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    सूरए आराफ़, आयतें 53-56, (कार्यक्रम 244)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 53 की तिलावत सुनते हैंهَلْ يَنْظُرُونَ إِلَّا تَأْوِيلَهُ يَوْمَ يَأْتِي تَأْوِيلُهُ يَقُولُ الَّذِينَ نَسُوهُ مِنْ قَبْلُ قَدْ جَاءَتْ رُسُلُ رَبِّنَا بِالْحَقِّ فَهَلْ لَنَا مِنْ شُفَعَاءَ فَيَشْفَعُوا لَنَا أَوْ نُرَدُّ فَنَعْمَلَ غَيْرَ الَّذِي كُنَّا نَعْمَلُ قَدْ خَسِرُوا أَنْفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ (53)क्या ये लोग ईश्वरीय वादों के पूरा होने के अतिरिक्त किसी और बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं? जब प्रलय के दिन (ईश्वरीय किताब का) वादा सच होकर सामने आ जाएगा तो जो लोग उसे पहले से भूले हुए थे वे कहेंगे कि निसंदेह हमारे पालनहार के पैग़म्बर सत्य लेकर आए थे (किन्तु हमने उसे स्वीकार नहीं किया) तो क्या हमारे लिए भी माफ़ी दिलाने वाले हैं जो हमारी सिफ़ारिश करें या हमें (संसार में) वापस भेज दिया जाए ताकि हम जो कुछ संसार में किया करते थे उसके स्थान पर दूसरे कर्म करें? निसंदेह, इन लोगों ने स्वयं को घाटे में डाल दिया है और यह जो कुछ झूठ गढ़ा करते थे वह खो चुका है। (7:53)इससे पहले क़ुरआने मजीद ने स्वर्ग और नरक वालों के बीच होने वाली बातचीत के कुछ अंशों का उल्लेख किया था। यह आयत प्रलय में अपराधियों द्वारा अपने पापों की स्वीकारोक्ति की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यह अपराधी, प्रलय के संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के वादों की पूर्ति की बेकार में ही प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि उस दिन वे स्वयं अपनी ज़बान से स्वीकार करेंगे कि ईश्वर ने हमारे लिए मार्गदर्शन के साधन भेजे किन्तु हम ही ने उनकी अनदेखी की और उन्हें भुला दिया।परंतु क्या इस स्वीकारोक्ति से उनके दंड में कोई कमी आ जाएगी या उन्हें ऐसा कोई सहायक मिल जाएगा जिसकी सिफ़ारिश पर वे संसार में वापस भेज दिए जाएं कि भले कर्म कर सकें? उत्तर बहुत ही स्पष्ट है। वहां पर और दंड देखने के पश्चात इन बातों का कोई मूल्य नहीं होगा और अपराधी अपने घाटे पर केवल पछतावा ही करेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि संसार में क़ुरआने मजीद की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि प्रलय में रोने और गिड़गिड़ाने का कोई प्रभाव नहीं होगा।माफ़ी दिलाने की सिफ़ारिश की शर्तें और सीमाएं हैं तथा यह सबके लिए नहीं हैं। अतः इस आशा पर पाप नहीं करना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की 54वीं आयत की तिलावत सुनते हैंإِنَّ رَبَّكُمُ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ يُغْشِي اللَّيْلَ النَّهَارَ يَطْلُبُهُ حَثِيثًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ وَالنُّجُومَ مُسَخَّرَاتٍ بِأَمْرِهِ أَلَا لَهُ الْخَلْقُ وَالْأَمْرُ تَبَارَكَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ (54)निसंदेह तुम्हारा पालनहार वह ईश्वर है जिसने धरती और आकाशों की छः दिनों (और चरणों) में सृष्टि की फिर अर्श अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड पर अपनी सत्ता स्थापित की। वह रात को दिन पर, जो बड़ी तीव्रता से उसका पीछा करती है, ढांप देता है। और उसी (ईश्वर) ने सूर्य, चंद्रमा और सितारों की रचना की जो उसके आदेश पर नतमस्तक रहते हैं। जान लो कि सृष्टि और (उसकी) युक्ति केवल उसी के हाथ में है। अत्यंत पवित्र और बरकत वाला है वह ईश्वर जो ब्रह्मांड का पालनहार है। (7:54)ईश्वर के संबंध में मौजूद ग़लत और अंधविश्वासपूर्ण आस्थाओं के मुक़ाबले में यह आयत वास्तविक ईश्वर का परिचय कराते हुए कहती है कि तुम्हारा पालनहार वही है जो धरती व आकाशों का पालनहार है, जो सूर्य, चंद्रमा और सितारों का पालनहार है, जो रात और दिन तथा सृष्टि की अन्य वस्तुओं का पालनहार है। पूरे ब्रह्मांड का केवल एक ही ईश्वर है और इन सबकी व्यवस्था तथा युक्ति उसी के हाथ में है। ऐसा नहीं है कि सृष्टिकर्ता अलग हो और व्यवस्था चलाने वाला अलग। या हर कार्य के लिए एक अलग ईश्वर हो। सभी वस्तुओं का स्रोत एक जीवन व पावन अस्तित्व है जिससे सभी प्रकार की बरकतें और अनुकंपाएं प्रवाहित होती हैं और वही समस्त ब्रह्मांड का पालनहार है।