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    सूरए आराफ़, आयतें 34-38, (कार्यक्रम 240)

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    आइये सूरए आराफ़ की 34वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَلِكُلِّ أُمَّةٍ أَجَلٌ فَإِذَا جَاءَ أَجَلُهُمْ لَا يَسْتَأْخِرُونَ سَاعَةً وَلَا يَسْتَقْدِمُونَ (34)और हर जाति के लिए एक नियम समय हे तो जब उनका समय आ जाए तो न वे उसे एक घड़ी के लिए पीछे टाल सकते हैं और न ही उसे आगे बढ़ा सकते हैं। (7:34)मृत्यु और जीवन के अंत की ओर से निश्चेत रहना, उन बातों में से एक है जिन पर प्रायः लोग ध्यान नहीं देते हैं। न केवल यह कि एक-एक करके प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु का स्वाद चखना है बल्कि इस आय और क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों के अनुसार मानव जातियों और सभ्यताओं का भी अंत होना है। हमको इतिहास में ऐसी बहुत सी सभ्यताएं मिल जाएंगी जो अपने अत्याचारों या फिर आलस्य एवं एश्वर्य के कारण समाप्त हो गई।प्रायः धनवान लोग यह सोचते हैं कि वे सदैव ऐसे ही रहेंगे और उनके धन तथा शक्ति का अंत नहीं होगा। परंतु यह आयत कहती है कि ईश्वर जब भी चाहे तो उसका अंत हो जाएगा और इसमें क्षण भर की भी देरी नहीं होगी।इस आयत से हमने सीखा कि अवसर और संभावनाएं, समाप्त होने वाली हैं। अपनी क्षमता के अनुसार, हमें उनसे भरपूर और सबसे उचित लाभ उठाना चाहिए।अत्याचारियों को ईश्वर द्वारा दी गई मोहलत को, उसकी कृपा की निशानी नहीं समझना चाहिए क्योंकि उनका समय भी समाप्त होगा और फिर उन्हें अपने कर्मों का हिसाब-किताब देना होगा।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 35 और 36 की तिलावत सुनते हैं।يَا بَنِي آَدَمَ إِمَّا يَأْتِيَنَّكُمْ رُسُلٌ مِنْكُمْ يَقُصُّونَ عَلَيْكُمْ آَيَاتِي فَمَنِ اتَّقَى وَأَصْلَحَ فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ (35) وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا أُولَئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (36)हे आदम की संतान! जब भी तुम लोगों में से पैग़म्बर आए और तुम्हारे लिए मेरी आयतों का वर्णन करे तो (उस समय) जो कोई ईश्वर से डरे और स्वयं को सुधार ले तो ऐसे लोगों के लिए न तो कोई भय है और न ही वे दुःखी होंगे। (7:35) और जिन लोगों न हमारी आयतों अर्थात निशानियों को झुठलाया और घमंड से काम लिया तो वही लोग नरक (में जाने) वाले हैं जहां वे अनंतकाल तक रहेंगे। (7:36)पिछले कार्यक्रम में ईश्वर द्वारा हज़रत आदम की संतान और मानवजाति को की गई कुछ सिफ़ारिशों का वर्णन किया गया। इन आयतों में ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार करने या नकारने के संबंध में मनुष्यों में पाए जाने वाले मतभेद की ओर संकेत करते हुए कहा गया है। ईश्वर ने सदैव ही तुम मनुष्यों के बीच पैग़म्बरों को भेजा है जो लोगों को भलाई और पवित्रता का निमंत्रण देते हैं परंतु उनके इस निमंत्रण के संबंध में दो गुट बन गए।एक गुट ईश्वर का भय रखने तथा सुधार चाहने वालों का है जो लोक-परलोक में मोक्ष और कल्याण का पात्र है। इस गुट ने चूंकि ईश्वर पर भरोसा किया है अतः उसे कभी भी पश्चाताप पर दुख नहीं होगा। यहां तक कि किसी भी प्रकार का भय नहीं होगा क्योंकि जो ईश्वर से डरता है उसे संसार की किसी भी अन्य शक्ति से भय नहीं होता बल्कि वह नरक से भी नहीं डरता।दूसरा गुट शत्रुता और हठधर्मी के कारण न केवल ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण को ठुकरा देता है बल्कि उसे झूठ तक बताता है ताकि ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत कर सके। वस्तुतः ऐसे लोग संसार के मोक्ष पर उसके आराम और ऐश्वर्य को श्रेष्ठता देते हैं। यह लोग प्रलय में भी नरक में जाएंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर से भय और सच्ची पवित्रता के लिए आवश्यक है कि समाज और उसके सभी लोगों के सुधार के लिए प्रयास किया जाए।वास्तविक शांति, पवित्रता और भलाई से प्राप्त होती है जिसके कारण भय और दुःख समाप्त हो जाते हैं।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 37 की तिलावत सुनते हैं।فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ كَذَّبَ بِآَيَاتِهِ أُولَئِكَ يَنَالُهُمْ نَصِيبُهُمْ مِنَ الْكِتَابِ حَتَّى إِذَا جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا يَتَوَفَّوْنَهُمْ قَالُوا أَيْنَ مَا كُنْتُمْ تَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ قَالُوا ضَلُّوا عَنَّا وَشَهِدُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ أَنَّهُمْ كَانُوا كَافِرِينَ (37)तो उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर पर झूठा आरोप लगाए या उसकी आयतों को झुठलाए? ऐसे लोगों को (संसार में उनके भाग्य में) लिखा हुआ भाग मिलता रहेगा, यहां तक कि हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते उनकी जान लेने के लिए आएंगे तो उनसे पूछेंगे कि वे (सब) कहां हैं जिन्हें तुम ईश्वर के बजाए पुकारा करते थे। वे कहेंगे कि वे (सब) आंखों से ओझल और गुम हो गए। और इस प्रकार से वे अपने ही विरुद्ध गवाही देंगे कि वे काफ़िर थे। (7:37)यह आयत प्रलय में काफ़िरों की स्थिति के बारे में कहती है कि पैग़म्बरों को झूठा बताने वाले काफ़िर, स्वयं ही झूठे हैं क्योंकि वे वास्तविकता को समझ चुके हैं परंतु फिर भी उसे झुठलाते हैं। ऐसे लोग सांसारिक अनुकंपाओं से वंचित नहीं हैं और संसार में ईश्वर उनकी रोज़ी कम नहीं करता परंतु मृत्यु के समय जब फ़रिश्ते उनकी जान ले रहे होते हैं, वे अपनी इस पथभ्रष्टता को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि हम ईश्वरीय अनुकंपाओं पर अकृतज्ञ रहें और हमने ईश्वरीय निशानियों को झुठलाया।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य और वास्तविकता का इन्कार अपने आप पर बड़ा अत्याचार है और स्वयं पर अत्याचार, दूसरों पर अत्याचार करने से भी अधिक बुरा है।संसार की अनुकंपाओं में हर व्यक्ति का एक स्पष्ट और निर्धारित भाग है जो ईश्वर ने उनके लिए विशेष किया है।प्रलय में सबसे पहला न्यायाधीश, स्वयं मनुष्य की अंतरात्मा है जो मनुष्य के विरुद्ध गवाही देगी।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 38 की तिलावत सुनते हैंقَالَ ادْخُلُوا فِي أُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِنْ قَبْلِكُمْ مِنَ الْجِنِّ وَالْإِنْسِ فِي النَّارِ كُلَّمَا دَخَلَتْ أُمَّةٌ لَعَنَتْ أُخْتَهَا حَتَّى إِذَا ادَّارَكُوا فِيهَا جَمِيعًا قَالَتْ أُخْرَاهُمْ لِأُولَاهُمْ رَبَّنَا هَؤُلَاءِ أَضَلُّونَا فَآَتِهِمْ عَذَابًا ضِعْفًا مِنَ النَّارِ قَالَ لِكُلٍّ ضِعْفٌ وَلَكِنْ لَا تَعْلَمُونَ (38)ईश्वर कहेगा, तुम भी, जिन्नों व मनुष्यों के उन गुटों के साथ जो तुम से पहले थे, नरक में चले जाओगे। जब कोई गुट नरक में प्रविष्ट होगा तो वह अपने जैसे दूसरे गट को लानत अर्थात धिक्कार करेगा, यहां तक कि जब सब नरक में एकत्रित हो जाएंगे तो बाद वाला गुट पहले वाले के बारे में कहेगा। हे हमारे पालनहारः इन्हीं लोगों ने हमें पथभ्रष्ट किय तो तू इन्हें नरक में दोहरा दंड दे। ईश्वर कहेगा कि सभी के लिए दोहरा दंड है पर तुम नहीं जानते हो। (7:38)यह आयत नरक वालों की आपसी बातचीत और विशेषकर उन पुरखों से बातचीत का वर्णन करती है जिनके कारण उन्हें नरक में जाना पड़ा है। आयत कहती है कि प्रलय में कर्मों के हिसाब-किताब के पश्चात नरक वाले, गुट-गुट करके नकर में जाएंगे और हर गुट दूसरे गुट को धिक्कार करेगा। इनमें से कुछ जिन्नों के होंगे और कुछ मनुष्यों के।प्रलय में लोग अपने पथभ्रष्ट नेताओं से कहेंगे कि तुम्हारे कारण हम पथभ्रष्ट हुए अतः तुम्हें हमसे दुगना दंड मिलना चाहिए। स्वयं अपनी पथभ्रष्टता के लिए एक दंड और हमें पथभ्रष्ट करने के लिए एक अन्य दंड।इस आयत से हमने सीखा कि स्वर्ग में पूर्ण रूप से शांति का वातावरण होगा परंतु नरक धिक्कार का ठिकाना है। स्वर्ग वालों की मित्रता टिकाऊ और घनिष्ट होगी जबकि नरक वाले सामने तो एक दूससे के मित्र हैं परंतु पीठ पीछे एक दूसरे को धिक्कार करते हैं।मनुष्यों की भांति जिन्नों पर भी कर्मों का दायित्व है और दोनों गुटों के पापियों का एक समान अंत होगा और दोनों एक ही नरक में होंगे।प्रलय में पापी अपने पास एक दूसरे की गर्दन पर डालने का प्रयास करेंगे या कम से कम दूसरों को अपने पाप में भागीदार बनाने का प्रयास करेंगे।