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    सूरए आराफ़, आयतें 184-187, (कार्यक्रम 274)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 184 की तिलावत सुनते हैं।أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا مَا بِصَاحِبِهِمْ مِنْ جِنَّةٍ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ مُبِينٌ (184)क्या मक्के के लोगों ने यह विचार नहीं किया कि उनके साथी अर्थात पैग़म्बर में किसी प्रकार का उन्माद नहीं है? वे तो केवल स्पष्ट रूप से ईश्वरीय दंड से डराने वाले हैं। (7:184)इससे पहले हमने कहा था कि पैग़म्बर के निमंत्रण के मुक़ाबले में लोगों के गुट हो गए। एक गुट ने सत्य और पवित्रता के साथ उनकी बात स्वीकार की और उन पर ईमान ले आए जबकि दूसरे गुट ने हठधर्मी तथा द्वेष के चलते सत्य को स्वीकार नहीं किया और कुफ़्र का मार्ग अपनाया।यह आयत कहती है कि जिन लोगों ने अपने कुफ़्र का औचित्य दर्शाने के लिए यह बात ही कि पैग़म्बर को जिन ने पकड़ लिया है और वे एक प्रकार के उन्माद में ग्रस्त हैं कि जो सृष्टि के आरंभ और समापन के बारे में इस प्रकार की बातें करते हैं तो क्या वे पैग़म्बरी से पूर्व चालीस वर्षों तक उनके बीच नहीं रहे? इस अवधि में क्या उन्होंने पैग़म्बर में पवित्रता, भलाई और सच्चाई के अतिरिक्त कोई और बात देखी?और क्या इस समय ही वे लोगों को उनके ग़लत कार्यों के परिणाम से डराने और सचेत करने के अतिरिक्त कोई और बात कहते हैं तो क्या तुम लोग उन्हें उन्मादी कहते हो? यह विचित्र बात है कि पूरे इतिहास पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि काफ़िरों ने सदैव ही ईश्वरीय पैग़म्बरों पर पागलपन का आरोप लगाया है और यह पैग़म्बरे इस्लाम से ही विशेष नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि काफ़िरों की दृष्टि में, आंतरिक इच्छाओं पर नियंत्रण और कार्यों के परिणाम पर विचार करना पागलपन है।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों की पद्धति तर्क और प्रमाण की नहीं बल्कि आरोप और अपमान की है। उनके पास धार्मिक वास्तविकताओं को नकारने का कोई तर्क नहीं है अतः तर्करहित व्यवहार पर उतर आते हैं।कार्यों के परिणामों के प्रति चेतावनी, ढकी-छिपी नहीं बल्कि स्पष्ट और खुल्लम खुल्ला होनी चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 185 की तिलावत सुनते हैंأَوَلَمْ يَنْظُرُوا فِي مَلَكُوتِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا خَلَقَ اللَّهُ مِنْ شَيْءٍ وَأَنْ عَسَى أَنْ يَكُونَ قَدِ اقْتَرَبَ أَجَلُهُمْ فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ (185)क्या इन लोगों ने आकाशों और धरती की सत्ता तथा ईश्वर की समस्त रचनाओं पर ध्यान नहीं दिया है और यह कि शायद उन (की मृत्यु) का निर्धारित समय निकट आ गया हो, तो इन सबके पश्चात यह किस बात पर ईमान लाएंगे। (7:185)ईश्वर द्वारा लोगों को पैग़म्बर के कथनों और कर्मों पर विचार व चिंतन करने और उन पर आरोप न लगाने का निमंत्रण देने के पश्चात यह आयत उन्हें आकाशों, धरती और सृष्टि की अन्य वस्तुओं के बारे में चिंतन मनन का न्योता देते हुए कहती है। इस महान और व्यापक सृष्टि पर किसका स्वामित्व है। क्या अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त कोई उसका स्वामी और रचयिता है।भौतिकवाद और मायामोह में ग्रस्त तथा आंतरिक इच्छाओं का पालन करने वाले तुम लोगों की दृष्टि में कया इस बात की संभावना नहीं है कि मृत्यु तुम्हारे निकट आ चुकी हो और तुम्हें इस नश्वर संसार से जाना पड़े। तो फिर तुम क्यों अब भी सत्य का इन्कार करते हो और उसे स्वीकार करने क लिए तैयार नहीं हो। क्यों तुम दूसरों की ग़लत और तर्कहीन बातों को स्वीकार करते हो किन्तु पैग़म्बर की सत्य बातों पर ईमान नहीं लाते।इस आयत से हमने सीखा कि सृष्टि व प्रकृति पर गहन चिंतन मनन करना चाहिए। इसे सरसरी नज़र से नहीं देखना चाहिए। प्रकृति, ईश्वर की निशानी है अतः इसे सही ढंग से पहचान कर इसकी महानता का आभास करना चाहिए।मृत्यु की ओर निश्चेत रहना, अनेक वैचारिक व व्यवहारिक पथभ्रष्टताओं का कारण बनता है। इसी प्रकार मृत्यु का स्मरण, मनुष्य की आत्मा को सत्य स्वीकार करने तथा हठधर्मी व सांप्रदायिकता छोड़ने के लिए तैयार करता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 186 की तिलावत सुनते हैं।