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    सूरए आराफ़, आयतें 87-89, (कार्यक्रम 251)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 87 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ كَانَ طَائِفَةٌ مِنْكُمْ آَمَنُوا بِالَّذِي أُرْسِلْتُ بِهِ وَطَائِفَةٌ لَمْ يُؤْمِنُوا فَاصْبِرُوا حَتَّى يَحْكُمَ اللَّهُ بَيْنَنَا وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ (87)और यदि तुम में से एक गुट उस वस्तु पर जिसके लिए मैं भेजा गया हूं अर्थात मेरे द्वारा लाए गए संदेश पर ईमान ले आए और एक गुट ईमान न लाए तो (काफ़िरों पर ईश्वरीय दंड के संबंध में जल्दी मत करो और) धैर्य रखो यहां तक ईश्वर हमारे बीच फ़ैसला कर दे और वो सबसे अच्दा फ़ैसला करने वाला है। (7:87)इससे पहले हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम द्वारा अपनी जाति के लोगों को की गई कुछ सिफ़ारिशों की ओर संकेत किया गया। हमने बताया कि मदयन के लोगों को ग्राहकों को माल कम देने और एक दूसरे का माल खाने की आदत थी और आर्थिक भ्रष्टाचार उनके बीच प्रचलित था, इसी कारण हज़रत शुऐब सदैव उन्हें ईश्वर से डरने और लोगों के अधिकारों के सम्मान का निमंत्रण देते थे।परंतु काफ़िरों ने उनकी बात स्वीकार करने के स्थान पर ईमान वालों को पथभ्रष्ट करने तथा उनका अनादर करने का प्रयास किया। उन्होंने कहाः यदि तुम जो कहते हो वो सत्य है तो कहो कि हमारे लिए ईश्वरीय दंड आए। इस प्रकार की बातें करके वे, ईमान वालों के बीच भ्रम और संदेह की स्थिति उत्पन्न करने में सफल रहे। यहां तक कि ईमान वालों ने कहा कि हे शुऐब यदि हम सत्य पर हैं तो ईश्वर उन्हें दंडित क्यों नहीं करता?यह आयत इन दोनों गुटों के उत्तर में कहती है। ईश्वर दंड भेजने में जल्दी नहीं करता तथा पापियों को तौबा व प्रायश्चित का अवसर देता है। ईश्वर, पाप करते ही किसी को दंडित नहीं करता।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की दया, तत्काल दंड को रोक देती है और इसीलिए दंड में विलम्ब से न काफ़िरों को घमंड करना चाहिए न ईमान वालों को निराश होना चाहिए।।ईमान वालों तथा काफ़िरों के बीच फ़ैसले को ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए और हमें स्वयं इस संबंध में कोई फ़ैसला नहीं करना चाहिए क्योंकि केवल ईश्वर ही लोगों के कर्मों और विचारों से अवगत है और उसी को उनके बारे में निर्णय का अधिकार है।आइये अब सूरए आराफ़ की 88वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।قَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا مِنْ قَوْمِهِ لَنُخْرِجَنَّكَ يَا شُعَيْبُ وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَكَ مِنْ قَرْيَتِنَا أَوْ لَتَعُودُنَّ فِي مِلَّتِنَا قَالَ أَوَلَوْ كُنَّا كَارِهِينَ (88)हज़रत शुऐब की जाति के अहंकारी सरदारों ने कहा कि हे शुऐब! निसंदेह हम तुम्हें और तुम्हारे साथ ईमान लाने वालों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करेंगे सिवाए इसके कि तुम हमारे धर्म पर लौट आओ। (हज़रत शुऐब ने) कहाः यदि हमें इसमें रुचि न हो तब भी? (7:88)पैग़म्बरों और ईमान वालों के मुक़ाबले में साम्राज्यवादियों और अहंकारियों का एक हथकंडा देश निकाले की धमकी देना है। जैसा कि हमने हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के बारे में पढ़ा कि उनकी जाति के व्यभिचारियों ने कहा कि चूंकि तुम पवित्र लोग हो, अतः हमारी बस्ती से निकल जाओ।