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    सूरए आराफ़, आयतें 39-43, (कार्यक्रम 241)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 39 और 40 की तिलावत सुनते हैंوَقَالَتْ أُولَاهُمْ لِأُخْرَاهُمْ فَمَا كَانَ لَكُمْ عَلَيْنَا مِنْ فَضْلٍ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنْتُمْ تَكْسِبُونَ (39) إِنَّ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَاسْتَكْبَرُوا عَنْهَا لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَابُ السَّمَاءِ وَلَا يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّى يَلِجَ الْجَمَلُ فِي سَمِّ الْخِيَاطِ وَكَذَلِكَ نَجْزِي الْمُجْرِمِينَ (40)और पहले (दंडित होने) वाले अपने बाद वालों से कहेंगे कि तुम्हें हम पर कोई वरीयता प्राप्त नहीं है तो अपने किए का दंड चखो। (7:39) निसंदेह, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया और अकड़ कर उनसे मुंह मोड़ लिया उनके लिए न आकाश के (दया के) द्वार खोले जाएंगे और न ही वे स्वर्ग में जा पाएंगे सिवाए इसके कि ऊंट सूई के नाके में से गुज़र जाए और हम इसी प्रकार अपराधियों को दंडित करते हैं। (7:40)इससे पहले हमने नरकवासियों की आपसी बात-चीत के कुछ अंशों की ओर संकेत किया। इन आयतों में क़रआने मजीद कहता है कि यद्यपि पथभ्रष्ट अनुसरणकर्ता अपने पापों के लिए अपने नेताओं को दोषी ठहराएंगे परंतु उनके नेता, जो उनसे पहले नरक में पहुंच चुके होंगे, उत्तर में कहेंगे, तुम्हें हम पर कोई श्रेष्ठता नहीं है कि तुम्हारा दंड हमसे कम हो, तुम भी हमारी ही भांति अपराधी हो और तुम्हें भी दंड चखना होगा।इस प्रकार की बातों के उत्तर में ईश्वर कहता है कि किसी प्रकार के बहानों से इन दोनों में से किसी भी गुट को मुक्ति नहीं मिलेगी और नरक से उनके निकलने का कोई मार्ग नहीं है क्योंकि उन्होंने अपनी हठ और द्वेष के कारण तथा घमंड और वर्चस्व प्रेम के चलते न केवल यह कि सत्य को स्वीकार नहीं किया बल्कि उसे झुठलाया भी।यहां पर ईश्वर एक उदाहरण देते हुए कहता है कि यदि ऊंट, सूई के नाके में से निकल सकता हो तो ये लोग भी नरक से मुक्ति पाकर स्वर्ग में जा सकते हैं परंतु यह संभव नहीं है, उनका दंड बहुत कड़ा है और उनमें ईश्वरीय दया का पात्र बनने की कोई भी संभावना नहीं है।इन आयतों से हमने सीखा कि लोक-परलोक में मनुष्य का अंजाम, स्वयं उसी के कर्मों पर निर्भर है। दूसरों के बड़े अपराधों के कारण किसी के छोटे अपराध क्षमा नहीं किए जा सकते।पाप, ईश्वरीय दया के द्वार मनुष्य के लिए बंद करके उसे ईश्वर की विशेष कृपाओं से वंचित कर देता है।ईश्वर के इन्कार और उसकी निशानियों को झुठलाने का मुख्य कारण, ईश्वरीय धर्मों के तर्कों की कमज़ोरी नहीं बल्कि अहं और वर्चस्ववाद है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 41 की आयत सुनते हैंلَهُمْ مِنْ جَهَنَّمَ مِهَادٌ وَمِنْ فَوْقِهِمْ غَوَاشٍ وَكَذَلِكَ نَجْزِي الظَّالِمِينَ (41)अपराधियों के लिए नरक की आग का बिछौना होगा और उनके सिरों पर भी आग का ओढ़ना होगा और हम इसी प्रकार अत्याचारियों को दंडित करते हैं। (7:41)प्रलय में काफ़िरों को दिए जाने वाले कड़े दंड का वर्णन करते हुए इस आयत में कहा गया है कि नरक में काफ़िरों का ओढ़ना-बिछौना आग है। आग उन्हें चारों ओर घेरे हुए होगी और उनके लिए आराम तथा चैन की सांस लेने का कोई स्थान नहीं होगा।इन आयतों में ईश्वर ने काफ़िरों को कभी अत्याचारी कहा है और कभी अपराधी क्योंकि कुफ़्र से अपराध तथा अत्याचार का मार्ग प्रशस्त होता है।