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    सूरए आराफ़, आयतें 203-206, (कार्यक्रम 278)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 203 की तिलावत सुनते हैंوَإِذَا لَمْ تَأْتِهِمْ بِآَيَةٍ قَالُوا لَوْلَا اجْتَبَيْتَهَا قُلْ إِنَّمَا أَتَّبِعُ مَا يُوحَى إِلَيَّ مِنْ رَبِّي هَذَا بَصَائِرُ مِنْ رَبِّكُمْ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (203)और जब आप उनके लिए कोई आयत अर्थात निशानी नहीं लाते तो वे कहते हैं कि आप स्वयं क्यों नहीं उसे चुन लेते, कह दीजिए कि मैं केवल उसी का अनुसरण करता हूं जो मेरे पालनहार की ओर से मेरे पास विशेष संदेश “वहि” के रूप में आता है। यह (क़ुरआन) तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारी आंखें खोलने वाले तर्क रखता है तथा ईमान वालों के लिए मार्गदर्शन एवं कृपा है। (7:203)क़ुरआने मजीद 23 वर्षों के दौरान हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर उतरा है। यही कारण है कि कभी कभी कई महीने तक कोई भी आयत पैग़म्बरे इस्लाम के पास नहीं आती थी। पैग़म्बर और इस्लाम के विरोधी, जिन्हें पैग़म्बर के पास आने वाली आयतों की कोई परवाह भी नहीं होती थी, इस बात को बहाना बना कर कटाक्ष किया करते थे कि इतने दिनों से पैग़म्बर पर वहि क्यों नहीं आई, क्या ईश्वर उनसे अप्रसन्न है?ईश्वर इस आयत में अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहता है कि इन लोगों से कह दीजिए के मैं अपनी ओर से कोई आयत प्रस्तुत नहीं करता कि जब कभी तुम चाहो तो मैं कोई आयत ले आऊं या फिर तुम्हारी इच्छा के अनुसार कोई चमत्कार पेश कर दूं। मैं तो केवल ईश्वर के विशेष संदेश “वहि” का अनुसरण करता हूं कि जो ईमान वालों के लिए मार्गदर्शन व दया तथा कृपा का कारण है।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार की पद्धति में हर समय लोगों को नसीहत करनी चाहिए जबकि कही चुप भी रहना चाहिए और नई परिस्थिति में फिर से बात करनी चाहिए।विरोधियों के बहानों और अनुचित मांगों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। हमें अपने मार्ग पर चलते रहना चाहिए और अपने मार्ग पर विश्वास रखना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 204 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا قُرِئَ الْقُرْآَنُ فَاسْتَمِعُوا لَهُ وَأَنْصِتُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ (204)और जब कभी क़ुरआन पढ़ा जाए तो उसे ध्यानपूर्वक सुनो और चुप रहो। शायद तुम पर दया हो जाए। (7:204)पिछली आयत में लोगों की चेतना व मार्गदर्शन में क़ुरआन के महत्त्व की ओर संकेत करने के पश्चात, इस आयत में ईश्वर कहता है कि हे ईमान वालों! जब पैग़म्बर या कोई अन्य व्यक्ति क़ुरआने मजीद की तिलावत करे तो उसका सम्मान करते हुए चुप रहो और बड़े ध्यान से ईश्वरीय आयतों को सुनो। सृष्टिकर्ता की वाणी का सम्मान, तुम्हें विशेष ईश्वरीय दया का पात्र बना देगा।जिस समय जमात के साथ नमाज़ पढ़ी जा रही होती है तो जब नमाज़ पढ़ने वाला सूरए हम्द और किसी अन्य सूरे की तिलावत कर रहा हो तो अन्य नमाज़ पढ़ने वालों के लिए अनिवार्य है कि वे चुप रहकर ध्यानपूर्वक तिलावत सुनें।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआन ईश्वर का कथन और आकाश की वाणी है इसके सामने चुप रहना चाहिए और पूरे ध्यान के साथ उसे सुनना चाहिए।