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    सूरए आराफ़, आयतें 57-62, (कार्यक्रम 245)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 57 की तिलावत सुनते हैंوَهُوَ الَّذِي يُرْسِلُ الرِّيَاحَ بُشْرًا بَيْنَ يَدَيْ رَحْمَتِهِ حَتَّى إِذَا أَقَلَّتْ سَحَابًا ثِقَالًا سُقْنَاهُ لِبَلَدٍ مَيِّتٍ فَأَنْزَلْنَا بِهِ الْمَاءَ فَأَخْرَجْنَا بِهِ مِنْ كُلِّ الثَّمَرَاتِ كَذَلِكَ نُخْرِجُ الْمَوْتَى لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ (57)और वह (ईश्वर) वही है जो हवाओं को अपनी दया की शुभ सूचना बनाकर भेजता है। यहां तक कि जब वे भारी बादलों को उठा लेती हैं तो हम उन्हें मृत धरती की ओर ले जाते हैं और फिर उसके द्वारा पानी बरसा देते हैं फिर उस धरती से हर प्रकार के फल उत्पन्न कर देते हैं, इसी प्रकार हम मरे हुए लोगों को भी जीवित करेंगे, शायद तुम नसीहत प्राप्त कर लो। (7:57)इससे पहले धरती और आकाशों की सृष्टि में ईश्वर की शक्ति की ओर संकेत किया गया। यह आयत पानी बरसाने में ईश्वर की दया की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वर्षा, जो कि धरती और धरती पर रहने वालों को जीवन प्रदान करती है, ईश्वर के आदेश और इच्छा से होती है। यह मत सोचो कि बुद्धिहीन प्रकृति में संयोग से और बिना इरादे के हवाएं चलती हैं, बादल इधर से उधर जाते हैं और फिर वर्षा होने लगती है।ऐसा नहीं है बल्कि यह ईश्वर है जिसने अपनी तत्वदर्शितापूर्ण युक्तियों से प्राकृतिक साधनों और कारणों द्वारा धरती में जीवन उत्पन्न किया और हवाओं और वर्षा को समन्वित किया है। यह प्रकृति और इसमें मौजूद सभी वस्तुएं न केवल ईश्वर के अनन्य होने का प्रमाण है बल्कि प्रलय और मृत्यु के पश्चात मनुष्य के जीवन की भी निशानी है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रकृति की अधिक पहचान और उसके क़ानून का ज्ञान, ईश्वर की ओर से मनुष्य की निश्चेतता का कारण नहीं बनना चाहिए।मृत्यु का अर्थ अंत नहीं है बल्कि यह स्थिति का परिवर्तन है। अर्थात इस संसार में मरने से मनुष्य का जीवन समाप्त नहीं होता बल्कि उसे प्रलय तक प्रतीक्षा करनी होती है, जहां हिसाब-किताब के पश्चात स्वर्ग या नरक में उसका अनंत जीवन आरंभ होगा।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 58 की तिलावत सुनते हैं।وَالْبَلَدُ الطَّيِّبُ يَخْرُجُ نَبَاتُهُ بِإِذْنِ رَبِّهِ وَالَّذِي خَبُثَ لَا يَخْرُجُ إِلَّا نَكِدًا كَذَلِكَ نُصَرِّفُ الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَشْكُرُونَ (58)और पवित्र धरती की वनस्पतियां भी अपने पालनहार की आज्ञा से उगती है और जो धरती ख़राब और अपवित्र होती है उससे ख़राब और व्यर्थ वनस्पति के अतिरिक्त कुछ नहीं निकलता। हम, इस प्रकार (ईश्वर के प्रति) कृतज्ञ रहने वालों के लिए अपनी आयतें उलट-पलट कर बयान करते हैं। (7:58)पिछली आयत में वर्षा को ईश्वरीय दया बताया गया था। यह आयत कहती है कि वर्षा, यद्यपि जीवन और ईश्वर की दया का कारण है किन्तु इस वर्षा से लाभान्वित होने के लिए उपजाऊ धरती होनी चाहिए। उपजाऊ धरती वर्षा का पानी सोखकर फसल देती है। किन्तु बंजर ज़मीन जिसमें वर्षा के पानी से लाभान्वित होने की क्षमता नहीं होती, कीचड़ में परिवर्तित हो जाती है और उससे दुर्गंध आने लगती है।वर्षा के लाभदायक होने में कोई संदेह नहीं है किन्तु इससे बाग़ में फूल खिलते हैं जबकि बंजर ज़मीन में कोई लाभदायक चीज़ नहीं उगती। क़ुरआने मजीद की आयतें भी ईश्वर की दया हैं, यदि इन्हें पवित्र हृदय के लोगों के समक्ष पढ़ा जाए तो मनुष्य के आधत्यात्मिक जीवन का कारण बनती है। परंतु जब इन्हें अयोग्य और अक्षम लोगों के सामने पढ़ा जाए तो उनसे द्वेष, हठधर्मी, शत्रुता और सांप्रादायिकता के अतिरिक्त और कुछ ही प्रकट नहीं होता है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य के मार्ग दर्शन के लिए केवल ईश्वर की दया पर्याप्त नहीं है, स्वयं उसके भीतर योग्यता और क्षमता का होना भी आवश्यक है।