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    सूरए आराफ़, आयतें 49-52, (कार्यक्रम 243)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 49 की तिलावत सुनते हैंأَهَؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمْتُمْ لَا يَنَالُهُمُ اللَّهُ بِرَحْمَةٍ ادْخُلُوا الْجَنَّةَ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمْ وَلَا أَنْتُمْ تَحْزَنُونَ (49)क्या यह स्वर्ग वाले वही लोग हैं जिनके बारे में तुम नरक वाले सौगंध खाया करते थे कि इन्हें ईश्वर की दया प्राप्त नहीं होगी? अब देखो कि हमने इनसे कह दिया है कि स्वर्ग में प्रविष्ट हो जाओ (कि) तुम्हारे लिए न कोई भय है और न ही तुम दुखी होगे। (7:49)इससे पहले हमने स्वर्ग और नरकवासियों के साथ आराफ़ वालों की बात-चीत के कुछ अंश सुनवाए थे। अंतिम आयत में आराफ़ वालों ने घमंडी लोगों से कहा कि यहां तुम्हारी शक्ति और संपत्ति तुम्हारी कोई भी सहायता नहीं कर सकी और तुम्हें नरक की आग से बचा नहीं सकी। यह आयत उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि क्या स्वर्ग वाले वे ही लोग नहीं हैं जिन्हें तुम संसार में तुच्छ समझते थे और उनका परिहास करते हुए कहते थे कि ईश्वर हमें पसंद करता है। इसी कारण उसने हमें धन संपत्ति और शक्ति दी है। तुम लोग कहते थे कि यह लोग ऐसे नहीं हैं कि जो लोग परलोक में ईश्वर की दया के पात्र बन सकें। अब तुम लोग देखो कि यह लोग अत्यंत शांति और सुरक्षा तथा शांत मत के साथ स्वर्ग में प्रविष्ट हो रहे हैं जबकि तुम घमंडी लोग कि जो स्वयं को उनसे श्रेष्ठ समझते थे नरक में जा रहे हो।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय दया की प्राप्ति के लिए ईमान और कर्म की आवश्यकता है न कि धन, सपत्ति और पद की। संसार में दरिद्रता और गुमनामी, प्रलय में स्वर्ग की अनुकंपाओं से वंचित रहने की निशानी नहीं है।फ़ैसला करने में जल्दी नहीं करनी चाहिए। प्रलय में पता चलेगा कि कौन स्वर्ग में जाएगा और कौन नरक में। स्वर्ग और नरक में भेजना हमारे हाथ में नहीं है कि जो कोई हमारी दृष्टि में मूल्यहीन हो उसे हम नरकवासी समझें।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 50 की तिलावत सुनते हैं।وَنَادَى أَصْحَابُ النَّارِ أَصْحَابَ الْجَنَّةِ أَنْ أَفِيضُوا عَلَيْنَا مِنَ الْمَاءِ أَوْ مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ قَالُوا إِنَّ اللَّهَ حَرَّمَهُمَا عَلَى الْكَافِرِينَ (50)नरकवासी स्वर्ग वालों को पुकार कर कहेंगे, ईश्वर ने तुम्हें जो पानी या अन्य रोज़ी दी है उसमें से कुछ हमें भी दे दो। स्वर्ग वाले कहेंगे कि ईश्वर ने इन दोनों को काफ़िरों के लिए वर्जित कर दिया है। (7:50)स्वर्ग तथा नरक वालों के साथ आराफ़ वालों की वार्ता के पश्चात कि जो पिछली आयतों में बयान की गई, यह आयत नरक की आब या अनुकंपाओं में प्रविष्ट होने के पश्चात नरकवासियों तथा स्वर्ग वालों की स्थिति का वर्णन करते हुए कहती है कि नरक की आग की जलन इतनी अधिक होगी कि नरकवासियों की सबसे पहली मांग पानी होगी और चूंकि वे नरक के पहरेदारों की ओर से निराश होंगे अतः वे स्वर्ग वालों से आग्रह करेंगे कि वे थोड़ा सा पानी या फिर अन्य पेयजल जो ईश्वर ने उन्हें दिया है, वह नरकवालों को भी दे दें ताकि उनके अंदर जो आग जल रही है वह किसी सीमा तक शांत हो जाए परंतु स्वर्ग वालों को इस बात की अनुमति नहीं होगी कि वे स्वर्ग की अनुकंपाओं में से पानी की एक बूंद भी नरकवासियों को दें।