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    सूरए आराफ़, आयतें 6-10, (कार्यक्रम 233)

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    आइये सूरए आराफ़ की छठी और सातवीं आयतों की तिलावत सुनते हैंفَلَنَسْأَلَنَّ الَّذِينَ أُرْسِلَ إِلَيْهِمْ وَلَنَسْأَلَنَّ الْمُرْسَلِينَ (6) فَلَنَقُصَّنَّ عَلَيْهِمْ بِعِلْمٍ وَمَا كُنَّا غَائِبِينَ (7)तो निश्चित रूप से हम उन लोगों से प्रश्न करेंगे जिनकी ओर (हमारे) पैग़म्बर भेजे गये और (इसी प्रकार) हम (अपने) पैग़म्बरों से भी अवश्य ही प्रश्न करेंगे। (7:6) फिर हम पूरे ज्ञान के साथ उन्हें (उनका कच्चा चिठ्ठा) सुनाएंगे और हम स्वयं भी ग़ायब तो न थे। (7:7)इससे पहले संसार में अत्याचारियों को मिलने वाले दंड की ओर संकेत किया गया, ये आयतें कहतीं हैं, वास्तविक दंड तो प्रलय में मिलेगा। और सभी लोगों से उनके कर्मों के संबंध में प्रश्न किया जाएगा, चाहे वे भले हों या बुरे, यहां तक कि पैग़म्बरों तक से प्रश्न किया जाएगा।अलबत्ता ईश्वर सभी के कर्मों से अवगत है और कोई भी बात उससे छिपी हुई नहीं है परंतु केवल लोगों को संतुष्ट करने और उन्हें उनके आरोप सुनाने के लिए प्रलय में एक न्यायालय स्थापित होगा और सभी से उनके कर्मों के बारे में प्रश्न किया जाएगा।पैग़म्बर और उनके परिजनों के कथनों के अनुसार, ईश्वर ने लोगों को जो अनुकंपाएं दी हैं, चाहे वो भौतिक हों या आध्यात्मिक, शरीर से संबंधित हों या मानस से, आयु से संबंधित हों या आय से या फिर जनता के मार्गदर्शन और नेतृत्व से संबंधित हों सभी को उनके बारे में जवाब देना होगा। अलबत्ता यह बात स्पष्ट है कि जिसको जिस मात्रा में अनुकंपा दी गयी है, उसी के अनुसार उससे प्रश्न किया जाएगा।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में सभी मनुष्यों से उनके कर्मों के बारे में प्रश्न किया जाएगा। पैग़म्बरों और समाज के नेताओं से यह पूछा जाएगा कि उन्होंने जनता के मार्गदर्शन के संबंध में अपने दायित्वों का पालन किया या नहीं और जनता से प्रश्न किया जाएगा कि उसने उनके आदेशों का पालन किया या नहीं।प्रलय में किया जाने वाला प्रश्न लोगों की स्वीकारोक्ति के लिए होगा जिसके आधार पर पापी को दंड और भले कर्म करने वाले को पारितोषिक दिया जाएगा।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत नंबर 8 की तिलावत सुनते हैं।وَالْوَزْنُ يَوْمَئِذٍ الْحَقُّ فَمَنْ ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (8)और उस दिन कर्मों का तौला जाना हक़ अर्थात अटल वास्तविकता है तो जिनके कर्मों का पलड़ा भारी होगा वही सफलता और कल्याण पाने वाले हैं। (7:8)यद्यपि प्रलय में न्याय करने वाला, ईश्वर होगा और न्यायालय में मौजूद सभी लोग उसकी रचना होंगे परंतु ईश्वर सत्य और न्याय के आधार पर अपने बंदों के बीच फ़ैसला करेगा। ऐसा नहीं है कि ईश्वर बिना तर्क के और जिस प्रकार चाहे फ़ैसला करेगा। जैसा कि कुछ इस्लामी गुटों का कहना है कि चूंकि ईश्वर सबका रचयिता है अतः उसे इस बात का अधिकार है कि वो जो चाहे करे, चाहे अत्याचार ही क्यों न हो। जबकि ईश्वर इस आयत में कहता है। मैं न्याय और कर्मों के वज़्न के आधार पर फ़ैसला करता हूं।प्रलय में लोगों के कर्मों को तोलने का सबसे अच्छा मानदंड, ईश्वर के पैग़म्बर और प्रिय बंदों जैसे परिपूर्ण लोग हैं। ईश्वर अपने बंदों के कर्मों को इन्हीं के आधार पर तोलेगा।