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    सूरए आराफ़, आयतें 67-71, (कार्यक्रम 247)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 67 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا قَوْمِ لَيْسَ بِي سَفَاهَةٌ وَلَكِنِّي رَسُولٌ مِنْ رَبِّ الْعَالَمِينَ (67)(अपनी जाति के दुस्साहस के उत्तर में हज़रत हूद ने) कहा कि हे मेरी जाति वालो! मुझ में मूर्खता नहीं है बल्कि मैं तो ब्रह्मांड के पालनहार की ओर से (भेजा गया) पैग़म्बर हूं। (7:67)इससे पहले हमने सुना कि आद जाति के लोग हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का निमंत्रण स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे और इस ईश्वरीय पैग़म्बर की बात अस्वीकार करने के लिए कोई तर्क या प्रमाण पेश करने के स्थान पर उन्होंने हज़रत हूद का अपमान और परिहास करना चाहा और उन्हें मूर्ख कहकर संबोधित किया।यह आयत हज़रत हूद अलैहिस्सलाम के उत्तर का वर्णन करते हुए कहती है कि उन्होंने बिना अप्रसन्न हुए और कोई बुरी बात कहे हुए या स्वयं उन लोगों को मूर्ख कहे बिना बड़ी ही दृढ़ता से कहा कि तुम लोग मेरे बारे में जो बात कह रहे हो वह मुझमें नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों को अत्यंत ही कड़े और दूषित वातावरण का सामना था परंतु वे कभी भी अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए।अपने ऊपर लगाए गये आरोपों का हमें खंडन करने का अधिकार है परंतु किसी पर आरोप लगाने का हमें खंडन करने का अधिकार है परंतु किसी पर आरोप लगाने का हमें कोई अधिकार नहीं है।उदारता व महानता सत्य और वास्तविकता की ओर लोगों को बुलाने में सफल होने की पहली शर्त है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 68 की तिलावत सुनते हैंأُبَلِّغُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَأَنَا لَكُمْ نَاصِحٌ أَمِينٌ (68)(हे लोगो!) मैं अपने पालनहार के संदेश तुम तक पहुंचाता हूं और मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार नसीहत करने वाला हूं। (7:68)इससे पहले हमने कहा था कि आद जाति के लोगों ने अपने पैग़म्बर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम से तर्करहित व्यवहार किया। यह आयत कहती है कि हज़रत हूद ने न केवल उनके साथ बुरा व्यवहार नहीं किया बल्कि स्वयं को लोगों का हितैषी बताया कि जो उन तक ईश्वर के संदेश पहुंचाने में अमानतदार हैं और अपनी ओर से कुछ नहीं कहता, जिस प्रकार से कि वह लोगों से कुछ नहीं चाहता।यद्यपि लोग, पैग़म्बरों के पवित्र चरित्र की ओर सत्यता को उनके पैग़म्बर बनने से पूर्व ही जान चुके होते हैं परंतु जब उन्हें पैग़म्बरी के पद पर नियुक्त किया जाता है तो चूंकि सत्य का निमंत्रण स्वीकार करने के पश्चात कुछ ऐसे काम भी करने होते हैं जो कुछ लोगों के लिए कठिन होते हैं अतः वे इसे स्वीकार नहीं करते और हर संभव मार्ग से पैग़म्बर का अपमान, परिहास और इन्कार करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों ने ईश्वरीय धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए अपना पूरा प्रयास किया और इस मार्ग में उन्होंने तनिक ही ढिलाई नहीं की।लोगों का हित चाहना और अमानतदारी, धर्म के प्रचारकों की दो ऐसी विशेषताएं हैं कि यदि यह न हों तो धर्म का प्रचार सही ढंग से लोगों तक नहीं पहुंच सकता था।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 69 की तिलावत सुनते हैं।أَوَعَجِبْتُمْ أَنْ جَاءَكُمْ ذِكْرٌ مِنْ رَبِّكُمْ عَلَى رَجُلٍ مِنْكُمْ لِيُنْذِرَكُمْ وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِنْ بَعْدِ قَوْمِ نُوحٍ وَزَادَكُمْ فِي الْخَلْقِ بَسْطَةً فَاذْكُرُوا آَلَاءَ اللَّهِ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (69)क्या तुम्हें इस बात पर आश्चर्य है कि तुम्हीं में से एक व्यक्ति के पास तुम्हारे पालनहार की ओर से नसीहत आई है ताकि वह तुम्हें (पापों के परिणाम की ओर से) डराए। और याद करो उस समय को कि जब ईश्वर ने (हज़रत) नूह की जाति के पश्चात तुम्हें उसका उत्तराधिकारी बनाया और शारीरिक शक्ति की दृष्टि से धरती पर तुम्हें अधिक सक्षम बनाया तो ईश्वर की अनुकंपाओं को याद करो कि शायद (इस प्रकार) तुम्हें मोक्ष प्राप्त हो जाए। (7:69)जैसा कि इस आयत में और क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में कहा गया है कि आद जाति के लोग बड़े ही शक्तिशाली और दैत्याकार होते थे और क़ुरआन के शब्दों में उनके मरने के पश्चात ऐसा प्रतीत होता था कि मानो खजूर के वृक्ष के तने धरती पर गिरे हुए हों। यह आयत उन्हें संबोधित करते हुए कहती है कि हज़रत हूद तुम्हीं में से हैं, दूसरी जाति के नहीं है कि तुम उनके साथ इतना कड़ा व्यवहार कर रहे हो। वे तुम्हारी भलाई चाहते हैं और इसी लिए तुम्हें सचेत करते रहते हैं क्योंकि ईश्वर की ओर से उनके पास जो संदेश भी आता है वह नसीहत और चेतना के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। हम उन पर ऐसी बातें उतारते हैं जिनके कारण तुम ईश्वर की याद और अनुकंपाओं की ओर से निश्चेत नहीं होते।