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    सूरए आराफ़, आयतें 193-196, (कार्यक्रम 276)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 193 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَى لَا يَتَّبِعُوكُمْ سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ أَدَعَوْتُمُوهُمْ أَمْ أَنْتُمْ صَامِتُونَ (193)और यदि आप उन्हें मार्गदर्शन की ओर बुलाएं तो वे आप का अनुसरण नहीं करेंगे। आप के लिए एक समान है कि उन्हें निमंत्रण दें अथवा चुप रहें। (7:193)इससे पहले हमने कहा कि कुछ माता-पिता अपनी संतान को, जो उनके पास ईश्वर की अमानत है, ईश्वर की ओर बुलाने के स्थान पर किसी और के मार्ग पर चलाते हैं। यह आयत कहती है कि जिन्हें तुम मार्गदर्शन का साधन समझते हो, यदि तुम उनसे मार्गदर्शन चाहो तो वे तुम्हारी बात पूरी नहीं करेंगे, क्योंकि उनके पास इसकी शक्ति व क्षमता नहीं है। तुम्हारा पुकारना या चुप रहना उनके लिए एक समान है और उनके समक्ष तुम्हारी प्रार्थना व्यर्थ ही जाएगी क्योंकि सृष्टि में ईश्वर के अतिरिक्त किसी की व्यक्तिगत सत्ता नहीं है और कोई भी व्यक्ति उसके आदेश और अनुमति के बिना कोई भी काम करने की क्षमता नहीं रखता।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर के बंदों की बंदगी का कोई औचित्य नहीं है। निर्जीव और मनुष्य से भी कम महत्त्व की वस्तुओं की उपासना का तो कोई तर्क ही नहीं है।अपने पालनहार से मनुष्य की सबसे बड़ी इच्छा, मोक्ष व कल्याण की ओर मार्गदर्शन है कि जिसकी पूर्ति ईश्वर के अतिरिक्त कोई और नहीं कर सकता।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 194 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ عِبَادٌ أَمْثَالُكُمْ فَادْعُوهُمْ فَلْيَسْتَجِيبُوا لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (194)निसंदेह तुम जिन्हें ईश्वर के स्थान पर पुकारते हो, वे तुम्हारी भांति ही (ईश्वर के बंदे) हैं। तो यदि तुम सच्चे हो तो उन्हें पुकारो कि वे तुम्हारा उत्तर दें। (7:194)यह आयत कहती है कि सभी मनुष्य, ईश्वर के बंदे और उसकी रचनाएं हैं और सभी को उसकी दया व कृपा की आवश्यकता है। किसी भी मनुष्य पर वरीयता प्राप्त नहीं है तो फिर क्यों तुम लोग अपने ही जैसे मनुष्यों को सहायता के लिए पुकारते हो? क्या तुम सोचते हो कि उनकी अपनी कोई शक्ति है? यदि ऐसा है तो उनके पास जाओ और उनसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति चाहो, फिर देखो कि वे तुम्हारी बात का उत्तर देते हैं या नहीं?शायद इस आयत का तात्पर्य हज़रत ईसा मसीह जैसे लोग हों जिन्हें ईसाई, ईश्वर मानते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि जिसकी उपासना की जा रही है उसे उपासक से श्रेष्ठ होना चाहिए, अपने ही समान मनुष्यों की पूजा का कोई औचित्य नहीं है।जिसकी उपासना की जा रही है उसमें उपासक की आवश्यकताओं की पूर्ति की क्षमता होनी चाहिए और ईश्वर के अतिरिक्त किसी में भी यह शक्ति और क्षमता नहीं है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 195 की तिलावत सुनते हैं।