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय सत्य है, उस दिन लोगों के कर्मों का तोला जाना सत्य है और उस दिन का प्रभुत्व भी सत्य अर्थात ईश्वर के हाथ में होगा।बिना अच्छे कर्मों के और भले कर्मों के पलड़े को भारी किए बिना सफलता और कल्याण की आशा, एक व्यर्थ काम है।आइये अब सूरए आराफ़ की 9वीं आयत की तिलावत सुनते हैंوَمَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَئِكَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنْفُسَهُمْ بِمَا كَانُوا بِآَيَاتِنَا يَظْلِمُونَ (9)और जिनके कर्मों का पलड़ा हल्का होगा तो वही वे लोग होंगे जिन्होंने अपना घाटा किया क्योंकि वे हमारी आयतों अर्थात निशानियों के साथ अत्याचार करते थे। (7:9)यह आयत और इससे पहले वाली आयत कर्मों की गुणवत्ता के सासथ ही उनकी मात्रा पर भी देती है और कहती है कि प्रलय में कर्मों का पलड़ा हल्का होना, अपने प्रति ऐसा घाटा है कि जिससे बढ़कर कोई घाटा नहीं क्योंकि आयु की पूंजी समाप्त हो गयी और उससे कोई लाभ नहीं हुआ।मनुष्य की आयु बर्फ़ की सिल की भांति है कि यदि उससे लाभ न उठाया जाए तो वह पानी हो जाती है और लाभ के स्थान पर मनुष्य को घाटा ही होता है।इस आयत से हमने सीखा कि भले कर्मों का कम होना प्रलय में घाटे का कारण है और यदि किसी के कर्मपत्र में भले कर्म हों ही नहीं तो उसके घाटे का तो अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।संसार एक मंडी के समान है जिसकी पूंजी मनुष्य की आयु और जिसका लाभ, भले कर्म हैं, जबकि कर्मों में कमी सबसे बड़ा घाटा है।आइये अब सूरए आराफ़ की 10वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ مَكَّنَّاكُمْ فِي الْأَرْضِ وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَايِشَ قَلِيلًا مَا تَشْكُرُونَ (10)और निसंदेह हमने तुम्हें धरती में बसाया और उसमें तुम्हारे जीवन के लिए विभिन्न साधन उपलब्ध कराए (परंतु) तुम कम ही कृतज्ञता दिखाते हो। (7:10)प्रलय में कर्मों पर मिलने वाले पारितोषिक और दंड का उल्लेख करने के पश्चात ईश्वर इस आयत में कहता है, हमने धरती में तुम्हें विभिन्न प्रकार के साधन दिए हैं और उसी के आधार पर तुम्हारे लिए दायित्व निर्धारित किए हैं। हमने धरती को तुम्हारे अधीन बना दिया है तुम्हें उससे लाभान्वित होने की क्षमता दी है ताकि तुम उचित जीवन बिता सको परंतु खेद की बात है कि तुम में से बहुत कम लोग और वह भी बहुत ही कम कृतज्ञता दिखाते हो।स्पष्ट है कि ईश्वरीय अनुकंपाओं पर कृतज्ञता केवल ज़बान से कहने से पूरी नहीं होती बल्कि सबसे बेहतर कृतज्ञता, ईश्वरीय अनुकंपाओं का उचित प्रयोग है। उसने जो वैध मार्ग बताए हैं उन्हीं पर चलते हुए अनुकंपाओं से लाभान्वित होना, सबसे बड़ी कृतज्ञता है।अंगूर ईश्वर की एक अनुकंपा है। इसका सही व उचित प्रयोग ईश्वर के प्रति कृतज्ञता है किन्तु अंगूर से शराब बनाना अपने रचयिता की अकृतज्ञता है। मनुष्य के हाथ अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति और दूसरों की सेवा के लिए है न कि उन्हें यातनाएं देने के लिए। अन्य अनुकंपाएं भी इसी प्रकार है।इस आयत से हमने सीखा कि धरती की संभावनाओं से लाभान्वित होने का सभी को समान अधिकार है और किसी को किसी पर कोई श्रेष्ठता नहीं है।अनुकंपाओं के कारण मनुष्य को ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए न यह कि वह भूल, निश्चेतना और ऐश्वर्य में डूब जाए।