islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए आराफ़, आयतें 24-27, (कार्यक्रम 237)

    सूरए आराफ़, आयतें 24-27, (कार्यक्रम 237)

    Rate this post

    आइये सूरए आराफ़ की 24वीं और 25वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।قَالَ اهْبِطُوا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ وَلَكُمْ فِي الْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَمَتَاعٌ إِلَى حِينٍ (24) قَالَ فِيهَا تَحْيَوْنَ وَفِيهَا تَمُوتُونَ وَمِنْهَا تُخْرَجُونَ (25)(ईश्वर ने आदम, हव्वा और शैतान से) कहाः उतर जाओ कि तुममें से कुछ, कुछ अन्य के शत्रु हो। और तुम्हारे लिए एक निर्धारित समय तक धरती में ठिकाना और संभावनाएं होंगी। (7:24) (ईश्वर ने) कहाः इसी धरती में तुम्हें जीना और इसी धरती में तुम्हें मरना है और इसी से (प्रलय के दिन) तुम निकाले जाओगे। (7:25)जैसा कि अन्य आयतों में आया है कि ईश्वर ने आदम और हव्वा की तौबा स्वीकार कर ली परंतु चूंकि पाप के नकारात्मक प्रभाव बाक़ी रहते हैं अतः इस प्रतिबंधित फल के खाने और ईश्वर के आदेश की अवहेलना का परिणाम, उस स्वर्गीय स्थान से निकलकर धरती पर आना था।इन आयतों में ईश्वर कहता है। मैंने आदम व हव्वा को आदेश दिया कि वे स्वर्ग समान इन बाग़ों से निकल जाएं और धरती पर आवास करें कि वही उनका ठिकाना है। जब तक मैं उचित समझूंगा वे वहां पर रहेंगे और उसके पश्चात धरती से चले जाएंगे, यहां तक कि प्रलय में हिसाब किताब के लिए एक बार पुनः उठाए जाएंगे।यह आयतें लोगों की आपस में तथा मनुष्यों से शैतान की शत्रुता की ओर संकेत करते हुए कहती हैं। धरती पर जीवन द्वेष और शत्रुता के साथ है, जबकि इसके विपरीत स्वर्ग में इस प्रकार की कोई बात नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि कभी कभी माता पिता का क्रियाकलाप उनके पूरे वंश के पतन और तबाही का कारण बनता है। आदम और हव्वा द्वारा ईश्वर के आदेश की अवहेलना पूरी मानव जाति के, धरती की ओर पतन का कारण बनी।संसार, विवाद व मतभेद और गतिरोध का स्थान है और ये बातें शत्रुता का कारण बनती हैं।आइये अब सूरए आराफ़ की 26वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا بَنِي آَدَمَ قَدْ أَنْزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآَتِكُمْ وَرِيشًا وَلِبَاسُ التَّقْوَى ذَلِكَ خَيْرٌ ذَلِكَ مِنْ آَيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ (26)हे आदम की संतान! निसंदेह हमने तुम्हारे लिए एक वस्त्र भेजा कि जो तुम्हारे शरीर को भी छिपाए और तुम्हारे लिए शोभा भी हो। (परंतु) ईश्वर से भय (और पवित्रता) का वस्त्र सबसे अच्छा है। यह सब ईश्वर की निशानियों में से है, शायद तुम्हें समझ आ जाए। (7:26)जैसा कि हमने पिछली आयतों में कहा था कि शैतान के बहाकाने में आकर हज़रत आदम और हव्वा ने ईश्वर द्वारा प्रतिबंधित पेड़ का फल खा लिया था जिसका पहला परिणाम यह था कि वे निर्वस्त्र हो गये और वे पेड़ों के पत्तों से अपने शरीर छिपाने पर विवश हो गये।