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    सूरए आराफ़, आयतें 44-48, (कार्यक्रम 242)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 44 की तिलावत सुनते हैंوَنَادَى أَصْحَابُ الْجَنَّةِ أَصْحَابَ النَّارِ أَنْ قَدْ وَجَدْنَا مَا وَعَدَنَا رَبُّنَا حَقًّا فَهَلْ وَجَدْتُمْ مَا وَعَدَ رَبُّكُمْ حَقًّا قَالُوا نَعَمْ فَأَذَّنَ مُؤَذِّنٌ بَيْنَهُمْ أَنْ لَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الظَّالِمِينَ (44)और स्वर्ग वाले, नरक वालों को पुकार कर कहेंगे, हमारे पालनहार ने हमसे जो वादा किया था उसे हमने पूरा-पूरा पा लिया है तो क्या तुम्हें भी वह सब मिल गया है जिसका तुम्हारे पालनहार ने वादा किया था? वे कहेंगे कि हां, फिर एक पुकारने वाला कहेगा कि अत्याचारियों पर ईश्वर की लानत अर्थात धिक्कार है। (7:44)इससे पहले हमने स्वर्ग वालों की आपसी बात-चीत और इसी प्रकार से नरक वालों की परस्पर वार्ता की ओर संकेत किया था। इस आयत में स्वर्ग और नरक वालों की आपसी बात-चीत का उल्लेख किया गया है जो हमारे लिए पाठ है। पाठ यह है कि पापियों को दंडित और भले कर्म करने वालों को पुरस्कृत करने का ईश्वर का वादा सच्चा और अटल है तथा नरक वालों द्वारा प्रलय की सत्यता की स्वीकारोक्ति से उनके दंड में कोई कमी नहीं होगी बल्कि यह उन पर धिक्कार और ईश्वरीय दया से उनके अधिक दूर होने का कारण बनेगी।इस आयत से हमने सीखा कि स्वर्ग और नरक की स्थिति ऐसी है कि स्वर्ग और नरक वाले एक दूसरे की दया से अवगत रहेंगे और एक दूसरे से बात करेंगे।नरक में जाने का मुख्य कारण अत्याचार है अर्थात स्वय पर अत्याचार, परिवार पर अत्याचार तथा समाज पर अत्याचार इत्यादि।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 45 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ يَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا وَهُمْ بِالْآَخِرَةِ كَافِرُونَ (45)(वे) ऐसे लोग थे, जो (लोगों को) ईश्वर के मार्ग से रोकते थे और उसे टेढ़ा दिखाने के प्रयास करते थे और प्रलय का इन्कार किया करते थे। (7:45)पिछली आयत में कहा गया था कि प्रलय का न्यायालय अत्याचारियों को दंडित करके समाप्त हो जाएगा और वे नरक में चले जाएंगे। यह आयत कहती है कि अत्याचारी ऐसे लोग हैं जो न केवल धर्म में आस्था नहीं रखते अपितु दूसरों को भी अधर्मी बनाना चाहते हैं। वे हर संभव मार्ग से धर्म और उसके आदेशों की छवि बिगाड़ना चाहते हैं ताकि अन्य लोग ईश्वर की ओर आकृष्ट न होने पाएं।धर्म में संदेह उत्पन्न करना, अंधविश्वास फैलाना, धर्म को उसके वास्तविक मार्ग से विचलित करने जैसे कार्य धर्म के शत्रुओं के कार्यक्रमों में शामिल हैं। इन्हीं लोगों को ईश्वर ने अत्याचारी कह कर पुकारा है।इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु में यदि क्षमता होती है तो वह शस्त्रों के साथ धर्म से युद्ध करता है और यदि क्षमता नहीं होती है तो धर्म को खोखला बनाने हेतु भरसक प्रयास करता रहता है।