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    सूरए आराफ़, आयतें 188-192, (कार्यक्रम 275)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 188 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ لَا أَمْلِكُ لِنَفْسِي نَفْعًا وَلَا ضَرًّا إِلَّا مَا شَاءَ اللَّهُ وَلَوْ كُنْتُ أَعْلَمُ الْغَيْبَ لَاسْتَكْثَرْتُ مِنَ الْخَيْرِ وَمَا مَسَّنِيَ السُّوءُ إِنْ أَنَا إِلَّا نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (188)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मुझे न तो अपने भले का अधिकार है और न ही बुरे का सिवाए उसके कि जो ईश्वर चाहे। और यदि मैं (ईश्वर के) गुप्त ज्ञान से अवगत होता तो मैं बहुत अधिक भलाई करता और कोई बुराई मुझे छू भी नहीं पाती। मैं तो केवल ईमान वालों को (ईश्वर के दंड से) डराने वाला तथा (स्वर्ग की) शुभ सूचना देने वाला हूं। (7:188)कुछ लोगों को आशा थी कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की भांति अपने व अन्य लोगों के भविष्य से अवगत होंगे और उन्हें भी इसकी सूचना देंगे ताकि वे लाभ प्राप्त करें या ख़तरों से बचें। इस आयत में पैग़म्बर कहते हैः मैं तुम लोगों के मार्गदर्शन के लिए आया हूं न कि तुम्हें भविष्य की सुचनाएं देने के लिए। यदि मैं इस प्रकार के गुप्त ज्ञानों से अवगत होता तो अपने अनेक हित साध सकता था या ख़तरों से बच सकता था किन्तु मेरी भी भलाई या बुराई अथवा लाभ या घाटा तुम्हीं लोगों की भांति ईश्वर के हाथ में है।मूलतः ग़ैब अर्थात भविष्य का गुप्त ज्ञान, ईश्वर से विशेष है, और जो लोग इस संबंध में थोड़ा बहुत जान जाते हैं वो ईश्वर की अनुमति से होता है। लोगों के मार्गदर्शन के लिए, ईश्वर, पैग़म्बरों को जितना आवश्यक होता है अतीत व भविष्य का ज्ञान दे देता है किन्तु उन्हें उसके व्यक्तिगत प्रयोग का अधिकार नहीं होता है। उनका जीवन भी सामान्य लोगों की ही भांति होना चाहिए। उन्हें ईश्वर के गुप्त ज्ञान के आधार पर नहीं बल्कि साधारण ढंग से जीवन बिताना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि जो कुछ हमारे पास है उस पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि हम अपनी जान तक के मालिक नहीं हैं। हमारी हर चीज़ ईश्वर के हाथ में है और उसकी इच्छा के बिना कोई बात नहीं होती।ईश्वर का गुप्त ज्ञान, मार्गदर्शन का साधन है न कि धन-दौलत बटोरते या कठिनाइयों से बचने का माध्यम, यही कारण है कि पैग़म्बरों का जीवन सदा ही कठिनाइयों और संकटों में बीता।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 189 और 190 की तिलावत सुनते हैं।هُوَ الَّذِي خَلَقَكُمْ مِنْ نَفْسٍ وَاحِدَةٍ وَجَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا لِيَسْكُنَ إِلَيْهَا فَلَمَّا تَغَشَّاهَا حَمَلَتْ حَمْلًا خَفِيفًا فَمَرَّتْ بِهِ فَلَمَّا أَثْقَلَتْ دَعَوَا اللَّهَ رَبَّهُمَا لَئِنْ آَتَيْتَنَا صَالِحًا لَنَكُونَنَّ مِنَ الشَّاكِرِينَ (189) فَلَمَّا آَتَاهُمَا صَالِحًا جَعَلَا لَهُ شُرَكَاءَ فِيمَا آَتَاهُمَا فَتَعَالَى اللَّهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ (190)(ईश्वर) वही है जिसने तुम सबकी एक आत्मा से रचना की और फिर उसी से उसका जोड़ा बनाया ताकि उसके माध्यम से शांति प्राप्त करे। फिर जब दोनों का मिलाप हुआ तो उसे हल्का सा गर्भ उत्पन्न हुआ तो कुछ समय उसने उसी स्थिति में बिताया फिर जब संतान के जन्म का समय निकट आया तो दोनों ने अपने पालनहार से प्रार्थना