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    सूरए आराफ़, आयतें 197-202, (कार्यक्रम 277)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 197 और 198 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ تَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَكُمْ وَلَا أَنْفُسَهُمْ يَنْصُرُونَ (197) وَإِنْ تَدْعُوهُمْ إِلَى الْهُدَى لَا يَسْمَعُوا وَتَرَاهُمْ يَنْظُرُونَ إِلَيْكَ وَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ (198)और जिन्हें तुम ईश्वर के स्थान पर पुकारते हो वे न तो तुम्हारी सहायता कर सकते हैं और न ही अपनी रक्षा कर सकते हैं। (7:197) और (हे पैग़म्बर!) यदि आप उन्हें मार्गदर्शन की ओर बुलाएंगे तो वे सुन भी सकेंगे, और (यदि) आप उन्हें देखेंगे तो ऐसा जान पड़ेगा कि वे आप ही की ओर देख रहे हैं जबकि वे तो देख ही नहीं सकते। (7:198)इससे पहले अनेकेश्वरवादियों तथा उनके द्वारा पूजी जाने वाली वस्तुओं की विशेषता का उल्लेख किया गया था। ये आयतें कहती हैं कि तुम लोग ईश्वर को छोड़कर जिनके पास जाते हो उनके पास उनकी व्यक्तिगत शक्ति और क्षमता नहीं है कि वे घटनाओं में तुम्हारी रक्षा कर सकें, जैसा कि तुम देखते हो कि वे स्वयं ख़तरों और दुर्घटनाओं के मुहाने पर रहते हैं, तो तुम ईश्वर को छोड़ कर उनकी शरण में क्यों जाना चाहते हो?आगे चलकर आयत पैग़म्बर से कहती है कि यद्यपि आपको पथभ्रष्टों को चेतावनी देने और उन्हें नरक से डराने के अपने दायित्व का पालन करना चाहिए तथा सत्य बात लोगों के समक्ष रखनी चाहिए किन्तु आप इस बात की आशा न रखें कि सब लोग आपकी बातों को सुनकर उन पर ईमान ले आएंगे। बहुत से लोग अपने लकड़ी और पत्थर के देवताओं के समान ही न सुन सकते हैं, न देख सकते हैं बल्कि सत्य के प्रति लापरवाह रहते हैं। यह लोग आपकी ओर देखते हैं किन्तु इनकी निगाहें समझ से ख़ाली होती हैं, आपकी बातें इनके कानों में जाती हैं परंतु ये लोग मानो सुन ही नहीं रहे होते हैं।इन आयतों से हमने सीखा के जिसकी उपासना की जा रही है उसमें सहायता करने की शक्ति और क्षमता होनी चाहिए कि उसकी शरण में जाया जा सके किन्तु ईश्वर के अतिरिक्त जिनकी उपासना की जाती है वे स्वयं ही सुरक्षित नहीं हैं।आंख और कान होना महत्त्वपूर्ण नहीं है। ऐसे कितने अंधे और बहरे हैं जो सत्य को स्वीकार कर लेते हैं तथा कितने ही ऐसे सुनने और देखने वाले हैं जो सत्य का इन्कार कर देते हैं।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 199 की तिलावत सुनते हैं।خُذِ الْعَفْوَ وَأْمُرْ بِالْعُرْفِ وَأَعْرِضْ عَنِ الْجَاهِلِينَ (199)(हे पैग़म्बर! लोगों के साथ व्यवहार में) क्षमा का मार्ग अपनाएं, भले कर्मों का आदेश दें और अज्ञानियों से दूरी रखें। (7:199)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके अनुयाइयों को संबोधित करते हुए, लोगों के प्रति व्यवहार के बारे में, चाहे वे मित्र हों या शत्रु, कुछ महत्त्वपूर्ण शिष्टाचारिक निर्देश देती है और कहती है। तुम्हारे साथ जो बुराइयां की गई हैं उनके संबंध में क्षमा का मार्ग अपनाओ और प्रतिशोध न लो। सदैव लोगों को भलाइयों का आदेश दो और जो लोग तुम्हारे साथ जाहिलों और अज्ञानियों जैसा व्यवहार करते हैं, उनके सामने से बड़ी विनम्रता के साथ हट जाओ।अलबत्ता ये बात स्पष्ट है कि व्यवहार की यह शैली व्यक्तिगत मामलों में है तथा सामाजिक तथा लोगों के अधिकारों से संबंधित मामलों में, समाज के नेता तक को क्षमा करने का अधिकार प्राप्त नहीं है तथा इस्लामी व्यवस्था के शत्रुओं से ठोस व कड़ा व्यवहार करना चाहिए ताकि लोगों की जान माल के प्रति उनके मन में लोभ न आने पाए।