ञान मनुष्य की परिपूर्णता का कारण बनता है शर्त यह है कि संसार के मायामोह के साथ न हो।यदि धर्मगुरू मायामोह में ग्रस्त हो जाए तो वह ईश्वरीय निशानियों तक को झुठला कर काफ़िर बन सकता है।पूर्वजों का इतिहास, वंशजों के लिए पाठ है। पुराने काल के लोगों की कथाओं को गंभीरता से लेना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 177 और 178 की तिलावत सुनते हैं।سَاءَ مَثَلًا الْقَوْمُ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَأَنْفُسَهُمْ كَانُوا يَظْلِمُونَ (177) مَنْ يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِي وَمَنْ يُضْلِلْ فَأُولَئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ (178)कितना बुरा उदाहरण है उन लोगों का जिन्होंने हमारी आयतों को झुठलाया और (वस्तुतः) उन्होंने स्वयं पर अत्याचार किया। (7:177) जिसका ईश्वर मार्गदर्शन करे, वही मार्ग पाने वाला है और जिन्हें ईश्वर सच्चे मार्ग से वंचित रखे वही लोग घाटा उठाने वाले हैं। (7:178)बलअम बाऊरा की कथा का वर्णन करने के पश्चात, क़ुरआने मजीद, एक मूल सिद्धांत के रूप में कहता है कि जत लोग ईश्वरीय निशानियों को झुठलाते हैं, उनके समक्ष बहुत बुरा अंत है और उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे अपने कर्मों द्वारा ईश्वर या धर्म को क्षति पहुंचा रहे हैं बल्कि वस्तुतः वे स्वयं पर ही अत्याचार कर रहे हैं और अपने आपको ईश्वर की दया व कृपा से वंचित कर रहे हैं क्योंकि जो कोई सत्य को झुठलाता है वो ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित हो जाता है और यह मनुष्य के लिए सबसे बड़ा घाटा है।यद्यपि मनुष्य का मार्गदर्शन या पथभ्रष्टता ईश्वर के हाथ में है किन्तु अकारण और तर्कहीन नहीं है क्योंकि ईश्वर अत्यंत कृपाशील व तत्वदर्शी है और जब तक मनुष्य मार्गदर्शन या पथभ्रष्टता का मार्ग स्वयं प्रशस्त न करे, ईश्वर उसे अपनी कृपा या प्रकोप का पात्र नहीं बनाता।इन आयतों से हमने सीखा कि सबसे बुरा अत्याचार, अपने आप पर अत्याचार है, जो सत्य के इन्कार और आंतरिक इच्छाओं के पालन के कारण होता है।हमारे ईमान या कुफ़्र का ईश्वर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह आवश्यकतामुक्त है जबकि सभी को उसकी आवश्यकता है। केवल ज्ञान ही मोक्ष व कल्याण का कारण नहीं है बल्कि मनुष्य को अपने कर्मों द्वारा ईश्वरीय कृपा व मार्गदर्शन की प्राप्ति की भूमि प्रशस्त करनी चाहिए।