संसार में तुम्हारा कल्याण और मोक्ष, ईश्वर तथा प्रलय पर ध्यान देने पर निर्भर है। ऐसा ईश्वर की जिसने तुम्हें इतना अधिक शक्तिशाली बनाया और तुम्हें हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की जाति का उत्तराधिकारी बनाया कि जो अपने पापों और उद्दंडता के कारण नष्ट हो गई और यदि तुम भी उनके मार्ग पर चले तो तुम्हारा भी वही परिणाम होगा।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर, लोगों के बीच से और लोगों के लिए आए हैं, और ऐसा नहीं है कि वे स्वयं को लोगों से श्रेष्ठ समझते हों।शारीरिक शक्ति और क्षमता, ईश्वर की अनुकंपाओं में से है और इसका सही उपयोग होना चाहिए अन्यथा यह घाटे और विनाश का कारण बनती है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 70 की तिलावत सुनते हैंقَالُوا أَجِئْتَنَا لِنَعْبُدَ اللَّهَ وَحْدَهُ وَنَذَرَ مَا كَانَ يَعْبُدُ آَبَاؤُنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ (70)(उन लोगों ने हज़रत हूद से) कहा कि क्या तुम इसलिए आए हो कि हम अनन्य ईश्वर की उपासना करें और जिनकी उपासना हमारे पूर्वज करते थे, उन्हें छोड़ दें? (हम ऐसा नहीं करेंगे) तो यदि तुम सच्चे हो तो हमारे लिए वह ले आओ जिसका वादा करते हो। (7:70)यह आयत काफ़िरों की अत्यधिक तर्कहीनता, सांप्रदायिकता और हठधर्म को दर्शाती है कि जो बिना किसी तर्क के केवल इस कारण पैग़म्बर की बात और ईश्वर को झुठलाते हैं कि उनके पूर्वज ऐसे ईश्वर की उपासना नहीं करते थे बल्कि इससे भी बड़ा दुस्साहस यह है कि वे दंड के वादे का परिहास करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि पूर्वजों के रीति-रिवाजों और उनकी परंपराओं का अंधा अनुसरण एक तर्कहीन बात है। मूल बात तर्क और बुद्धि है न कि पारिवारिक, जातीय और क़बाइली रिश्ते।अनुचित सांप्रदायिकता और अनुसरण के कारण मनुष्य न केवल वास्तविकता को नहीं देख पाता बल्कि शत्रुता पर भी उतर आता है।पथभ्रष्टताओं और अंधविश्वासों के मक़ाबले में, पैग़म्बरों ने ग़लत धारणाओं और परंपराओं को तोड़ा है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 71 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ قَدْ وَقَعَ عَلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ رِجْسٌ وَغَضَبٌ أَتُجَادِلُونَنِي فِي أَسْمَاءٍ سَمَّيْتُمُوهَا أَنْتُمْ وَآَبَاؤُكُمْ مَا نَزَّلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ فَانْتَظِرُوا إِنِّي مَعَكُمْ مِنَ الْمُنْتَظِرِينَ (71)(हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने आद जाति के लोगों के द्वेष और हठधर्म को देखने के पश्चात) कहाः तुम्हारे पालनहार की ओर से, तुम्हारे ऊपर कोप और दंड निश्चित हो चुका है। क्या तुम लोग मुझसे उन नामों के बारे में झगड़ा करते हो कि जो तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने (इन मूर्तियों के लिए) रखे हैं? जबकि ईश्वर ने इनकी सत्यता के बारे में कोई तर्क नहीं उतारा है तो (अब ईश्वर के कोप की) प्रतीक्षा करो और मैं तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वालों में हूं। (7:71)आद जाति को ईश्वर की उपासना की ओर बुलाने में हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने अत्याधिक कठिनाइयां सहन कीं और धैर्य व संयम से काम लिया तथा उनके साथ भाईचारे का व्यवहार किया किन्तु इस जाति ने न केवल यह कि सत्य को स्वीकार नहीं किया बल्कि उसके विरोध पर उतर आई। आद जाति के लोगों ने कहा कि यदि प्रलय सत्य है और ईश्वर के दंड में वास्तविकता है तो इसी संसार में हमें उसकी निशानी दिखाओ और हमें दंडित करो।इस आयत में हज़रत हूद अलैहिस्सलाम उनसे कहते हैं कि अब तुम अपनी इस मांग पर इतना आग्रह कर रहे हो तो इसी संसार में तुम ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होगे। तुम्हें भी उस दंड की प्रतीक्षा है और मुझे भी। तुम जिन वस्तुओं को ईश्वर के नाम पर पूजते हो, उनके पास न तो शक्ति और ज्ञान है और न ही दया व तत्वदर्शिता।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य को बुद्धि और तर्क के आधार पर कार्य करना चाहिए न कि अंधे अनुसरण और अनुचित सांप्रदायिकता के आधार पर। हमको सदैव ही सत्य की खोज में रहना चाहिए और निसंकोच उसे स्वीकार करना चाहिए।