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    सूरए आराफ़, आयतें 63-66, (कार्यक्रम 246)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 63 की तिलावत सुनते हैंأَوَعَجِبْتُمْ أَنْ جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَلَى رَجُلٍ مِنْكُمْ لِيُنْذِرَكُمْ وَلِتَتَّقُوا وَلَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ (63)क्या तुम्हें इस बात पर आश्चर्य है कि तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे पास तुम्हीं में से एक व्यक्ति द्वारा ज़िक्र अर्थात नसीहत आई है ताकि वह तुम्हें डराए और तुममें ईश्वर का भय उत्पन्न हो जाए (और इस प्रकार) शायद तुम दया के पात्र बन जाओ। (7:63)इससे पहले हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के पैग़म्बर बनाए जाने तथा उनकी जाति के सरदारों द्वारा उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किए जाने की बात की गई थी। इस आयत में हज़रत नूह उनके उत्तर में कहते हैं, क्या ईश्वर द्वारा अपने बंदों पर तत्वदर्शितापूर्ण बातों का उतारा जाना कोई आश्चर्यजनक और तर्कहीन बात है जो तुम लोग मारे साथ इस प्रकार का व्यवहार कर रहे हो?क्या मेरा काम नसीहत और सचेत करने के अतिरिक्त कुछ और है? क्या मैंने तुमसे किसी वस्तु की मांग की है जो तुम इस प्रकार मुझसे भाग रहे हो? क्या तुम ईश्वर की दया के पात्र नहीं बनना चाहते? तो फिर ईश्वर से डरो और बुराइयों से दूर रहो।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय संदेश अर्थात वहि का लक्ष्य नसीहत और चेतावनी द्वारा मनुष्य का प्रशिक्षण करना है।पैग़म्बर, साधारण लोगों के बीच में ही आए हैं और यही बात समाज के तथाकथित ठेकेदारों को स्वीकार्य नही है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 64 की तिलावत सुनते हैंفَكَذَّبُوهُ فَأَنْجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ فِي الْفُلْكِ وَأَغْرَقْنَا الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا عَمِينَ (64)फिर उन लोगों ने उन्हें झुठलाया तो हमने नूह को और जो लोग उनके साथ नौका में थे, उन्हें मुक्ति दिला दी और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था उन्हें डुबा दिया कि निसंदेह, वे सब (हृदय के) अंधे थे। (7:64)यद्यपि ईश्वरीय दंड और पारितोषिक का वास्विक आधार प्रलय है परंतु कुछ अवसरों पर ईश्वर संसार में ही अपना दंड काफ़िरों को दिखा देता है, जैसे कि इस आयत में कहा गया है कि हज़रत नूह की जाति का द्वेष और हठधर्म इस सीमा तक पहुंच गया था कि ईश्वर ने इस महान पैग़म्बर को आदेश दिया कि वे एक बड़ी सी नौका तैयार करें और ईमान वालों को उसमें सवार करें ताकि वे सब भीषण तूफ़ान से बच जाएं।अंत में आयत कहती है कि जो लोग, सत्य को देख नहीं सकते थे और न ही देखना चाहते थे, वे ऐसे दंड में ग्रस्त हुए कि उनका वंश ही समाप्त हो गया।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान, मोक्ष का कारण है जबकि इन्कार तबाही का मार्ग प्रशस्त करता है।तूफ़ान और बाढ़ जैसी आपदाएं ईश्वर के हाथ में हैं और हो सकता है कि यह ईश्वरीय कोप की निशानी हों।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 65 की तिलावत सुनते हैंوَإِلَى عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ أَفَلَا تَتَّقُونَ (65)और (हमने) आद जाति की ओर उनके भाई हूद को भेजा। उन्होंने कहा कि हे मेरी जाति वालों! ईश्वर की उपासना करो कि उसके अतिरिक्त तुम्हारा और कोई ईश्वर नहीं है। क्या तुम ईश्वर से नहीं डरते? (7:65)हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की घटना के पश्चात यह आयत हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और उनकी जाति आद के विषय की ओर संकेत करते हुए कहती है कि आद नामक जाति, यमन में जीवन व्यतीत किया करती थी। वर्तमान समय में यह क्षेत्र सऊदी अरब के दक्षिण में स्थित है। आद जाति के लोग बहुत ही शक्तिशाली थे किन्तु वे लोग नैतिक बुराइयों में ग्रस्त हो गए थे।अतः ईश्वर ने हज़रत नूह को उनके बीच भेजा ताकि वे उन्हें मूर्तिपूजा और अन्य बुराइयों से मुक्ति दिला कर, ईश्वर की बंदगी की ओर आमंत्रित करे। मनुष्य के लिए यह सबसे बड़ी परिपूर्णता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ईश्वरीय पैग़म्बर का कथन इसके अतिरिक्त कुछ और नहीं था कि हे लोगों! वास्तविक और अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरा ईश्वर नहीं है, जिसकी शरण में तुम जा सको, अतः यह अनुचित कार्य छोड़ दो और ईश्वर से डरो कि तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के साथ पैग़म्बरों का व्यवहार भाइयों के समान होता था और वे मानवता के सबसे अधिक हितैषी नेता थे।एकेश्वरवाद की ओर निमंत्रण, पैग़म्बरों के उत्तरदायित्वों में सर्वोपरि रहा है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 66 की तिलावत सुनते हैंقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِهِ إِنَّا لَنَرَاكَ فِي سَفَاهَةٍ وَإِنَّا لَنَظُنُّكَ مِنَ الْكَاذِبِينَ (66)(हज़रत हूद के उत्तर में) उनकी जाति के सरदारों ने, जो काफ़िर थे, कहाः निसंदेह, हम तुम्हें मूर्खता में देखते हैं और हमारा विचार है कि तुम झूठे लोगों में से हो। (7:66)जिस प्रकार से लोगों ने हज़रत नूह की बातों पर ध्यान देने के स्थान पर उनका परिहास और अनादर किया था उसी प्रकार आद जाति ने भी अपने पैग़म्बर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को ऐसा मूर्ख व्यक्ति बताया जिसकी बातों का कोई आधार नहीं होता और जो कुछ भी कहता है वे ईश्वर की ओर से नहीं होता बल्कि वह झूठ बोलकर उसे ईश्वर से संबंधित कर देता है।काफ़िरों के पास आरोप लगाने के अतिरिक्त और कोई तर्क नहीं होता यहां तक कि वे बातचीत में शिष्टाचार का भी पालन नहीं करते बल्कि बड़ी ही निर्लज्जता से ईश्वरीय पैग़म्बर को मूर्ख व्यक्ति बताते हैं।इस आयत से हमने सीखाप कि पैग़म्बर को अत्यंत की विषैले दुष्प्रचारों और आरोपों का सामना करना पड़ता है किन्तु वे कदापि अपने मार्ग से विचलित नहीं होते।मूर्ख लोग, सबसे बुद्धिमान लोगों को मूर्ख समझते हैं और इससे भी बढ़कर यह कि वे उन्हें झूठा समझते हैं।