अलबत्ता वह इस बात की क्षमता रखता है कि पूरे ब्रह्मांड की सृष्टि एक ही क्षण में कर दे परंतु उसने अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर सभी वस्तुओं की चरणबद्ध रचना की और इसी लिए धरती तथा आकाशों की रचना छह चरणों में हुई, और सृष्टि का संचालन ब्रह्मांड से परे अर्श नामक एक स्थान पर केन्द्रित हो गया कि जो स्वयं ईश्वर की शक्ति और सत्ता के अधीन है।इस आयत से हमने सीखा कि संसार की रचना एक पूर्वनियोजित कार्यक्रम के आधार पर की गई है और एक सुव्यवस्थित कार्यक्रम के अंतर्गत इसका संचालन होता है। यह रचना किसी संयोग का परिणाम नहीं है।सृष्टि परिपूर्णता की ओर अग्रसर और ईश्वरीय प्रशिक्षण की छाया में है। इसका अस्तित्व ईश्वर की निरंतर कृपा पर निर्भर है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 55 और 56 की तिलावत सुनते हैंادْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةً إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الْمُعْتَدِينَ (55) وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا وَادْعُوهُ خَوْفًا وَطَمَعًا إِنَّ رَحْمَةَ اللَّهِ قَرِيبٌ مِنَ الْمُحْسِنِينَ (56)अपने पालनहार को गिड़गिड़ाकर और अकेले में पुकारो। निसंदेह वह अतिग्रहणकारियों को पसंद नहीं करता। (7:55) और धरती में सुधार के पश्चात बुराई और बिगाड़ पैदा न करो और ईश्वर से डरते हुए और आशा के साथ प्रार्थना करो। निसंदेह ईश्वर की दया भले कर्म करने वालों के निकट है। (7:56)पिछली आयत में ईश्वर के परिचय के पश्चात, क़ुरआने मजीद इस आयत में अपने सृष्टिकर्ता से मनुष्य के संपर्क के साधनों की ओर संकेत करते हुए कहता है कि ईश्वर को दुआ तथा प्रार्थना द्वारा पुकारो। अन्य लोगों या फिर अन्य वस्तुओं को पुकारने के स्थान पर केवल ईश्वर को ही पुकारो और उससे प्रार्थना करो। अलबत्ता उससे प्रार्थना चिल्लाकर या दिखावे के रूप में नहीं होनी चाहिए बल्कि बड़ी ही विनम्रता के साथ धीमी आवाज़ में और एकांत में उससे प्रार्थना करनी चाहिए।हमें उसकी दया की ओर से आशान्वित भी रहना चाहिए और उसके कोप से भयभीत भी होना चाहिए ताकि हम में निराशा और घमंड न आने पाए। यदि हमसे कोई ग़लती या पाप हो जाए तो हमें तौबा करनी चाहिए कि उसकी दया का द्वार सदा ही खुला हुआ है। हमें उन लोगों से निकट होना चाहिए जो स्वयं को सुधारना चाहते हैं और अपने पापों के दंड से डरना चाहिए कि ईश्वर का दंड अत्यंत ही कड़ा होता है।यह आयत कहती है कि ईश्वर से प्रार्थना भी करो और साथ ही भले कर्म भी करो क्योंकि ईश्वरीय पारितोषिक भले कर्मों पर निर्भर हैं न कि आशाओं पर। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, ईश्वर के समक्ष विनम्रता की एक निशानी आकाश की ओर हाथ उठाना है जिस प्रकार से कि भिखारी, राजा के दरबार की ओर हाथ उठाते हैं।आगे चलकर आयत कहती है कि न केवल यह कि बुरे और भ्रष्ट लोगों के साथ न रहो बल्कि पैग़म्बरों के मार्ग पर आ जाओ कि जिनका पूरा प्रयास समाज को सुधारने और लोगों को हर प्रकार की बुराई से दूर रखने का था। ऐसे लोगों में से न हो जाओ जो ज़बान से तो ईश्वर को पुकारते हैं किन्तु कर्म और व्यवहार में ईश्वरीय मार्ग के विपरीत जाते हैं। यही ईश्वर के प्रति अतिक्रमण है और अतिक्रमणकारियों को ईश्वर पसंद नहीं करता है।इन आयतों से हमने सीखा कि दुआ और प्रार्थना आवश्यकतामुक्त ईश्वर के प्रति अपनी आवश्यकता को दर्शाने का साधन है जो ऐसा नहीं करेगा वह घमंड में फंस जाएगा।ईश्वर को पहचानना ही पर्याप्त नहीं, उसकी उपासना भी आवश्यक है।यह भी निश्चित है कि उपासना बिना प्रार्थना के संभव नहीं।सुधरा हुआ समाज भी ख़तरे में पड़ सकता है तथा सुधारक कभी भी प्रार्थना से आवश्यकतामुक्त नहीं रहते।भय व आशा मानव अस्तित्व के दो पलड़े हैं तथा जीवन में संतुलन के लिए इन दोनों पलड़ों के बीच संतुलन आवश्यक होता है।