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    सूरए आराफ़, आयतें 72-76, (कार्यक्रम 248)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 72 की तिलावत सुनते हैं।فَأَنْجَيْنَاهُ وَالَّذِينَ مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَقَطَعْنَا دَابِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآَيَاتِنَا وَمَا كَانُوا مُؤْمِنِينَ (72)तो हमने हूद और उनके साथियों को अपनी दया व कृपा से मुक्ति दिला दी। और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया था हमने उनका वंश ही समाप्त कर दिया और वे लोग ईमान वाले न थे। (7:72)इससे पहले हमने कहा था कि हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की जाति “आद” के लोगों ने बड़ी हठधर्मी के साथ, उनके निमंत्रण को ठुकरा दिया था यहां तक कि उन लोगों ने बड़े ही दुस्साहस के साथ हज़रत हूद से कहा था कि यदि प्रलय के बारे में आपकी बातें सच्ची हैं तो उनका उदाहरण हम इस संसार में ही देख लें।यह आयत कहती है कि ईश्वर ने इस हठधर्मी जाति के लोगों को बड़े ही कड़े दंड में ग्रस्त कर दिया और निरंतर सात दिनों तक इतनी भयंकर आंधी आई कि वे सारे के सारे मर गये और खजूर के पेड़ की भांति धरती पर ढेर हो गए। अलबत्ता हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और वे लोग जो उनकी बातों पर ईमान ले आए थे, ईश्वर की दया व कृपा का पात्र बनकर इस दंड से बच गए।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर पूर्णतः न्याय करने वाला है। वह पापी और निर्दोष को एक पंक्ति में नहीं रखता। ईश्वरीय दंड के समय सच्चे ईमान वालों को मुक्ति मिल जाती है।इतिहास से पाठ लेते हुए, ईश्वर के प्रिय बंदों के मुक़ाबले में नहीं आना चाहिए अन्यथा विनाश का सामना करना पड़ेगा।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 73 की तिलावत सुनते हैंوَإِلَى ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ قَدْ جَاءَتْكُمْ بَيِّنَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ هَذِهِ نَاقَةُ اللَّهِ لَكُمْ آَيَةً فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (73)और हमने समूद जाति (के लोगों) की ओर उनके भाई सालेह को भेजा। उन्होंने कहा हे (मेरी) जाति के लोगो! केवल ईश्वर की उपासना करो कि उसके अतिरिक्त कोई और ईश्वर नहीं है। निसंदेह तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए स्पष्ट तर्क (और चमत्कार) आ चुका है। यह ईश्वरीय ऊंटनी तुम्हारे लिए निशानी है। इसे छोड़ दो कि यह ईश्वर की धरती में चरती रहे और इसे कोई कष्ट न देना कि कड़ा दंड तुम्हें अपनी लपेट में ले लेगा। (7:73)पिछले कार्यक्रमों में आद जाति के क्रियाकलापों का उल्लेख किया गया है। यह आयत समूद नाम की जाति के बारे में कहती है कि ईश्वर ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को समूद जाति में पैग़म्बर बनाकर भेजा और उन्होंने भी अन्य पैग़म्बरों की ही भांति लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया। लोगों ने उनसे चमत्कार दिखाने की मांग की। ईश्वर की इच्छा से पहाड़ के बीच में से एक ऊंटनी निकल आई।यह एक गाभिन ऊंटनी थी, और उसने अपने बच्चे को जन्म दिया। विचित्र बात यह थी कि इस ऊंटनी का दूध पूरी समूद जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। हज़रत सालेह ने लोगों से कहा था कि वे इस ऊंटनी का ध्यान रखें और उसे कोई कष्ट तथा यातना न दें क्योंकि ऐसा करने पर वे ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हो जाएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों से पैग़म्बरों का संबंध, समानता और भाई चारे का संबंध है।जो वस्तु भी ईश्वर से संबंधित है, चाहे वह एक ऊंटनी ही क्यों न हो, सम्मान का पात्र बन जाती है तथा उनका अनादर ईश्वरीय दंड का कारण है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 74 की तिलावत सुनते हैं।