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    सूरए आराफ़, आयतें 28-30, (कार्यक्रम 238)

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    आइये सूरए आराफ़ की 28वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً قَالُوا وَجَدْنَا عَلَيْهَا آَبَاءَنَا وَاللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا قُلْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (28)और जब वे कोई अशिष्ट कर्म करते हैं तो (उसके औचित्य में) कहते हैं, हमने अपने पूर्वजों को भी यही कर्म करते देखा है और ईश्वर ने हमें इसका आदेश दिया है। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि ईश्वर कभी भी अशिष्ट कर्म का आदेश नहीं देता। क्या तुम ईश्वर की ओर ऐसी बातों को संबंधित करते हो जिनका तुम्हें ज्ञान नहीं है। (7:28)इससे पहले हमने कहा था कि शैतान ने मनुष्य को धोखा दिया जिसके कारण हज़रत आदम और हव्वा निर्वस्त्र हो गए। अतः ईश्वर हम मनुष्यों को, जो हज़रत आदम और हव्वा के वंश से हैं, सिफ़ारिश करता है कि सचेत रहो और शैतान के धोखे में मत आओ क्योंकि वह लोगों के बीच पड़े हुए पर्दों को उठा देता है और बुराइयों को प्रकट कर देता है।यह आयत अज्ञानता के काल में अरबों में उचित आवरण न होने की ओर संकेत करती है। जैसा कि क़ुरआने मजीद की तफ़सीरों अर्थात व्याख्या करने वाली पुस्तकों में कहा गया है कि मक्के के अनेकेश्वरवादी, हज़रत इब्राहीम की परंपरा के अनुसार हर वर्ष हज किया करते थे परंतु उनका हज हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं के विपरीत था। उनका मानना था कि हज के दौरान काबे का तवाफ़ करने वाले अर्थात उसका चक्कर काटने वाले का वस्त्र स्वच्छ, पवित्र और छीना हुआ या हराम कमाई का नहीं होना चाहिए। अतः जब भी उन्हें थोड़ा सा भी संदेह होता था कि उनका वस्त्र पूर्णतः हलाल है या नहीं, वे तवाफ़ करते समय कपड़े उतार देते और निर्वस्त्र होकर, तवाफ़ करने लगते। अपने इस कार्य को वे उपासना समझते थे।इस आयत में क़ुरआन उनके इस कार्य को अत्यंत गंदा और बुरा बताते हुए कहता है कि अनेकेश्वरवादी अपने इस बुरे कर्म के औचित्य में कहते हैं कि हमने अपने पूर्वजों को भी ऐसे ही करते देखा है और यह उनकी परंपरा है। इसके अतिरिक्त हम ईश्वर की उपासना करते हैं और उसने हमें इस काम का आदेश दिया है।इस आयत से हमने सीखा कि मानव समाजों में प्रचलित बहुत से अंधविश्वासों की जड़, पूर्वजों का अंधा अनुसरण है, जबकि पूर्वजों की परंपरा की सुरक्षा का अर्थ, अपनी बुद्धि और विचार को छोड़ना नहीं है।ईश्वर की उपासनाओं में उसके आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए वरना उपासना में अंधविश्वास शामिल हो जाता है।आइये अब सूरए आराफ़ की 29वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।) قُلْ أَمَرَ رَبِّي بِالْقِسْطِ وَأَقِيمُوا وُجُوهَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَ (29)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मेरे पालनहार ने न्याय का आदेश दिया है और (यह कि) तुम हर (नमाज़ के समय) मस्जिद में अपना मुख (उसी की ओर) सीधा रखा करो और धर्म को ईश्वर के लिए विशुद्ध रखते हुए उसे पुकारो। उसने जिस प्रकार आरंभ में तुम्हारी सृष्टि की है उसी प्रकार तुम पलट कर जाओगे। (7:29)अनेकेश्वरवादियों द्वारा अपने