मोक्ष और कल्याण की भूमिका पवित्रता है। इसके विपरीत अपवित्रता, पथभ्रष्टता का कारण बनती है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 59 और 60 की तिलावत सुनते हैंلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَى قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ (59) قَالَ الْمَلَأُ مِنْ قَوْمِهِ إِنَّا لَنَرَاكَ فِي ضَلَالٍ مُبِينٍ (60)निसंदेह हमने नूह को उनकी जाति की ओर भेजा तो उन्होंने कहा कि हे मेरी जाति वालों, ईश्वर की उपासना करो कि उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई ईश्वर नहीं है और मैं तुम्हारे बारे में एक महान दिन के दंड से डरता हूं। (7:59) उनकी जाति के सरदारों ने कहा कि निसंदेह, हम तुम्हें खुली हुई पथभ्रष्टता में देख रहे हैं। (7:60)यह आयतें ख़राब और अपवित्र ज़मीन का एक उदाहरण पेश करती है जिसका उल्लेख पिछली आयत में किया गया था। इन आयतों और बाद की आयतों में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनकी जाति के विषय का वर्णन किया गया है। क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों के अनुसार, हज़रत नूह ने 950 वर्षों तक अपनी जाति के लोगों को सत्य की ओर आने का निमंत्रण दिया और वे उनका मार्गदर्शन करते रहे किन्तु उन लोगों ने न केवल यह कि उनकी बातों को स्वीकार नहीं किया बल्कि उन्हें यातनाएं भी दीं यहां तक कि वे लोग ईश्वर के कोप के पात्र बने।यह आयतें कहती हैं कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम सदैव ही लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण देते थे और उन्हें ईश्वर की ओर बुलाते थे, परंतु उनकी जाति के सरदार, जिनका लोग अनुसरण करते थे, हज़रत नूह को अज्ञानता और पथभ्रष्टता में ग्रस्त व्यक्ति बताते थे। हालांकि हज़रत नूह अलैहिस्लाम सदैव ही लोगों को लोक-परलोक में ईश्वरीय दंड की ओर से चेतावनी देते रहते थे किन्तु लोग हज़रत नूह की बातों की ओर ध्यान नहीं देते थे।इन आयतों से हमने सीखा कि पूरे मानव इतिहास में समस्त पैग़म्बरों ने लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया है।पैग़म्बरों के वास्तविक विरोधी ऐसे धनवान रहे हैं जो संसार पर मोहित थे और उनकी धन-संपत्ति ने लोगों को मोह रखा था।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 61 और 62 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا قَوْمِ لَيْسَ بِي ضَلَالَةٌ وَلَكِنِّي رَسُولٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَمِينَ (61) أُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنْصَحُ لَكُمْ وَأَعْلَمُ مِنَ اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ (62)(हज़रत नूह ने उनके उत्तर में) कहाः हे मेरी जाति वालों मैं। किसी पथभ्रष्टता में नहीं हूं बल्कि मैं तो ब्रह्मांड के पालनहार का पैग़म्बर हूं। (7:61) मैं अपने पालनहार के संदेश तुम तक पहुंचाता हूं और तुम्हारा हित चाहता हूं, और मैं ईश्वर की ओर से वह सब जानता हूं जो तुम नहीं जानते। (7:62)अपनी जाति के सरदारों की ओर से अपमानजनक ढंग से स्वयं को पथभ्रष्ट बताए जाने के उत्तर में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने कोई बुरी और अपमानजनक बात नहीं की। उन्होंने केवल स्वयं को पथभ्रष्टता से दूर बताते हुए कहा कि मैं जो कुछ भी तुमसे कहता हूं वह पथभ्रष्टता के कारण नहीं है बल्कि यह सब ईश्वरीय संदेश हैं जिन्हें तुम तक पहुंचाने के लिए मुझे भेजा गया है।जिस ईश्वर ने मुझको भेजा है वह न केवल तुम्हारा पालनहार है बल्कि समस्त ब्रह्मांड का पालनहार है। मैं भी तुम्हारा हितैषी हूं। जो कुछ भी मैं करता हूं वह तुम्हारे हित में है। अपने लिए मैं कुछ नहीं चाहता।इन आयतों से हमने सीखा कि अज्ञानियों द्वारा अपमान किए जाने पर संयम से काम लेना चाहिए, उन्हीं की भांति व्यवहार नहीं करना चाहिए।प्रशिक्षक और प्रचारक को जनता का हमदर्द और हितैषी भी होना चाहिए और ज्ञानी भी होना चाहिए ताकि वह लोगों को असत्य की ओर न ले जाए।पैग़म्बर के पास ऐसे ज्ञान होते हैं जिनसे साधारण मनुष्य वंचित होता है।