أَلَهُمْ أَرْجُلٌ يَمْشُونَ بِهَا أَمْ لَهُمْ أَيْدٍ يَبْطِشُونَ بِهَا أَمْ لَهُمْ أَعْيُنٌ يُبْصِرُونَ بِهَا أَمْ لَهُمْ آَذَانٌ يَسْمَعُونَ بِهَا قُلِ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ ثُمَّ كِيدُونِ فَلَا تُنْظِرُونِ (195)क्या इन (प्रतिमाओं) के पास ऐसे पैर हैं जिनसे वे चल सकें? या ऐसे हाथ हैं जिनसे वे आक्रमण कर सकें? या ऐसी आंखें हैं जिनसे वे देख सकें? या फिर ऐसे कान हैं जिनसे वे सुन सकें? (हे पैग़म्बर!) आप कह दीजिए कि तुम अपने (काल्पनिक) समकक्षों को पुकारो और फिर मेरे विरुद्ध चाल चलो तथा मुझे बिल्कुल भी समय न दो (ताकि तुम्हें पता चल जाए कि वे कुछ नहीं कर सकते।) (7:195)पिछली आयत में उन लोगों की आलोचना करने के पश्चात जो अपने ही जैसे मनुष्यों की पूजा करते हैं, इस आयत में ईश्वर उन लोगों पर टिप्पणी करता है जो ऐसी वस्तुओं को पूजते हैं जो स्वयं उनसे भी अधिक कमज़ोर और असहाय हैं। ऐसी वस्तुएं जो न तो देख सकती हैं, न सुन सकती और न ही चल फिर सकती हैं।इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से कहा गया है कि वे इस प्रकार के लोगों को निश्चेतना से निकालने के साथ ही साथ उसने यह कहें कि वे उन वस्तुओं को पुकारें ताकि वे मुसलमानों को क्षति पहुंचाएं और उनकी तबाही के लिए जो चाहे षड्यंत्र रचें। इससे यह सिद्ध हो जाएगा कि उनके पास किसी काम की क्षमता नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय नेता अपने पालनहार पर इतना ईमान और भरोसा रखते हैं कि पूरे साहस के साथ अपने शत्रुओं को मुक़ाबले का निमंत्रण देते हैं ताकि लोगों को उनकी अक्षमता से अवगत कराएं।अनेकेश्वरवादी पैग़म्बर का अनुसरण नहीं करते थे और कहते थे कि वे हमारे ही समान एक मनुष्य हैं किन्तु ऐसी वस्तुओं की पूजा करते थे जो स्वयं उनसे भी कम महत्त्व की थीं।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 196 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ وَلِيِّيَ اللَّهُ الَّذِي نَزَّلَ الْكِتَابَ وَهُوَ يَتَوَلَّى الصَّالِحِينَ (196)(हे पैग़म्बर! उनसे कह दीजिए कि) निसंदेह मेरा अभिभावक (और पालनहार) वह ईश्वर है जिसने (यह) किताब उतारी है और वही भले बंदों की अभिभावकता और मार्गदर्शन करता है। (7:196)पिछली आयत में ईश्वर के अतिरिक्त पूजी जाने वाली अन्य वस्तुओं की कमज़ोरियों की ओर संकेत किया गया था। इस आयत में पैग़म्बर अपने वास्तविक पालनहार का इस प्रकार परिचय कराते हैं कि मैंने लोगों या वस्तुओं की पूजा और उपासना के स्थान पर केवल ईश्वर को अपना स्वामी और अभिभावक माना है। वह वही है जो मेरे पास वहि के रूप में अपना संदेश भेजता है, तुम्हारे लिए आयतें उतारता है, भले लोगों का मार्गदर्शन करता है तथा उनकी अभिभावकता का दायित्व स्वीकार करता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की दृष्टि में भले होने का महत्त्व बहुत अधिक है। क़ुरआने मजीद, पैग़म्बरों को भले लोगों के रूप में परिचित कराता है।सत्य के मार्ग पर चलने में अकेलेपन से नहीं घबराना चाहिए क्योंकि ईश्वर ने भले लोगों की सहायता का वचन दिया है।ईश्वर मनुष्य को स्पष्ट व निर्धारित कार्यक्रम भी देता है और उसके क्रियान्वयन में मनुष्य की सहायता भी करता है।