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    सूरए आराफ़, आयतें 77-82, (कार्यक्रम 249)

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    आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 77 और 78 की तिलावत सुनते हैं।فَعَقَرُوا النَّاقَةَ وَعَتَوْا عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ وَقَالُوا يَا صَالِحُ ائْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِنْ كُنْتَ مِنَ الْمُرْسَلِينَ (77) فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ (78)फिर उन्होंने उस ऊंटनी को मार डाला और अपने पालनहार के आदेश की अवहलेना की और कहा कि हे सालेह! यदि तुम ईश्वर के पैग़म्बर हो तो जिस दंड की धमकी दे रहे हो उसे ले आओ। (7:77) तो (अचानक ही) एक भीषण भूकंप ने उन्हें आ लिया और वे अपने घरों में औंधे मुंह पड़े रह गए। (7:78)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया है कि समूद जाति के लिए हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का चमत्कार पहाड़ के बीच से एक ऊंटनी का प्रकट होना था। यह ऊंटनी समूद जाति की दूध की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करती थी। ईश्वर ने आदेश दिया था कि इस ऊंटनी को कोई न पहुंचाई जाए परंतु समूद जाति के सरदारों और धनवान लोगों ने कि जो, हज़रत सालेह पर लोगों के ईमान लाने की स्थिति में अपनी सरदारी को ख़तरे में देख रहे थे, कुछ लोगों को उस ऊंटनी को मारने के लिए नियुक्त किया ताकि वह ईश्वरीय चमत्कार समाप्त हो जाए और हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के पास लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए कुछ न रहे।उन लोगों ने बड़ी निर्दयता के साथ उस ऊंटनी की हत्या कर दी और बड़े घमंड और अहंकार के साथ ईश्वर के पैग़म्बर से कहा कि यदि तुम सच बोलते हो तो वह दंड ले आओ जिसका तुमने वादा किया था।यद्यपि उस ऊंटनी की हत्या में आम लोगों की कोई भूमिका नहीं थी और कुछ विशेष लोगों ने यह काम किया था किन्तु इस घृणित कार्य पर लोगों की चुप्पी इस बात का कारण बनी कि दंड और कोप सभी लोगों पर आए और वे सबके सब मारे जाएं।इस आयत से हमने सीखा कि घमंड और अहं, ईश्वर के आदेशों के मुक़ाबले में दुस्साहस और उद्दंडता का कारण बनता है।पाप पर चुप और राज़ी रहना, पाप में सहभागी होने के समान है।हो सकता है कि भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाएं, हमारे पापों का दंड हों, अतः हमें सचेत रहना चाहिए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 79 की तिलावत सुनते हैंفَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَةَ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ وَلَكِنْ لَا تُحِبُّونَ النَّاصِحِينَ (79)तो हज़रत सालेह ने उनकी ओर से मुंह फेर लिया और कहाः हे मेरी जाति (वालो)! मैंने तुम तक अपने पालनहार का संदेश पहुंचा दिया और मैंने तुम्हारा हित चाहता किन्तु तुम हित चाहने वालों को पसंद नहीं करते। (7:79)हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का यह कथन, उनकी जाति के लोगों पर ईश्वरीय प्रकोप आने से पूर्व अपने दायित्व की समाप्ति की घोषणा भी हो सकती है और उन लोगों की तबाही के पश्चात हठधर्म जाति से एक प्रकार की विदा भी। हज़रत सालेह कहते हैं कि मैंने अपने दायित्व और कर्तव्य का पालन किया और तुम लोगों को नसीहत करने में कोई कमी नहीं की किन्तु तुमने अपने अप्रिय कार्यों से दर्शा दिया कि नसीहत पसंद नहीं करते और हित चाहने वालों को भी पसंद नहीं करते।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों को ईश्वर की ओर आमंत्रित करने में पैग़म्बरों की शैली, हमदर्दी और नसीहत के साथ ईश्वर का पैग़ाम पहुंचाना है न कि शुष्क क़ानूनों और सिद्धांतों की भांति संदेश पहुंचाना।