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    सूरए आराफ़, आयतें 83-86, (कार्यक्रम 250)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 83 और 84 की तिलावत सुनते हैं।فَأَنْجَيْنَاهُ وَأَهْلَهُ إِلَّا امْرَأَتَهُ كَانَتْ مِنَ الْغَابِرِينَ (83) وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ مَطَرًا فَانْظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ (84)तो हमने लूत और उनके परिवार को, सिवाय उनकी पत्नी के कि जो दंड में रहने वाली थी, मुक्ति दिला दी। (7:83) हमने उनपर पत्थरों की वर्षा की तो देखो कि अपराधियों का अंत कैसा होता है? (7:84)इससे पहले हमने कहा कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की जाति के लोगों ने अनी नसीहतों और उपदेशों को स्वीकार करने और पापों को त्यागने के स्थान पर उन्हें और उनके अनुयाइयों को बस्ती से निकालने का प्रयास किया। उनकी दृष्टि में हज़रत लूत और उनके अनुयाइयों का पाप पवित्र ढंग से जीवन व्यतीत करता था।यह आयतें कहती हैं कि चूंकि उस जाति के अधिकांश लोग व्यभिचारी थे और व्यभिचार को ही पसंद करते थे अतः उनको ईश्वरीय दंड का पात्र बनना पड़ा। लेकिन हज़रत लूत और उनके थोड़े से अनुयाई ही उस दंड से बच सके।विचित्र बात यह है कि हज़रत लूत की पत्नी पुरुषों की समलैंगिकता का भाग नहीं थी परंतु चूंकि उसने अपने पति के स्थान पर पापी जाति का साथ दिया, अतः वो उन लोगों के दंड की भी सहभागी बनी और बर्बाद हुई।एक रोचक बात यह है कि हज़रत लूत की जाति के लिए आने वाला दंड अबरहा और उसकी सेना के लिए आने वाले दंड के समान था कि जो काबे को तोड़ने के लिए मक्का नगर आए थे। सूरए हूद की आयत संख्या 82 और 83 में हज़रत लूत की जाति के दंड के बारे में कहा गया हैः हमने उन पर कंकरियों की वर्षा की। और सूरए फ़ील में अबरहा और उसकी सेना को दिए जाने वाले दंड के बारे में कहा गया है कि हमने उन पर कंकरियों से आक्रमण किया। इसी प्रकार इस्लाम में समलैंगिकता जैसा पाप करने वालों को दंड उन्हें संगसार करना है अर्थात पत्थर मार मार कर उनकी हत्या कर देना।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय पारितोषिक और दंड में संबंधों और रिश्तेदारियों का कोई प्रभाव नहीं होता। एक पैग़म्बर की पत्नी दंडित होती है जबकि उसके अनुयाइयी बच जाते हैं।पुरुषों की भांति महिलाएं भी स्वाधीन और विचारों और आस्था के चयन में स्वतंत्र हैं। हज़रत लूत की पत्नी ने ईश्वर के शत्रुओं का मार्ग अपनाया जबकि फ़िरऔन की पत्नी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की अनुयाई बन गईं।ईश्वरीय कोप, प्रलय से विशेष नहीं है बल्कि कभी कभी इस संसार में ही उसका दंड आता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 85 की तिलावत सुनते हैं।وَإِلَى مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ قَدْ جَاءَتْكُمْ بَيِّنَةٌ مِنْ رَبِّكُمْ فَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (85)और मदयन (के लोगों) की ओर हमने उनके भाई शुऐब को भेजा। उन्होंने कहाः हे मेरी जाति वालों! केवल ईश्वर की उपासना करो। (क्योंकि) उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई अन्य ईश्वर नहीं है। निसंदेह तुम्हारे पालनहार की ओर से तुम्हारे लिए स्पष्ट तर्क आ चुका है तो (लेनदेन में) तराज़ू और नाप तोल को पूरा रखो और लोगों को उनकी वस्तुए कम न दो और सुधार के पश्चात धरती में बिगाड़ न फैलाव। यह तुम्हारे लिए बेहतर है यदि तुम ईमान वाले हो। (7:85)हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की जाति की घटना के वर्णन के पश्चात ये आयत हज़रत शुऐब और उनकी पत्नी की घटना की ओर संकेत करती है। इस आयत में क़रआने मजीद कहता है। ईश्वर ने प्राचीन सीरिया के अच्छी जलवायु वाले क्षेत्र में रहने वाली जाति के निकट शुऐब नामक पैग़म्बर को भेजा।