यहां भी मदयन के अहंकारी और काफ़िर सरदारों ने जो हज़रत शुऐब की बातों को सहन नहीं कर पा रहे थे, उन्हें और उनके अनुयाइयों को बस्ती से बाहर निकालने का प्रयास किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि या तो हमारा धर्म स्वीकार कर लो या हम तुम्हें बस्ती से निकाल देंगे। हज़रत शुऐब ने उनके उत्तर में कहा कि हमें तुम्हारे धर्म में कोई रूचि नहीं है, क्या तुम हमें अपना धर्म स्वीकार करने पर विवश करना चाहते हो?इस आयत से हमने सीखा कि पूरे मानव इतिहास में धनवान और साम्राज्यवादी, पैग़म्बरों और उनके मार्ग के शत्रु रहे हैं और किसी भी पैग़म्बर ने कभी भी किसी अत्याचारी शासक का समर्थन नहीं किया है।पैग़म्बरों की पद्धति तर्क और उपदेश की पद्धति है जबकि उनके शत्रु धमकी और ज़ोर जबरदस्ती की शैली अपनाते हैं।किसी पर अपनी आस्था थोपना काफ़िरों की पद्धति है। ईमान वाले किसी को अपनी बात मानने के लिए विवश नहीं करते।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत नंबर 89 की तिलावत सुनते हैं।قَدِ افْتَرَيْنَا عَلَى اللَّهِ كَذِبًا إِنْ عُدْنَا فِي مِلَّتِكُمْ بَعْدَ إِذْ نَجَّانَا اللَّهُ مِنْهَا وَمَا يَكُونُ لَنَا أَنْ نَعُودَ فِيهَا إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّنَا وَسِعَ رَبُّنَا كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا عَلَى اللَّهِ تَوَكَّلْنَا رَبَّنَا افْتَحْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ قَوْمِنَا بِالْحَقِّ وَأَنْتَ خَيْرُ الْفَاتِحِينَ (89)(हज़रत शुऐब ने काफ़िरों के उत्तर में कहाः) यदि ईश्वर द्वारा हमें तुम्हारे धर्म से मुक्ति दिलाए जाने के पश्चात हम फिर से उसकी ओर पलट जाएं तो निसंदेह हमने ईश्वर पर झूट गढ़ा हैं। हमारे लिए तुम्हारे धर्म की ओर पलटना संभव नहीं है सिवाए इसके कि ईश्वर ऐसा चाहे, कि वही हमारा पालनहार है। हमारे पालनहार को हर वस्तु का ज्ञान है। हमने ईश्वर पर ही भरोसा किया है। हे हमारे पालनहार! हमारे और हमारी जाति के बीच सत्य का फ़ैसला कर दे और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला है। (7:89)काफ़िरों की धमकियों और अपमानजक बातों के उत्तर में हज़रत शुऐब ने अत्यंत सम्मानजनक तथा नर्म परंतु ठोस और तर्कसंगत स्वर में कहा कि तुम चाहते हो कि हम तुम्हारे धर्म की ओर पलट आएं जबकि ईश्वर ने हमें उन अंधविश्वासों और ग़लत रीतियों से मुक्ति दिलाई और सीधे रास्ते की ओर हमारा मार्गदर्शन किया यदि हम पुनः उसी मार्ग पर चले जाएं तो इसका अर्थ यह होग कि हमने ईश्वरीय निमंत्रण को झूठ और निराधार समझा है। हमें इस बात का अधिकार नहीं है कि ईश्वर का मार्ग छोड़कर तुम्हारे मार्ग पर आ जाएं, सिवाए इसके कि ईश्वर हमें इसका आदेश दे और स्वाभाविक है कि ईश्वर इस बात की अनुमति नहीं देगा।हम यह नहीं कह सकते कि हम ईश्वर पर ईमान रखते हैं और व्यवहारिक रूप से तुम लोगों का साथ दें क्योंकि ईश्वर हर बात से अवगत है और कोई भी वस्तु उस से छिपी नहीं रहती। अतः तुम्हारी धमकियों के मुक़ाबले में हमने उसी पर भरोसा किया है और चाहते हैं कि वो हमारे और तुम्हारे बीच सबसे अच्छे ढंग से फ़ैसला करे।इस आयत से हमने सीखा कि सत्य के मार्ग और धार्मिक मान्यताओं से पीछे हटना, एक प्रकार से ईश्वर से किए गए वचन को तोड़ना है। ईमान वाला व्यक्ति कभी भी अपनी आस्थाओं का सौदा नहीं करता।विरोधियों के दबाव और धमकियों के मुक़ाबले में, हमें अपने दायित्वों का भी निर्वाह करना चाहिए और ईश्वर के असीम ज्ञान व शक्ति पर भी भरोसा करना चाहिए।