مَنْ يُضْلِلِ اللَّهُ فَلَا هَادِيَ لَهُ وَيَذَرُهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ (186)जिसे ईश्वर (ही) पथभ्रष्टता में छोड़ दे उसके लिए कोई मार्गदर्शक नहीं है और ईश्वर उन्हें उनकी उद्दंडता में छोड़ देता है कि ठोकरें खाते और भटकते फिरें। (7:186)यह आयत काफ़िरों के अंत के बारे में कहती है कि हठधर्मी, सांप्रदायिकता और अंधा अनुसरण इस बात का कारण बनता है कि ईश्वर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दे तथा ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित कर दे। स्वभाविक है कि ईश्वरीय मार्ग से विचलित होने का परिणाम, ग़लत मार्ग पर जाने के रूप में निकलता है तथा जीवन में भटकना और ठोकरें खाना उसके चिन्ह हैं। पथभ्रष्ट व्यक्ति हर दिन नए मार्ग पर चलता है और चूंकि गंतव्य तक नहीं पहुंचता अतः दूसरे मार्ग का चयन करता है।मार्गों की यह विवधता उसके कार्यों और लक्ष्यों के बिखर जाने का कारण बनती है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों और आसमानी किताबों के साथ कि जो मार्गदर्शन का साधन है, अनुचित व्यवहार, संसार में ईश्वरीय कोप का कारण बनता है। ईश्वरीय कोप का सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण, लोगों को उनके हाल पर छोड़ देना तथा उन्हें ईश्वरीय समर्थन की व्यवस्था से बाहर निकाल देना है।संसार में मनुष्य सदैव ही पथभ्रष्टता की खाई की कगार पर रहता है तथा यदि ईश्वर उसका हाथ न थामे तो वह उस खाई में गिर जाएगा। ईश्वर द्वारा पथभ्रष्ट करने का अर्थ यह है कि वह काफ़िरों का साथ छोड़ देता है और पतन के ख़तरे में उन्हें उनके हाल पर रहने देता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 187 की तिलावत सुनते हैं।يَسْأَلُونَكَ عَنِ السَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَاهَا قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِنْدَ رَبِّي لَا يُجَلِّيهَا لِوَقْتِهَا إِلَّا هُوَ ثَقُلَتْ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَا تَأْتِيكُمْ إِلَّا بَغْتَةً يَسْأَلُونَكَ كَأَنَّكَ حَفِيٌّ عَنْهَا قُلْ إِنَّمَا عِلْمُهَا عِنْدَ اللَّهِ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ (187)(हे पैग़म्बर!) ये लोग आपसे प्रलय के बारे में पूछते हैं कि वह कब आएगा? कह दीजिए के इसका ज्ञान (केवल) मेरे पालनहार के पास है और उसके अतरिक्त कोई भी प्रलय के समय को स्पष्ट नहीं कर सकता। प्रलय, आकाशों और धरती के लिए बहुत भारी है तथा तुम्हारे पास अचानक ही आने वाला है। ये लोग आपसे इस बारे में इस प्रकार प्रश्न करते हैं कि मानो आपको इस बारे में पूरा ज्ञान हो। कह दीजिए कि इसका ज्ञान केवल ईश्वर के पास है किन्तु अधिकांश लोग इसे नहीं जानते। (7:187)पैग़म्बरे इस्लाम से काफ़िरों द्वारा किया जाने वाला एक प्रश्न, प्रलय के बारे में था। वे सोचते थे कि पैग़म्बर इसका उत्तर नहीं दे सकेंगे। जबकि पैग़म्बर जिस बात की मूल रूप से सूचना देते थे वह स्वयं प्रलय के आने के बारे में थी, उसका समय महत्त्वपूर्ण नहीं है। जैसा कि सृष्टि के आरंभ के संदर्भ में मूल प्रश्न यह है कि इसका रचयिता कौन है? इस प्रश्न का उत्तर दिया जाना चाहिए किन्तु यह बात कि सृष्टि की रचना कितने लाख वर्ष पूर्व हुई, अधिक महत्त्व नहीं रखती। इसके अतिरिक्त इस बात को सिद्ध करने या नकारने का कोई मार्ग नहीं है। यदि पैग़म्बर यह कह देते हैं कि दस हज़ार वर्ष बाद प्रलय होगा तो कौन इसे ग़लत सिद्ध कर सकता था।इस आयत में क़ुरआने मजीद दो मूल बातों पर बल देता है। एक यह कि प्रलय अचानक आएगी और मनुष्य केपास उसकी भविष्यवाणी की क्षमता नहीं है अतः स्वभाविक रूप से वह उसके परिणामों से नहीं बच सकेगा। दूसरे यह कि सृष्टि के आरंभ तथा अंत का ज्ञान केवल ईश्वर को है। यहां तक कि इस संबंध में पैग़म्बर भी नहीं जानते।इस आयत से हमने सीखा कि हमें सदैव प्रलय तथा ईश्वर के न्यायालय में उपस्थित होने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि उसका समय निर्धारित नहीं है। जो बात हमको मालूम नहीं है उसके बारे में “नहीं जानते” वाक्य कहने से डरना नहीं चाहिए।