अशिष्ट कर्म को ईश्वर से संबंधित करने और अपने आपको निर्दोष बताने के पश्चात ये बयत उनके उत्तर में कहती है, ईश्वर सदा ही भलाई, पवित्रता, सत्य और अच्छाई का आदेश देता है और चाहता है कि सभी मस्जिदों विशेषकर मस्जिदुलहराम में नमाज़ और तवाफ़ के लिए उपस्थिति के समय केवल उसी की ओर उन्मुख रहो और अपने कर्म को हर प्रकार के अंधविश्वास से दूर करो और इसी प्रकार अपनी आस्थाओं को भी हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से दूर करके शुद्ध कर लो। जान लो कि तुम सबको ईश्वर ही की ओर लौटना है जो तुम्हारी पुनः सृष्टि में सक्षम है, क्योंकि उसी ने पहली बार तुम्हारी रचना की थी।इस आयत से हमने सीखा कि न्याय, ईश्वरीय आदेशों की धुरि और मनुष्य को ईश्वर की सबसे महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिश है।शुद्ध और निष्ठापूर्ण बंदगी, न्याय के प्रसार की भूमिका है और उसके क्रियान्वयन को सुनिश्चित बनाती है।आइये अब सूरए आराफ़ की 30वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।فَرِيقًا هَدَى وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيْهِمُ الضَّلَالَةُ إِنَّهُمُ اتَّخَذُوا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ مِنْ دُونِ اللَّهِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ مُهْتَدُونَ (30)(ईश्वर ने) एक गुट का मार्गदर्शन किया और एक अन्य गुट पर पथभ्रष्टता छा गई क्योंकि उन्होंने ईश्वर के स्थान पर शैतानों को अपना अभिभावक बना लिया है और वे सोचते हैं कि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त है। (7:30)पिछली आयत में न्याय के आधार पर जीवन और उपासना की शैली का वर्णन करने के पश्चात इस आयत में कहा गया है कि एक गुट इन ईश्वरीय सिफ़ारिशों को स्वीकार करके मार्गदर्शित हो जाता है परंतु अन्य लोग ईश्वरीय आदेशों का उल्लंघन और शैतान का अनुसरण करके, पथभ्रष्टता के पात्र बन जाते हैं और यह सोचते है कि उन्हें मार्गदर्शन और मोक्ष प्राप्त हो गया है।अपनी आयु में मनुष्य को सदैव जिन बातों की ओर से ख़तरा रहता है उनमें अपने बारे में ग़लत विचार भी शामिल है। मनुष्य कुएं में गिरा हुआ हो और यह सोचे कि वो सही मार्ग पर है, घाटी में गिरने जा रहा हो और यह विचार करे कि कल्याण के मार्ग पर है। यह शैतान के हथकंडों और चालों में से एक है कि वो आरंभ में मनुष्य को एक ग़लत बात, सत्य के रूप में दिखाता है और फिर उसकी ओर निमंत्रण देता है।क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में इस प्रकार के लोगों को सबसे अधिक घाटा उठाने वाला बताते हुए कहा गया है कि इस प्रकार के लोग अपने बुरे कर्मों को अच्छा समझते हैं। इस संसार में उनके सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं और वे ख़ाली हाथ परलोक जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि मार्गदर्शन ईश्वर का काम है और उसी की ओर से होता है जबकि पथभ्रष्टता हमारी ओर से और हमारे ग़लत चयन के कारण होती है।ईश्वर से दूर होना, शैतान के जाल में फंसने और उसका प्रभुत्व स्वीकार करने का कारण बनता है, यहां तक कि मनुष्य ईश्वर का मित्र बनने के स्थान पर शैतान का मित्र बन जाता है।हमें सचेत रहना चाहिए कि कहीं ऐसे लोगों में से न हो जाएं कि जो यह सोचते है कि वे सत्य के मार्ग पर हैं जबकि उनका कर्म असत्य के अनुसार होता है।