इस आयत से हमने सीखा कि जो लोग केवल संसार के लिए धन संपत्ति एकत्रित करने के वार में रहते हैं वे प्रलय में ख़ाली हाथ रहेंगे।जिन लोगों ने संसार में ईश्वरीय आदेशों का पालन नहीं किया और ईश्वर द्वारा वर्जित की गई वस्तुओं को वैध समझते रहे वे स्वर्ग की अनुकंपाओं से वंचित हैं और पानी उनके लिए वर्जित होगा।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 51 की तिलावत सुनते हैंالَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَهُمْ لَهْوًا وَلَعِبًا وَغَرَّتْهُمُ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا فَالْيَوْمَ نَنْسَاهُمْ كَمَا نَسُوا لِقَاءَ يَوْمِهِمْ هَذَا وَمَا كَانُوا بِآَيَاتِنَا يَجْحَدُونَ (51)जिन लोगों ने अपने धर्म को खिलवाड़ समझ रखा है और संसार के (तुच्छ) जीवन ने उन्हें अहंकारी बना दिया है जिस प्रकार से उन्होंने इस दिन की भेंट को भुला दिया था और हमारी आयतों का इन्कार किया था, (उसी प्रकार) हम भी आज उन्हें भुला देंगे। (7:51)पिछली आयत में हमने नरकवासियों की गिड़गिड़ाहट सुनी थी जो स्वर्ग वालों से एक घूंट पानी मांग रहे थे। इस आयत में ईश्वर कहता है कि यदि प्रलय में उनकी यह स्थिति है तो हमने उन पर अत्याचार नहीं किया है बल्कि यह स्वयं उन्हीं के कर्मों का ही परिणाम है। हमारे पैग़म्बर जब सत्य बातें उनके कानों तक पहुंचा रहे थे तो उस पर ध्यान देने और सत्य को स्वीकार करने के स्थान पर उनका परिहास करते थे। वे संसार के माल, धन-संपत्ति और पद से मोहित थे। वे लोग सोचते थे कि प्रलय और हिसाब-किताब नहीं होगा तथा यह बातें खिलवाड़ से अधिक कुछ नहीं हैं।स्वभाविक है कि इन लोगों ने प्रलय के लिए कोई काम नहीं किया है कि जिससे आज लाभ उठा सकें। अतः आज इन्हें भी भुला दिया गया है।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िर, धर्म जैसे गंभीर मामले को खिलवाड़ समझते हैं और संसार को जो कि खिलवाड़ से अधिक कुछ नहीं है, गंभीरता से लेते हैं।संसार धोखा देने वाला है। संसार का मोह प्रलय से निश्चेतना यहां तक कि उसके इन्कार का कारण बनता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 52 की तिलावत सुनते हैंوَلَقَدْ جِئْنَاهُمْ بِكِتَابٍ فَصَّلْنَاهُ عَلَى عِلْمٍ هُدًى وَرَحْمَةً لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ (52)और हम उन लोगों के लिए ऐसी किताब लाए हैं जिसे हमने ज्ञान व सूचना के साथ विस्तारपूर्वक बताया है और वह ईमान वालों के लिए मार्दर्शन तथा दया है। (7:52)पिछली आयत में काफ़िरों द्वारा धर्म को खिलवाड़ समझने की बात कही गई थी। यह आयत कहती है कि धर्म, मार्गदर्शन के साधन के अतिरिक्त और कोई वस्तु नहीं है कि जिसे ईश्वर ने किताब और क़ानून के रूप में लोगों के लिए भेजा है और वह भी ऐसी किताब है जिसकी आयतें बुद्धि और प्रवृत्ति से मेल खाती हैं परंतु काफ़िर ईश्वरीय मार्गदर्शन को कि जो वस्तुतः दया है स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते और बिना किसी तर्क के उसका इन्कार करते हैं तथा उसे झुठलाते हैं। ईमान वाले केवल इस मार्गदर्शन और दया से लाभान्वित होते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने आसमानी किताबों के माध्यम से लोगों के पास कोई बहाना नहीं छोड़ा है ताकि वे लोगों पर अपनी कृपा भी संपूर्ण कर दे और किसी के पास यह बहाना और तर्क न रहे कि हम सत्य को नहीं समझते थे।ईश्वरीय संदेश या वहि, मानव आवश्यकताओं के प्रति ईश्वर के ज्ञान और मनुष्य की परिपूर्णता तथा कल्याण पर आधारित है या दूसरे शब्दों में ईश्वरीय क़ानून मानवीय प्रवृत्ति से समन्वित है। {