इस आयत से हमने सीखा कि जो लोग संसार में केवल आराम के प्रयास में व्यस्त थे, प्रलय में उनका ठिकाना नरक होगा। मानों आग के अतिरिक्त कोई अन्य वस्तु उनके अपवित्र अस्तित्व को शांत नहीं कर सकती।नरक की आग काफ़िरों और अत्याचारियों के पूरे अस्तित्व को लपेट में ले लेगी।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 42 की तिलावत सुनते हैं।وَالَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (42)और जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे (उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार जितने कर्म किए हम उन्हें स्वीकार करेंगे क्योंकि) हम किसी पर भी उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालते हैं। ऐसे ही लोग स्वर्ग (में जाने) वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (7:42)क़ुरआने मजीद की पद्धति यह है कि वह पापियों के लिए दंड का उल्लेख करने के साथ ही साथ भले कर्म करने वालों के लिए पारितोषिक का भी वर्णन करता है। पिछली आयत में नरक वालों को दिए जाने वाले कड़े दंड का उल्लेख हुआ। यह आयत कहती हैः ईमान और भले कर्म वाले स्वर्ग में जाएंगे और कभी भी उससे बाहर नहीं निकलेंगे क्योंकि उन्होंने अपनी क्षमता भर भले कर्म किए हैं और यही ईश्वर के लिए काफ़ी है। ईश्वर किसी से भी उसकी क्षमता से अधिक कर्मों की अपेक्षा नहीं रखता।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान और भले कर्मों के मेले से एक ऐसा फल सामने आता है जो सदैव बाक़ी रहने वाला होता है अर्थात ईश्वर स्वर्ग में उपस्थिति और सभी भले लोगों का साथ।आइये अब सूरए आराफ़ की 43वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهِمُ الْأَنْهَارُ وَقَالُوا الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي هَدَانَا لِهَذَا وَمَا كُنَّا لِنَهْتَدِيَ لَوْلَا أَنْ هَدَانَا اللَّهُ لَقَدْ جَاءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِالْحَقِّ وَنُودُوا أَنْ تِلْكُمُ الْجَنَّةُ أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (43)और (स्वर्ग में प्रवेश से पूर्व) स्वर्ग में जाने वालों के सीने से हमने हर द्वेष को दूर कर दिया है। उनके महलों के नीचे से नहरें बह रही हैं और वे कहेंगेः ईश्वर का धन्यवाद कि जिसने हमें इसका मार्ग दिखाया और यदि ईश्वर हमारा मार्गदर्शन न करता तो हम मार्ग नहीं पा सकते थे। निसंदेह हमारे पालनहार के भेजे हुए पैग़म्बर सत्य लेकर आए। उन्हें आवाज़ दी जाएगी कि यह वही स्वर्ग है जिसका तुम्हें, तुम्हारे कर्मों के कारण उत्तराधिकारी बनाया गया है। (7:43)स्वर्ग वालों पर ईश्वर की एक कृपा और अनुकंपा यह है कि वो उनके हृदयों से एक दूसरे के प्रति मौजूद द्वेष को समाप्त करके उन्हें एक दूसरे के प्रति सौहार्दपूर्ण और निष्ठावान बना देता है। वह स्वर्ग में प्रविष्ट होने से पूर्व ही उनके हृदयों से हर प्रकार की शत्रुता, अप्रसन्नता और द्वेष को समाप्त कर देता है ताकि स्वर्ग का वातावरण स्वच्छ और पवित्र रहे। यद्यपि स्वर्ग के विभिन्न दर्जे हैं परंतु किसी को किसी से ईर्ष्या नहीं होती।स्वर्ग वाले भी सदा ईश्वर की याद में रहते हैं और स्वर्ग की अनुकंपाएं पाकर वे ईश्वर को भूल नहीं जाते बल्कि वे ईश्वर का आभार प्रकट करते हैं कि उसने पैग़म्बर और आसमानी किताबें भेजकर संसार में उनके मार्गदर्शन की भूमि समतल की और उन्हें स्वर्ग में जाने का मार्ग दिखाया।इस आयत से हमने सीखा कि जिस जीवन में ईर्ष्या और द्वेष न हो वो स्वर्ग का जीवन है।स्वर्ग वाले अपने कर्मों पर घमंड नहीं करते बल्कि वे स्वर्ग को ईश्वर के मार्गदर्शन और पैग़म्बरों के परिश्रम का परिणाम समझते हैं।