चूंकि वहां के अधिकांश लोग लेन देन में कमी करते थे और ग्राहकों को ठीक माल नहीं देते थे अतः हज़रत शुऐब सदैव उन्हें इस बुरे काम से रोकते और नाप तोल में अधिक ध्यान देने की सिफ़ारिश करते थे। वे ग्राहकों को माल कम देने को ऐसी बुराई बताते थे जो ईमान से मेल नहीं खाती।इस आयत से हमने सीखा कि बिना ईमान का मनुष्य सदैव ही पथभ्रष्टता और बुराई के ख़तरे से जूझता है। कभी आर्थिक बुराई का ख़तरा और कभी नैतिक बुराई का ख़तरा।आसमानी धर्म और ईश्वरीय पैग़म्बर केवल उपासना के लिए प्रयासरत नहीं रहते थे बल्कि वे समाज की समस्याओं और आर्थिक कठिनाइयों पर भी ध्यान देते थे और इस संबंध में हर प्रकार की पथभ्रष्टता से संघर्ष करते थे।ईमान के लिए आवश्यक है कि सही ढंग से पैसे कमाए जाएं और लेन देन में न्याय से काम लिया जाए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 86 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَقْعُدُوا بِكُلِّ صِرَاطٍ تُوعِدُونَ وَتَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ مَنْ آَمَنَ بِهِ وَتَبْغُونَهَا عِوَجًا وَاذْكُرُوا إِذْ كُنْتُمْ قَلِيلًا فَكَثَّرَكُمْ وَانْظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ (86)और हर मार्ग पर न बैठो कि ईमान वालों को धमकियां दो और ईश्वर के मार्ग को टेढ़ा दर्शाओ। और याद करो उस समय को जब तुम संख्या में थोड़े थे तो ईश्वर ने तुम्हारी संख्या में वृद्धि कर दी और देखो कि बुराई फैलाने वालों का परिणाम क्या हुआ? (7:86)हज़रत शुऐब की जाति के लोग विभिन्न पद्धतियों से ईमान वालों को धमकी और यातनाएं देते रहते थे। हज़रत शुऐब मदयन के लोगों से कहते थे कि वे सामाजिक संस्कारों का पालन करें और लोगों के ईमान से मुक़ाबला करने के लिए धोखे, हत्या और लूटपाट से काम न लें तथा ईश्वर की अनुकंपाओं को याद करते रहें।इसी प्रकार ईश्वरीय आदेशों को ग़लत दर्शाना और ईमान वालों को सत्य के मार्ग से विचलित करने का प्रयास करना, मदयन के लोगों के बीच प्रचलित पथभ्रष्टताओं में से था। हज़रत शुऐब लोगों को इस प्रकार से कार्यों से रोकते थे और कहते थे कि ईश्वर की अनुंकपाओं को याद करो और पापों को छोड़ दो। तुम वही लोग हो जो अपनी कम संख्या के कारण समाप्त होने वाले थे परंतु ईश्वर ने तुम्हारी संख्या बढ़ा दी और तुम्हें शक्ति प्राप्त हो गई। तो तुम इस ईश्वरीय अनुकंपा पर कृतज्ञता स्वरूप पापों को छोड़ दो और पिछले लोगों के परिणाम से सीख लो कि बुरों का अंत बुरा ही होता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरी मार्ग के शत्रु सदैव ईमान वालों की घात में रहते हैं और उन्हें पथभ्रष्ट करने के लिए हर पद्धति का प्रयोग करते हैं।लोगों को मार्गदर्शन और सत्य स्वीकार कराने का एक मार्ग, ईश्वर की अनुकंपाओं को याद दिलाना है और अतीत के लोगों के परिणाम की ओर ध्यान आकर्षित कराना है।