की कि प्रभुवर! यदि तू हमें अच्छी व भली संतान प्रदान करे तो निश्चित रूप से हम (तेरे प्रति) कृतज्ञ रहेंगे। (7:189) तो जब ईश्वर ने उन्हें भली संतान दे दी तो उन्होंने, ईश्वर ने जो कुछ उन्हें दिया था, उसको ईश्वर का समकक्ष ठहराया किन्तु ईश्वर उनसे कहीं उच्च है जिन्हें वे उसका समकक्ष ठहराते हैं। (7:190)ये आयतें दंपतियों को संबंधोति करते हुए कहती है कि ये ईश्वर है जिसने तुम्हें एक दूसरे का पति पत्नि बनाया ताकि एक दूसरे के साथ शांति से रहो और मानवजाति का वंश आगे बढ़ाओ। जब पत्नी गर्भवती होती है और उसकी संतान के जन्म का समय निकट आया है तो तुम दोनों ईश्वर से प्रार्थना करते हो कि वो तुम्हें भली और पवित्र संतान दे, तथा इस अनुकंपा पर कृतज्ञ रहने का वचन देते हो किन्तु संतान के जन्म के पश्चात तुम ईश्वर को भूल जाते हो और उसे ईश्वर के आज्ञापालन के मार्ग पर चलाने के स्थान पर ऐसे मार्ग पर डाल देते हो जो ईश्वर की ओर न जाकर किसी और तक पहुंचता है।इन आयतों से हमने सीखा कि वैवाहिक और दाम्पत्य जीवन, स्त्री व पुरुष के मन व शरीर की शांति का कारण है। युवाओं की मानसिक कठिनाइयों को रोकने के लिए विवाह सबसे अच्छा मार्ग है।मनुष्य को प्रेम व सहानुभूति की आवश्यकता होती है और ईश्वर ने परिवार तथा दाम्पत्य जीवन के माध्यम से उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति कर दी है।विवाह का एक लक्ष्य मानव वंश की सुरक्षा तथा भली संतान का प्रशिक्षण है।संतान की भलाई और पवित्रता के लिए, उसके जन्म से पूर्व ही युक्तियां करनी चाहिए तथा ईश्वर से सहायता मांगनी चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत नंबर 191 और 192 की तिलावत सुनते हैं।أَيُشْرِكُونَ مَا لَا يَخْلُقُ شَيْئًا وَهُمْ يُخْلَقُونَ (191) وَلَا يَسْتَطِيعُونَ لَهُمْ نَصْرًا وَلَا أَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ (192)क्या वे उनको ईश्वर का समकक्ष ठहराते हैं, जो (न केवल) किसी वस्तु की सृष्टि नहीं करते (बल्कि) वे स्वयं (ईश्वर की) रचना हैं। (7:191) और उनके पास न उनकी सहायता का सामर्थ्य है और न ही वे स्वयं अपनी सहायता कर सकते हैं। (7:192)पिछली आयतों में हमने कहा कि कुछ माता पिता अपने बच्चों को ईश्वर के मार्ग पर चलाने के स्थान पर, किसी अन्य मार्ग पर ले जाते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के पास भी वास्तविक शक्ति और सत्ता है। ये आयतें कहती हैं कि दूसरों के पास उनका अपना क्या है? क्या उनके पास सृष्टि की शक्ति है? जबकि वे तो स्वयं ईश्वर की रचना हैं। क्या वे ख़तरों के समय दूसरों की सहायता कर सकते हैं? जबकि उनके पास स्वयं अपनी जान बचाने की क्षमता नहीं है तथा उनका जीना-मरना मरना भी ईश्वर के हाथ में है।आयत आगे चलकर कहती है कि तुम लोग ईश्वर की शरण में क्यों नहीं आते? दूसरों के पास ऐसा क्या है जो ईश्वर के पास नहीं हैं? क्यों अपने बच्चों का इस प्रकार प्रशिक्षण करते हो कि वे केवल धन-संपत्ति एकत्रित करने और मायामोह में ग्रस्त रहते हैं? क्यों तुम स्वयं भी प्रलय की ओर से निश्चेत रहते हो और उन्हें भी निश्चेत रखते हो?इन आयतों से हमने सीखा कि संतान, माता-पिता के पास ईश्वर की एक बड़ी अमानत है, इसमें विश्वासघात नहीं करना चाहिए तथा संतान को ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं दिखाना चाहिए।ईश्वर के अतिरिक्ति किसी के भी पास अपनी व्यक्तिगत शक्ति नहीं है। ईश्वर सभी वस्तुओं का स्वामी है, अतः उसे छोड़कर किसी के पास नहीं जाना चाहिए।