इस आयत से हमने सीखा कि केवल अच्छा होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि समाज में अच्छाइयों के प्रचलन के विचार में भी रहना चाहिए और दूसरों को भलाइयों की सिफ़ारिश करते रहना चाहिए।अज्ञानी वो नहीं है जिसके पास ज्ञान न हो बल्कि वास्तविक अज्ञानी वो है जो दूसरों के साथ बुरा और मूर्खतापूर्ण व्यवहार करे।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 200 की तिलावत सुनते हैं।وَإِمَّا يَنْزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ إِنَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (200)और यदि शैतान की कोई (छोटी सी) उकसाहट भी तुम्हें उकसाए तो ईश्वर की शरण चाहो कि निसंदेह वो सुनने वाला और अत्यधिक जानकार है। (7:200)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करती है और बताती है कि शैतान ईश्वर के पैग़म्बरों को भी बहकाने और पथभ्रष्ट करने का प्रयास करता है, यद्यपि ईश्वर ने अपने पैग़म्बरों को हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखा है।पिछली आयत के दृष्टिगत ये बात स्पष्ट हो जाती है कि शैतान सदैव इस प्रयास में रहता है कि क्रोध की आग भड़का कर लोगों के बीच से क्षमा व दया को समाप्त कर दे तथा उनके बीच द्वेश की ज्वाला भड़का दे, अतः इस आयत में ईश्वर कहता है कि शैतान के बहकावों और उकसावों पर कदापि ध्यान न दो, अपने क्रोध को ठंडा करो तथा ईश्वर की शरण में जाकर और उस पर भरोसा करके शैतान के बहकावे से सुरक्षित हो जाओ।इस आयत से हमने सीखा कि शैतान के बहकावे निश्चित और स्थाई हैं अतः ईश्वर सदैव उनकी ओर से सचेत करता रहता है।शैतान से दूर होना, ईश्वर से निकट होने, उसकी शरण में जाने और उसके स्मरण के समान है। 
    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 201 और 202 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ اتَّقَوْا إِذَا مَسَّهُمْ طَائِفٌ مِنَ الشَّيْطَانِ تَذَكَّرُوا فَإِذَا هُمْ مُبْصِرُونَ (201) وَإِخْوَانُهُمْ يَمُدُّونَهُمْ فِي الْغَيِّ ثُمَّ لَا يُقْصِرُونَ (202)निसंदेह जो लोग ईश्वर से डरते हैं जब उन्हें शैतान की ओर से कोई उकसावा छू जाता है तो वे सचेत हो जाते हैं और उन्हें सूझ आ जाती है। (7:201) और शैतानों में से उनके भाई बंधु उन्हें निरंतर पथभ्रष्टता में खींचे लिए जाते हैं और फिर नहीं रुकते। (7:202)पिछली आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करने के पश्चात ये आयत ईमान वालों से कहती है कि शैतान के बहकावे सदैव उन्हें घेरे रहते हैं कि किसी न किसी प्रकार उन्हें प्रभावित कर दें किन्तु ईश्वर से डरने वाले लोग जब कभी किसी शैतानी उकसावे में फंस जाते हैं तो ईश्वर को याद करने लगते हैं और इस बात पर ध्यान देते हैं कि ईश्वर उनके कामों को देख रहा है और उनकी बातों को सुन रहा है। इसी कारण वे पाप की ओर नहीं बढ़ते।किन्तु जिन लोगों के मन में ईश्वर का डर नहीं होता, शैतान एक धूर्त भाई की भांति उनका साथी बन जाता है और सदैव उन्हें बुराइयों की ओर बढ़ाता है और इस काम में कोई ढिलाई नहीं करता।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्यों और जिन्नों के शैतान, दूसरों को पथभ्रष्ट करने हेतु सदैव प्रयासरत रहते हैं, हमें उनकी ओर से सचेत रहना चाहिए।ज़बान पर ईश्वर के नाम और हृदय में उसके स्मरण से मनुष्य अनेक बहकावों और उकसावों से सुरक्षित रहता है।यदि मनुष्य के मन में ईश्वर का भय न हो तो शैतान उसका भाई बन जाता है किन्तु बहकाने वाला भाई।