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    सूरए आराफ़, आयतें 31-33, (कार्यक्रम 239)

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    आइये सूरए आराफ़ की 31वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।يَا بَنِي آَدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَكُلُوا وَاشْرَبُوا وَلَا تُسْرِفُوا إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُسْرِفِينَ (31)हे आदम की संतानो! हर मस्जिद के निकट (उपासना के समय) अपनी शोभा को धारण कर लो और खाओ पियो परंतु अपव्यय न को कि ईश्वर अपव्यय करने वालों को पसंद नहीं करता। (7:31)इससे पहले हम ईश्वर द्वारा हज़रत आदम की संतान को की गई सिफ़ारिशों से अवगत हुए। इस आयत में ईश्वर कहता है कि हे आदम की संतानो! वस्त्र तुम्हारी शोभा हैं और मस्जिदुल हराम में काबे के तवाफ़ अर्थात उसका चक्कर काटते समय इस शोभा को धारण किए रहो तथा अज्ञानता के काल के अपने पूर्वजों की भांति निर्वस्त्र होकर तवाफ़ न करो। न केवल मस्जिदुल हराम बल्कि जिस मस्जिद में भी तुम प्रविष्ट हो, अपनी यह शोभा धारण किए रहो और इस पवित्र स्थान का सम्मान करो।इस्लामी शिक्षाओं में भी, नमाज़ के लिए मस्जिद में प्रविष्ट होते समय, सुन्दर वस्त्र पहनने और इत्र लगाने पर बल दिया गया है और धार्मिक नेता इन बातों का पालन करते थे और इन पर अत्यधिक ध्यान देते थे।आगे चलकर आयत खाने पीने के मामले की ओर संकेत करती है और कहती है कि ईश्वर ने तुम्हें जो अनुकंपाएं और विभूतियां दी हैं उन्हें खाओ पियो किन्तु अपव्यय न करो।जैसा कि हमने जाना, एक प्रतिबंधित पेड़ का फल खाने के कारण आदम और हव्वा को स्वर्ग से निकलना पड़ा। यह आयत मनुष्यों को सावधान करती है कि देखो कहीं तुम्हारा भी यही परिणाम न हो।ईश्वर ने जो कुछ तुम्हें दिया है, उससे लाभान्वित होते समय ईश्वर की आज्ञा का पालन करो। किसी भी प्रकार का अपव्यय और सत्य की सीमा से आगे बढ़ जाना उद्दंडता है।इस आयत से हमने सीखा कि मस्जिद ईश्वर का घर है और उसके दासों के एकत्रित होने का स्थान है, अतः इसे सदैव सुसज्जित और आकर्षक रहना चाहिए।आत्मा के आहार को शरीर के भोजन पर वरीयता प्राप्त है, पहले नमाज़, फिर भोजन।अपनी आवश्यकता के अनुसार ईश्वरीय व प्राकृतिक अनुकंपाओं से लाभ उठाने में हर्ज नहीं है परंतु मनुष्य को अपव्यय का अधिकार नहीं है।आइये अब सूरए आराफ़ की 32वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ مَنْ حَرَّمَ زِينَةَ اللَّهِ الَّتِي أَخْرَجَ لِعِبَادِهِ وَالطَّيِّبَاتِ مِنَ الرِّزْقِ قُلْ هِيَ لِلَّذِينَ آَمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا خَالِصَةً يَوْمَ الْقِيَامَةِ كَذَلِكَ نُفَصِّلُ الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ (32)(हे पैग़म्बर! ईमान वालों से) कह दीजिए कि किस ने उस शोभा को, जिसे ईश्वर ने अपने बंदों के लिए पैदा किया था और पवित्र रोज़ी को वर्जित कर दिया है? कह दीजिए कि ये अनुकंपाएं प्रलय में केवल उन लोगों के लिए हैं जो संसार के जीवन में ईमान लाए। हम इसी प्रकार, ज्ञान वालों के लिए अपनी आयतों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। (7:32)पिछली आयत में ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होने की सिफ़ारिश की गई थी, इस आयत में कड़े स्वर में ये पूछा गया है कि किसने कहा है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं और शोभाओं से लाभान्वित होना वर्जित है? ईश्वर ने इन शोभाओं और अनुकंपाओं को इस लिए उत्पन्न किया है ताकि उसके अच्छे और ईमान वाले बंदे उनसे लाभान्वित हों। अलबत्ता उसने काफ़िरों को भी इन अनुकंपाओं से लाभान्वित होने से नहीं रोका है किन्तु प्रलय में ये अनुकंपाएं, केवल ईमान वालों से विशेष हैं।इस संबंध में अधिकांश लोग या तो अतिशयोक्ति करते हैं, या फिर लाभान्वित ही नहीं होते। कुछ लोग ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभान्वित होने में अपव्यय करते हैं जबकि एक अन्य गुट दुनिया को पूर्णतः त्याग कर अपनी प्राकृतिक इच्छाओं और आवश्यकताओं की अनदेखी करता है। क़ुरआन ऐसे दोनों गुटों की आलोचना करता है। पहले गुट से वह कहता है कि तुम अपव्यय क्यों करते हो जबकि दूसरे गुट से कहता है कि हलाल अर्थात वैध ईश्वरीय अनुकंपाओं से क्यों लाभ नहीं उठाते?इस आयत से हमने सीखा कि जिस प्रकार ईश्वर द्वारा वर्जित की गई वस्तुओं को हलाल करना वैध नहीं है उसी प्रकार ईश्वर द्वारा हलाल बताई गई वस्तुओं को वर्जित करना भी अवैध है।ईश्वर ने धार्मिक क़ानूनों के परिप्रेक्ष्य में वैध शोभाओं से लाभान्वित होने के लिए ईमान वालों को प्रोत्साहित किया है।सांसारिक अनुकंपाओं से लाभ उठाने में काफ़िर और ईमान वाले समान हैं परंतु प्रलय में ये अधिकार केवल ईमान वालों को होगा।आइये अब सूरए आराफ़ की 33वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قُلْ إِنَّمَا حَرَّمَ رَبِّيَ الْفَوَاحِشَ مَا ظَهَرَ مِنْهَا وَمَا بَطَنَ وَالْإِثْمَ وَالْبَغْيَ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَأَنْ تُشْرِكُوا بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ سُلْطَانًا وَأَنْ تَقُولُوا عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (33)(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि मेरे पालनहार ने केवल कुकर्मों को वर्जित किया है, चाहे वे प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष। और (इसी प्रकार उसने) पाप और बिना किसी कारण के अत्याचार, किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराने, जिसके लिए ईश्वर ने कोई तर्क नहीं भेजा और बिना ज्ञान के किसी बात को ईश्वर की ओर संबंधित करने को (वर्जित किया है।) (7:33)कुछ भोले भाले ईमान वाले यह सोचते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग उपासना, और समाज से दूर रहते हुए सभी आनंदो को छोड़ देना है। वे यह भी सोचते हैं कि संसार और उसके प्रतीकों को त्यागकर ही ईश्वर का भय प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे लोग संसार के लिए प्रयास को बुरा काम समझते हैं। यह आयत ऐसे विचारों के उत्तर में कहती हैःईश्वर ने केवल कुछ निर्धारित कर्मों को वर्जित और अप्रिय घोषित किया है, उनके अतिरिक्त जितने भी कर्म हैं सब वैध हैं। ईश्वर ने, दूसरों पर अत्याचार, पाप, उद्दंडता, कुकर्मों, अनेकेश्वरवाद, दिखावे और धर्म में अंधविश्वास और अनुचित बातें शामिल करने को वर्जित किया है। तुम इन बातों को छोड़कर, संसार और उसकी अनुकंपाओं से जितना चाहो लाभान्वित हो सकते हो।इस आयत से हमने सीखा कि हलाल वस्तुएं अत्याधिक हैं किन्तु अवैध और वर्जित वस्तुएं बहुत कम हैं। ईश्वर ने मनुष्य का हाथ खुला रखा है और केवल कुछ सीमित मामलों में उस पर प्रतिबंध लगाया है।ईश्वर ने केवल ऐसे मामलों को वर्जित किया है जो मनुष्य की आत्मा और शरीर को दूषित करते हैं। यह ऐसी बातें हैं जिनको मानव प्रवृत्ति भी समझती और स्वीकार करती है।पाप, पाप होता है, चाहे लोग उसकी बुराई को समझें या न समझें। पाप की बुराई स्वयं उसी से संबंधित है, यह नहीं सोचना चाहिए कि यदि लोग समझ जाएं तो पाप बुरा है और यदि न समझें तो बुरा नहीं है।