समाजों के विचारों और संस्कृति पर अत्याचार, सबसे बड़े अत्याचारों में से है और इसका अत्यंत ही कड़ा दंड है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 46 की तिलावत सुनते हैंوَبَيْنَهُمَا حِجَابٌ وَعَلَى الْأَعْرَافِ رِجَالٌ يَعْرِفُونَ كُلًّا بِسِيمَاهُمْ وَنَادَوْا أَصْحَابَ الْجَنَّةِ أَنْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَمْ يَدْخُلُوهَا وَهُمْ يَطْمَعُونَ (46)और स्वर्ग तथा नरक के लोगों के बीच एक पर्दा होगा तथा आराफ़ के क्षेत्र पर (जो स्वर्ग और नरक के बीच एक ऊंचा स्थान है) कुछ लोग होंगे जो सबको उनकी निशानियों से पहचान लेंगे और स्वर्ग वालों से कहेंगे कि तुम पर सलाम हो। वे स्वर्ग में प्रविष्ट नहीं हुए होंगे (परंतु) उसकी इच्छा रखते होंगे। (7:46)यह आयत आराफ़ नामक स्थान की ओर संकेत करती है जो स्वर्ग और नरक के बीच स्थित है। इस स्थान पर कुछ विशेष लोग उपस्थित होंगे और स्वर्ग तथा नरक में जाने वालों को देख रहे होंगे। आराफ़ शब्द का प्रयोग पूरे क़ुरआन में एक स्थान पर हुआ है। इसका अर्थ होता है ऊंचा स्थान। इसी कारण सातवें सूरे का नाम आराफ़ है।इस आयत की व्याख्या में कहा गया है कि जो लोग आराफ़ पर उपस्थित होंगे वे ईश्वर के विशेष और निष्ठापूर्ण बंदे होंगे जो नरक और स्वर्ग में जाने वालों को देख रहे होंगे। वे भले और बुरे लोगों को उनके चेहरों से ही पहचान लेंगे। अलबत्ता कुछ व्याख्याकारों का कहना है कि आराफ़ पर ऐसे लोग होंगे जो न नरक में जाने के पात्र होंगे और न ही स्वर्ग के योग्य। उनका ईमान कमज़ोर होगा और उनके कर्म भी संपूर्ण नहीं होंगे। ऐसे लोग स्वर्ग में जाने की लालसा लिए होंगे परंतु वे स्वर्ग में नहीं जा पाएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य के कर्मों और उसके व्यवहार का उसके चेहरे पर प्रभाव पड़ता है और पवित्र प्रवृत्ति के लोग, चेहरे से लोगों की अंतर्स्थिति को समझ सकते हैं।आराफ़ मानवता का एक उच्च स्थान है। हमें आराफ़ तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 47 व 48 की तिलावत सुनते हैं।وَإِذَا صُرِفَتْ أَبْصَارُهُمْ تِلْقَاءَ أَصْحَابِ النَّارِ قَالُوا رَبَّنَا لَا تَجْعَلْنَا مَعَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (47) وَنَادَى أَصْحَابُ الْأَعْرَافِ رِجَالًا يَعْرِفُونَهُمْ بِسِيمَاهُمْ قَالُوا مَا أَغْنَى عَنْكُمْ جَمْعُكُمْ وَمَا كُنْتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ (48)और जब भी उनकी दृष्टि नरक वालों की ओर मुड़ जाती है तो वे कहते हैं कि, हे हमारे पालनहार! हमें इस अत्याचारी गुट में शामिल न कर। (7:47) और आराफ़ वाले उन (नरक वाले) लोगों को, जिन्हें वे उनके चेहरों से पहचानते होंगे, पुकार कर कहेंगे आज न तुम्हारे गुट काम आ सके और न वे बातें काम आ सकीं जिन पर तुम घमंड किया करते थे। (7:48)पिछली आयत से हमने जाना कि आराफ़ नामक स्थान पर मौजूद लोग स्वर्ग में जाने की इच्छा रखते हैं। यह आयतें नरकवासियों के साथ उनके व्यवहार का वर्णन करते हुए कहती है कि आराफ़ वाले सदैव स्वर्ग वालों की ओर दृष्टि रखते हैं परंतु अनचाहे में जब उनकी दृष्टि नरकवासियों की ओर उठ जाती है तो वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें नरक में न डाले और अत्याचारियों में शामिल न करे। मानो अत्याचारियों के साथ होना, नरक की आग से भी बुरा है।नरकवासियों के साथ अपनी वार्ता में आराफ़ वाले कहते हैं कि तुम संसार में जिन बातों को अपने लिए महत्त्वपूर्ण समझते थे और उन पर घमंड किया करते थे वह आज तुम्हारे कुछ भी काम न आए। तुम्हारी शक्ति, धन-संपत्ति और तुम्हारे लोग आज कुछ भी नहीं कर सकते।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में भले लोगों की धिक्कार का पात्र बनने से पहले ही हमें हर प्रकार के घमंड को छोड़ देना चाहिए क्योंकि यह प्रलय में अत्याधिक अपमान और तुच्छता का कारण है।धन और शक्ति केवल संसार में काम आते हैं, हमें ऐसी वस्तु की खोज में रहना चाहिए जो प्रलय में लाभदायक हो।