इस आयत में ईश्वर कहता है। आदम और हव्वा को धरती पर भेजने और वहां उनका ठिकाना बनाने के पश्चात हमने वस्त्र तैयार करने के साधन उनके लिए उपलब्ध कराए। पशुओं की खाल और ऊन, ऐसा पहनावा था जो शरीर को भी छिपाता था और एक प्रकार की शोभा भी समझा जाता था। आज हज़ारों वर्ष बीत जाने के बाद भी मानवजाति इसी ईश्वरीय अनुकंपा से अपने बेहतरीन वस्त्रों और पहनावों को तैयार करती है।इस स्थान पर क़ुरआने मजीद कहता है। ये वस्त्र, भौतिक शरीर का वस्त्र है और इससे बेहतर वस्त्र, ईश्वर से भय का वस्त्र है जो इस बात की अनुमति नहीं देता कि मनुष्य की बुराईयां और आवगुण प्रकट हों। यह ऐसा वस्त्र है जो पवित्रता और लज्जा का कारण बनता है और मनुष्य को आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र बना देता है।इस आयत से हमने सीखा कि शैतान मनुष्य की नग्नता चाहता है जबकि ईश्वर ने मनुष्य को छिपाने के साधन उपलब्ध कराए हैं।वस्त्रों की सज्जा और पवित्रता, ईश्वर को प्रिय है और सौन्दर्य तथा साज व सज्जा से लाभान्वित होने में उस समय तक कोई रुकावट नहीं है जब तक उससे कोई वर्जित कार्य न हो।मनुष्य का वस्त्र या रूई से बनता है या ऊन से या फिर खाल से, और ये सब ईश्वर की रचनाएं हैं और इन पर ध्यान देना, मनुष्य की चेतना का कारण बनता है।आइये अब सूरए आराफ़ की 27वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا بَنِي آَدَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطَانُ كَمَا أَخْرَجَ أَبَوَيْكُمْ مِنَ الْجَنَّةِ يَنْزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْآَتِهِمَا إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ (27)हे आदम की संतान! कहीं शैतान तुम्हें धोखा न दे दे, जिस प्रकार उसने तुम्हारे माता पिता (आदम और हव्वा) को स्वर्ग से निकलवा दिया था और उनके शरीर से वस्त्रों को उतार दिया था ताकि उनके गुप्तांग प्रकट हो जाएं। निसंदेह शैतान और उसका गुट तुम्हें उस ओर से देखता है जहां से तुम उन्हें नहीं देख पाते। निसंदेह हमने शैतानों को उन लोगों का अभिभावक बना दिया है जो ईमान नहीं लाते। (7:27)चूंकि शैतान की शत्रुता केवल हज़रत आदम और हव्वा से नहीं थी बल्कि उसने पूरी मानव जाति से शत्रुता की सौगंध खाई थी अतः इस आयत में ईश्वर आदम की संतान को सिफ़ारिश करता है कि सचेत रहो कि जिस प्रकार उसने तुम्हारे माता पिता अर्थात आदम व हव्वा को धोखा दिया था उस प्रकार वह तुम्हें धोखा न देने पाए।शैतान तुम्हारे माता पिता को बहकाकर स्वर्ग से निकलवाने में सफल हो गया था। शैतान और उसका वंश इस प्रकार का है कि वह तुम्हें देख सकता है परंतु तुम उसे नहीं देख सकते। परंतु इन सबके बावजूद उन्हें तुम पर प्रभुत्व प्राप्त नहीं है और वे तुम्हें किसी भी काम पर विवश नहीं कर सकते। उनका काम केवल बहकाना है। और इस बहकावे में केवल वही लोग आते हैं जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान नहीं रखते।इस आयत से हमने सीखा कि ख़तरा सदैव घात में है, स्वयं को कभी भी सुरक्षित नहीं समझना चाहिए। फ़रिश्तों के सज्दों के पात्र, हज़रत आदम भी शैतान से धोखा खाकर स्वर्ग से निकलने पर विवश हो गये।नग्नता, ईश्वर के दरबार से निकलने का कारण है, हर वो काम शैतानी कर्म है जो नग्नता का कारण बने।शैतान अकेला नहीं है, उसके अनेक गुट व पिठ्ठु हैं चाहें जिनों में से हों या मनुष्यों में से।ईश्वर पर वास्तविक ईमान, मनुष्य पर शैतान के प्रभुत्व में बाधा है।