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    सूरए आराफ़, आयतें 20-23, (कार्यक्रम 236)

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    आइये सूरए आराफ़ की 20वीं और 21वीं आयत की तिलावत सुनते हैंفَوَسْوَسَ لَهُمَا الشَّيْطَانُ لِيُبْدِيَ لَهُمَا مَا وُورِيَ عَنْهُمَا مِنْ سَوْآَتِهِمَا وَقَالَ مَا نَهَاكُمَا رَبُّكُمَا عَنْ هَذِهِ الشَّجَرَةِ إِلَّا أَنْ تَكُونَا مَلَكَيْنِ أَوْ تَكُونَا مِنَ الْخَالِدِينَ (20) وَقَاسَمَهُمَا إِنِّي لَكُمَا لَمِنَ النَّاصِحِينَ (21)फिर शैतान ने उन दोनों को बहकाया ताकि उनके गुप्तांग जो उन दोनों से छिपाए गये थे, उनके समक्ष प्रकट कर दे। उसने (उनसे) कहा कि तुम्हारे पालनहार ने तुम्हें इस पेड़ से इसलिए रोका है कि कहीं तुम फ़रिश्ते न बन जाओ या कहीं तुम्हें अनंत जीवन न मिल जाए। (7:20) और उसने उन दोनों के समक्ष सौगंध खाई कि मैं तुम्हारा हितेषी हूं। (7:21)इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वर के दरबार से निकाले जाने के पश्चात शैतान ने सौगंध खाई कि वो इसका प्रतिशोध आदम से लेगा, क्योंकि उन्हीं के कारण उसे ईश्वर के दरबार से निकलना पड़ा है।यह आयत शैतान के सबसे पहले बहकावे की ओर संकेत करते हुए कहती है। यद्यपि ईश्वर ने आदम अलैहिस्सलाम और उनकी पत्नी हव्वा को एक विशेष पेड़ का फल खाने से रोका था परंतु शैतान भेस बदल कर उनके पास आया और कहने लगाः यद्यपि ईश्वर ने इस पेड़ का फल खाने से रोका है परंतु यदि तुम इसे खा लो तो फ़रिश्तों की भांति होकर अमर हो जाओगे।आदम और हव्वा जिन्होंने अब तक झूठ नहीं सुना था और इस बारे में उनका कोई अनुभव नहीं था, शैतान के बहकावे में आ गये और ईश्वर के आदेश को भुला बैठे।अलबत्ता शैतान का मुख्य लक्ष्य उनके बीच से शर्म और लज्जा को समाप्त करना तथा उन्हें निर्वस्त्र करना था ताकि बाद के पापों के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि शैतान किस को विवश नहीं करता, बल्कि उसका काम केवल बहकाना है। यह हम हैं जो चयन करते हैं।नंगापन शैतान के लक्ष्यों में से है। हमें सचेत रहना चाहिए कि कोई ऐसा काम न करें जिससे शर्म और लज्जा समाप्त हो जाए।शैतान मनुष्य को अनंत ऐश्वर्य जैसी दूर की आशाओं के मार्ग से धोखा देता है।हर सौगन्ध पर भरोसा नहीं कर लेना चाहिए क्योंकि शैतान भी सौगंध खाता है।आइये अब सूरए आराफ़ की 22वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَدَلَّاهُمَا بِغُرُورٍ فَلَمَّا ذَاقَا الشَّجَرَةَ بَدَتْ لَهُمَا سَوْآَتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِنْ وَرَقِ الْجَنَّةِ وَنَادَاهُمَا رَبُّهُمَا أَلَمْ أَنْهَكُمَا عَنْ تِلْكُمَا الشَّجَرَةِ وَأَقُلْ لَكُمَا إِنَّ الشَّيْطَانَ لَكُمَا عَدُوٌّ مُبِينٌ (22)तो इस प्रकार शैतान धोखे से उन दोनों को उद्दंडता के मुंहाने तक लाया। तो जब उन्होंने उस प्रतिबंधित पेड़ (के फल) को चखा तो उन दोनों के गुप्तांग उनके समक्ष खुल गये और वे दोनों अपने को छिपाने के लिए स्वर्ग के पेड़ों के पत्ते अपने ऊपर रखने लगे। और उन दोनों के पालनहार ने उन्हें पुकाराः क्या मैंने तुम्हें इस पेड़ (के समीप जाने) से नहीं रोका था? और क्या तुम दोनों से नहीं कहा था कि शैतान तुम्हारा खुला हुआ शत्रु है? (7:22)शैतान आदम और हव्वा को बहकाने में सफल रहा और उन्होंने अभी उस पेड़ के फल को चखा ही था कि उनके गुप्तांग प्रकट हो हो गये और वे अपने को छिपाने के लिए विवश हो गये। अतः उन्होंने पेड़ों से पत्ते तोड़ कर उनसे अपने शरीर ढंक लिए। इसी बीच उन्होंने ईश्वर की ओर से एक आवाज़ सुनी जो यह कह रही था कि तुमने ईश्वर का आदेश क्यों भुला दिया और शैतान से धोखा खा गये? क्या तुम नहीं जानते कि शैतान तुम्हारा खुला हुआ और कट्टर शत्रु है और तुम से प्रतिशोध लेना चाहता है?इस आयत से हमने सीखा कि स्त्री और पुरुष दोनों एक ही समान शैतान के निशाने पर हैं, पाप में स्त्री और पुरुष होने का कोई अंतर नहीं है।नग्नता, परिपूर्णता और सभ्यता का चिन्ह नहीं बल्कि एक प्रकार का ईश्वरीय दंड है। ईश्वरीय आदेशों पर ध्यान न देना, वर्जित वस्तुएं खाना, नग्नता और लज्जा समाप्त होने की भूमि समतल करता है।आवरण और पहनावा एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, सभी मनुष्य बचपने से ही अपने गुप्तांगों को छिपाने का प्रयास करते हैं।अपने वास्तविक शत्रु को पहचानना आवश्यक है और उससे निश्चेत नहीं रहना चाहिए, शत्रु के मुक़ाबले में सदैव सचेत रहना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की 23वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَا رَبَّنَا ظَلَمْنَا أَنْفُسَنَا وَإِنْ لَمْ تَغْفِرْ لَنَا وَتَرْحَمْنَا لَنَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ (23)आदम और हव्वा ने कहाः हे हमारे पालनहार! हमने अपने आप पर अत्याचार किया और यदि तू हमें क्षमा न करे और हम पर दया न करे तो निसंदेह हम घाटा उठाने वालों में से होंगे। (7:23)यद्यपि हज़रत आदम और उनकी पत्नी शैतान के धोखे में आ गये थे परंतु शीघ्र ही उन्हें अपनी ग़लती का आभास हो गया और उन्होंने बड़े ही पश्चाताप के साथ ईश्वर से कहा कि प्रभुवर हमने अपने आप पर अत्याचार किया है और तुझ से दया व क्षमा चाहते हैं।शैतान और आदम दोनों ही ने ईश्वर के आदेश की अवहेलना की थी परंतु शैतान पश्चाताप और तौबा के स्थान पर अपनी उद्दंडता का औचित्य दर्शाने लगा, यहां तक कि उसने ईश्वर के न्याय और तत्वदर्शिता पर भी आपत्ति की जबकि आदम और हव्वा ने अपनी ग़लती को स्वीकार किया और उसकी क्षतिपूर्ति का प्रयास करने लगे। अतः ईश्वर ने शैतान को अपने दरबार से निकालकर उसे अनंत धिक्कार का पात्र बना दिया जबकि आदम और हव्वा को क्षमा करके उन्हें अपनी दया का पात्र बनाया।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की उद्दंडता, स्वयं अपने ऊपर अत्याचार है न कि ईश्वर पर, हमारे पाप ईश्वर को कोई क्षति नहीं पहुंचाते बल्कि स्वयं हमें अपमानित करते हैं।आदम और हव्वा पाप में भी सहभागी थे और तौबा व प्रायश्चित में भी साथ थे। पाप करने या उसकी क्षतिपूर्ति में स्त्री व पुरुष के बीच कोई अंतर नहीं तथा मूल रूप से परिपूर्णता प्राप्त करने या पतन की ओर जाने में स्त्री या पुरुष होने की कोई भूमिका नहीं है।हम केवल ईश्वर के समक्ष ही अपने पापों की स्वीकारोक्ति का अधिकार रखते हैं और यह स्वीकारोक्ति, ईश्वर द्वारा हमें क्षमा किए जाने की भूमिका है।पाप मनुष्य के घाटे का कारण है और केवल तौबा या प्रायश्चित द्वारा ही घाटे को रोका जा सकता है।