وَاذْكُرُوا إِذْ جَعَلَكُمْ خُلَفَاءَ مِنْ بَعْدِ عَادٍ وَبَوَّأَكُمْ فِي الْأَرْضِ تَتَّخِذُونَ مِنْ سُهُولِهَا قُصُورًا وَتَنْحِتُونَ الْجِبَالَ بُيُوتًا فَاذْكُرُوا آَلَاءَ اللَّهِ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ (74)और याद करो कि उस समय को जब आद जाति के पश्चात ईश्वर ने तुम्हें उत्तराधिकारी बनाया और धरती में तुम्हें इस प्रकार बसाया कि तुम समतल ज़मीन पर महल बनाते थे और पहाड़ों को काट कर घर बनाते थे। तो ईश्वर की अनुकंपाओं को याद करो और धरती में बिगाड़ फैलाते न फिरो। (7:74)हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने समूद जाति को नसीहत की थी कि जाति के परिणाम से पाठ लो कि जो अपने द्वेष और हठधर्म के कारण नष्ट हो गई। उस जाति के लोगों के स्थान पर आज यदि तुम लोग हो तो उन्हीं के मार्ग पर न चलो। ईश्वरीय अनुकंपाओं पर कृतज्ञ रहो और धरती में बुराई न फैलाओ। जान लो कि यह ईश्वर ही है जिसने धरती पर रहने तथा पहाड़ों में इस प्रकार की इमारतें बनाने की शक्ति दी है।इस आयत से हमने सीखा कि बीते हुए लोगों का इतिहास, आने वाले लोगों के मार्ग का दीपक है अतः हमें सदैव ही इतिहास का अध्ययन करते रहना चाहिए।जो लोग अधिक विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं और जिन्हें अधिक संभावनाएं प्राप्त हैं, उन्हें ईश्वर की याद की अधिक आवश्यकता होती है ताकि वे बुराईयों में ग्रस्त न हो सकें।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 75 और 76 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا مِنْ قَوْمِهِ لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِمَنْ آَمَنَ مِنْهُمْ أَتَعْلَمُونَ أَنَّ صَالِحًا مُرْسَلٌ مِنْ رَبِّهِ قَالُوا إِنَّا بِمَا أُرْسِلَ بِهِ مُؤْمِنُونَ (75) قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا بِالَّذِي آَمَنْتُمْ بِهِ كَافِرُونَ (76)(हज़रत सालेह की जाति के) सरदारों ने कमज़ोर बना दिए गये लोगों में से जो ईमान ले आए उनसे कहा था कि क्या तुम्हें इस बात का विश्वास है कि सालेह ईश्वर की ओर से भेजे गए हैं? उन्होंने (उत्तर में) कहा कि हमें उस चीज़ पर विश्वास है जो उनके द्वारा भेजी गई है। (7:75) (तो) घमंड करने वालों ने कहा कि जिस पर तुम ईमान लाए हो, हम तो उसका इन्कार करने वाले हैं। (7:76)हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की चेतावनियों और नसीहतों के बावजूद समूद जाति के सरदार, जो हज़रत सालेह की ईश्वरीय शिक्षाओं को अपने हितों के विपरीत देख रहे थे, न केवल यह कि उनका निमंत्रण स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए बल्कि उन्होंने ईमान लाने वालों के बीच संदेह उत्पन्न करने के प्रयास आरंभ कर दिए। उन्होंने हज़रत सालेह पर ईमान लाने वालों से कहा कि तुम्हें कैसे पता कि सालेह, ईश्वर के पैग़म्बर हैं? और ईश्वर ने ही उन्हें भेजा है, या यह कि उनकी बातें ईश्वर की ही बातें हैं?परंतु उनके इन दुष्प्रचारों का ईमान वालों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने बड़ी ही दृढ़ता से कहा कि हम हज़रत सालेह की पैग़म्बरी पर ईमान रखते हैं और इसमें हमें कोई संदेह नहीं है, विशेषकर इस लिए भी कि उन्होंने हमें एक महान चमत्कार दिखाया है।परंतु काफ़िरों और घमंडियों ने कि जो सत्य को स्वीकार करने और उसके सामने सिर झुकाने के लिए तैयार नहीं थे, अपने कुफ़्र की खुलकर घोषणा की और कहा कि तुम जिस बात पर ईमान रखते हो, हम उसका इन्कार करते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि पूरे इतिहास में प्रायः धनवान और शक्तिशाली लोग पैग़म्बरों और उनके मार्ग के विरोधी रहे हैं।न दरिद्रता और कमज़ोरी कोई मान्यता है न आराम और संभावना मान्यताओं के विरुद्ध, और कोई बुरी बात, महत्त्वपूर्ण वस्तु ईमान और ईश्वर का डर है। यह आयत सभी कमज़ोरों की प्रशंसा नहीं करती बल्कि ईश्वर पर विश्वास और कमज़ोर लोगों की प्रशंसा करती है।कुफ़्र की जड़, घमंड और अहंकार है।