क़ुरआन का सम्मान, ईश्वरीय दया का कारण बनता है, इसी प्रकार से क़ुरआन का अनादर ईश्वरीय कोप का कारण बनता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 205 की तिलावत सुनते हैंوَاذْكُرْ رَبَّكَ فِي نَفْسِكَ تَضَرُّعًا وَخِيفَةً وَدُونَ الْجَهْرِ مِنَ الْقَوْلِ بِالْغُدُوِّ وَالْآَصَالِ وَلَا تَكُنْ مِنَ الْغَافِلِينَ (205)और अपने पालनहार को अपने हृदय में गिड़गिड़ा कर तथा डर के साथ याद करो और प्रातः तथा संध्या धीमी आवाज़ में उसे याद किया करो और निश्चेत लोगों में सम्मलित न हो जाओ। (7:205)पिछली आयत में क़ुरआने मजीद की तिलावत के शिष्टाचार का उल्लेख किया गया था। यह आयत ईश्वर के स्मरण और उससे प्रार्थना के आधार का वर्णन करते कहती है कि मनुष्य के हृदय तथा आत्मा में ईश्वर की याद होनी चाहिए। प्रतिदिन दिनचर्या के आरंभिक व अंतिम समय अर्थात प्रातः तथा संध्या, ईश्वर को याद करना चाहिए। ईश्वर का यह स्मरण बुरी लगने वाली आवाज़ में नहीं बल्कि शांत स्वर में कि जो पालनहार के प्रति विनम्रता तथा भय को दर्शाता है।इस आयत में यद्यपि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित किया गया है किन्तु स्पष्ट है कि आयत का संबोधन उनके सभी अनुयाइयों तथा ईमान वालों के लिए है। अतः उन्हें सदैव ही ईश्वर की याद अपने मन और हृदय में रखनी चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का स्मरण उस समय मूल्यवान होता है जब ईश्वर की याद मनुष्य के भीतर हो। ऐसी याद का कोई लाभ नहीं है जो केवल ज़बान पर हो किन्तु हृदय बिल्कुल ही ख़ाली हो।ईश्वर की याद में दिखावा और हो हल्ला नहीं होना चाहिए बल्कि इसे शांति, विनम्रता और गिड़गिड़ाहट के साथ होना चाहिए।प्रत्येक दिन का आरंभ ईश्वर के नाम से करना चाहिए ताकि ईश्वर के लिए काम आरंभ हो। हर दिन का अंत भी ईश्वर के नाम से ही होना चाहिए। भले कर्मों पर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए और निश्चेतना तथा कमियों पर ईश्वर से क्षमा याचना तथा प्रायश्चित करना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयतर संख्या 206 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ عِنْدَ رَبِّكَ لَا يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِهِ وَيُسَبِّحُونَهُ وَلَهُ يَسْجُدُونَ (206)निसंदेह जो लोग तुम्हारे पालनहार के निकटवर्ती हैं वे उसकी उपासना करने में घमंड नहीं करते। वे उसका गुणगान करते हैं और (केवल) उसी के समक्ष सज्दा करते हैं। (7:206)पिछली आयत में ईश्वर को निरंतर याद करने की सिफ़ारिश के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि ईश्वर के प्रिय और निकटवर्ती बंदे, चाहे वे फ़रिश्ते हों, पैग़म्बर हों या अन्य पवित्र लोग, कभी भी ईश्वर के प्रति अपनी बंदगी और उपासना प्रकट करने में घमंड नहीं करते बल्कि वे सदैव हृदय और ज़बान से उसका गुणगान करते रहते हैं। वे महान ईश्वर के समक्ष नतमस्तक रहते हैं। जो लोग ऐसा नहीं करते उनेक भीतर अहंकार की भावना होती है और वे ईश्वर से भी घमंड करते हैं। मानो वे स्वयं को, रचयिता व सृष्टिकर्ता से आवश्यकतामुक्त समझते हो।इस आयत से हमने सीखा कि महान ईश्वर के मुक़ाबले में अहं और घमंड निरर्थक है, उसके समक्ष विनम्रता और अपने को तुच्छ समझना ही, महानता और उसके सामिप्य का कारण है।अपनी उपासनाओं पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि ईश्वर के निकटवर्ती बंदे सदैव उपासना और सज्दे में रहते हैं और कभी घमंड नहीं करते।