हमें नसीहत स्वीकार करनी चाहिए और नसीहत करने वालों से प्रेम करना चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों की बातों के प्रति लापरवाही, ईश्वरीय दंड का कारण बनती है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 80 और 81 की तिलावत सुनते हैं।وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ مَا سَبَقَكُمْ بِهَا مِنْ أَحَدٍ مِنَ الْعَالَمِينَ (80) إِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِنْ دُونِ النِّسَاءِ بَلْ أَنْتُمْ قَوْمٌ مُسْرِفُونَ (81)और जब लूत अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति (के लोगों) से कहाः क्या तुम वह अश्लील कर्म करते हो जिसे तुमसे पहले ब्रह्मांड में किसी ने नहीं किया? (7:80) तुम स्त्रियों के बजाए पुरुषों से अपनी वासना और कामेच्छा पूरी करते हो, बल्कि (निश्चित रूप से) तुम लोग (मर्यादाहीन और) अपव्यय करने वाले हो। (7:81)हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम और उनकी जाति समूद की घटना के उल्लेख के पश्चात इन आयतों में हज़रत लूत अलैहिस्सलाम और उनकी जाति की घटना का वर्णन किया गया है। इस जाति के लोग अश्लीलता में इतने डूबे हुए थे कि महिलाओं से विवाह का स्थान, समलैंगिकता ने ले लिया था और ये घृणित कर्म, एक साधारण और प्रचलित बात में परिवर्तित हो चुका था।हज़रत लूत अलैहिस्सलाम और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के काल में जीवन व्यतीत करते थे और उन्होंने हज़रत लूत को इस पथभ्रष्ट जाति के मार्गदर्शन के लिए भेजा था इस जाति के लोगों के बीच समलैंगिकता प्रचलित थी और क़ुरआने मजीद के शब्दों में यह कुकर्म इससे पहले संसार की किसी भी जाति में नहीं था।अलबत्ता आज सभ्यता और प्रगति के काल में भी ये घृणित कर्म इतना प्रचलित हो चुका है कि कुछ पश्चिमी देशों में इसे क़ानूनी दर्जा प्राप्त है। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम कहते हैं ऐसे पुरुष जो स्वयं को महिलाओं की भांति अन्य पुरुषों की कामेच्छा की पूर्ति के लिए प्रस्तुत कर देते हैं, ईश्वर की धिक्कार के पात्र हैं और इस्लाम में ऐसे लोगों की सज़ा मृत्युदंड है।इन आयतों से हमने सीखा कि समलैंगिकता, कामेच्छा की पूर्ति का अप्राकृतिक मार्ग है, तथा समाज के पुरुषों व महिलाओं के अधिकारों का हनन और संतुलित मार्ग से विचलित होने के समान है।वास्विक ख़तरा तब उत्पन्न हो जाता है जब बुरा कर्म समाज में इस प्रकार से प्रचलित हो जाए कि उसे एक साधारण सी बात माना जाने लगे। इस स्थिति में समाज विभिन्न आपदाओं और कोपों का पात्र बन जाता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 82 की तिलावत सुनते हैंوَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَنْ قَالُوا أَخْرِجُوهُمْ مِنْ قَرْيَتِكُمْ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ (82)और हज़रत लूत की जाति (के लोगों) का उत्तर इसके अतिरिक्त कुछ नहीं था कि उन्होंने कहा कि इन्हें अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो कि ये बड़े पवित्र बनते हैं। (7:82)यद्यपि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की बातें तर्कसंगत और अत्यंत स्पष्ट थीं परंतु उस पापी जाति ने बड़े ही दुस्साहस के साथ उन्हें और उनके अनुयाइयों को बस्ती से बाहर निकालने की ठान ली। उन लोगों ने अपने घृणित कर्मों का औचित्य दर्शाने के स्थान पर बड़े ही दुस्साहस के साथ कहा कि यदि तुम लोग पवित्र रहना चाहते हो तो यहां से निकल जाओ।इस आयत से हमने सीखा कि पाप और अश्लीलता का कोई औचित्य नहीं होता अतः पापियों के पास, पवित्र लोगों को बस्ती से बाहर निकालने के अतिरिक्त कोई उत्तर नहीं होता।यदि हम अश्लीलता को समाज में प्रचलित होने दें तो बात यहां तक बढ़ सकती है कि हम स्वयं समाज से बाहर निकलने पर विवश हो जाएं और सत्ता अपवित्र लोगों के हाथ में आ जाए।