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    सूरए आराफ़, आयतें 90-93, (कार्यक्रम 252)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 90 और 91 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِهِ لَئِنِ اتَّبَعْتُمْ شُعَيْبًا إِنَّكُمْ إِذًا لَخَاسِرُونَ (90) فَأَخَذَتْهُمُ الرَّجْفَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دَارِهِمْ جَاثِمِينَ (91)और हज़रत शुऐब की जाति के काफ़िर सरदारों ने कहाः यदि तुमने शुऐब का अनुसरण किया तो निश्चित रूप से घाटा उठाने वालों में होगे। (7:90) फिर एक भीषण भूकंप ने उन्हें आ लिया और वे अपने घरों में औंधे मुंह पड़े रह गए। (7:91)इससे पहले हमने कहा कि मदयन के लोग अपने सरदारों का अनुसरण करते हुए हज़रत शुऐब के मक़ाबले में आ गए। उन्होंने न केवल, हज़रत शुऐब के एकेश्वरवाद के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया बल्कि उन्हें और उनके अनुयाइयों को बस्ती से निकालने का भी प्रयास किया। उन लोगों ने बड़ी ही हठधर्मी और द्वेष के साथ इस ईश्वरीय पैग़म्बर के उपदेशों और नसीहतों को ठुकरा दिया।यह आयतें कहती हैं कि मदयन के सरदार कि जिन्होंने कुफ़्र का मार्ग अपनाया था, सदैव लोगों को हज़रत शुऐब की बातें और उपदेश सुनने से रोकते थे और उनके अनुसरण को घाटे का सौदा बताते थे। स्भाविक रूप से उनका तात्पर्य आर्थिक और सांसारिक घाटा था, क्योंकि लोगों के लिए हज़रत शुऐब का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश ग्राहकों को माल कम न देना था। संकीर्ण दृष्टि वाले संसारप्रेमी, ग्राहकों को उनकी ख़रीदी हुई वस्तु कम देने को एक लाभदायक काम समझते थे।परंतु जब ईश्वर ने हर प्रकार से लोगों पर अपना तर्क पूरा कर दिया और वे सत्य को समझ गए परंतु फिर भी उन्होंने हठधर्मी की, ईश्वर के पैग़म्बर को देखा और उसके स्पष्ट तर्कों को सुना परंतु उसे झुठला दिया तथा उसे और उसके अनुयाइयों को यातनाएं दीं, तब ईश्वर का दंड आ गया। रात के समय सहसा ही एक भीषण भूकंप आ गया और उन्हें भागने तक का अवसर नहीं मिल पाया। जो लोग भागना चाहते थे वे औंधे मुंह गिर पड़े और पूरा घर उन पर गिर पड़ा।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के विरोधी प्रायः समाज के धनवान वर्ग से संबंधित थे।ईश्वरीय दंड अधिकतर रात में आता है और जैसा कि ईश्वर की विशेष अनुकंपाएं, रात ही में उसके प्रिय बंदों के पास आती है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 92 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَأَنْ لَمْ يَغْنَوْا فِيهَا الَّذِينَ كَذَّبُوا شُعَيْبًا كَانُوا هُمُ الْخَاسِرِينَ (92)जिन लोगों ने शुऐब को झुठलाया उनकी दशा यह हुई कि मानो वे कभी यहां बसे ही नहीं थे। (इस प्रकार सिद्ध हो गया कि) जिन लोगों ने शुऐब को झुठलाया था, वही घाटे में रहे। (7:92)यह आयत ईश्वरीय दंड की तीव्रता का इस प्रकार वर्णन करती है कि मदयन के लोग अपने घरों के खंडहरों में इस प्रकार दफ़्न हो गए कि जो कोई वहां जाता वो सोचता कि वर्षों से इस क्षेत्र में कोई नहीं रहता।आगे चलकर क़ुरआने मजीद कहता है कि काफ़िर यह सोचते थे कि ग्राहकों को कम माल न देने से उनका घाटा होगा जबकि आज स्पष्ट हो गया ह कि ईश्वरीय आयतों का इन्कार और ईश्वरीय आदेशों की अवहेलना ही वास्तविक घाटा है। जान और माल खोकर सांसारिक घाटा और प्रलय के दिन नरक में जाकर, परलोक का घाटा।इस आयत से हमने सीखा कि काफ़िरों के बुरे अंत से सीख लेते हुए सत्य से नहीं टकराना चाहिए।ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए और यह जानना चाहिए कि असत्य वालों के षड्यंत्र विफल हो कर रहेंगे। जो लोग हज़रत शुऐब को बस्ती से निकालनना चाहते थे वे स्वयं अपने घरों में दफ़्न हो गए।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत नंबर 93 की तिलावत सुनते हैं।فَتَوَلَّى عَنْهُمْ وَقَالَ يَا قَوْمِ لَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ رِسَالَاتِ رَبِّي وَنَصَحْتُ لَكُمْ فَكَيْفَ آَسَى عَلَى قَوْمٍ كَافِرِينَ (93)तो शुऐब ने उनकी ओर से मुंह मोड़ लिया और कहाः हे मेरी जाति वालो! मैंने अपने पालनहार का संदेश तुम तक पहुंचा दिया और तुम्हारा हित चाहा, तो मुझे काफ़िर जाति के परिणाम पर क्यों दुख हो? (7:93)हज़रत शुऐब मदयन के लोगों की घटना के अंत में यह आयत काफ़िर और उद्दंड जाति से इस ईश्वरीय पैग़म्बर के मुंह मोड़ लेने की बात करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हज़रत शुऐब उन लोगों के निर्जीव शरीर से संबोधित हैं और अपनी जाति की उद्दंडता की शिकायत कर रहे हैं कि हे मेरी जाति वालो! क्या मैंने अपने पालनहार के संदेश तुम तक नहीं पहुंचाए और क्या मैंने तुम्हें नसीहत नहीं की?मैं तो तुम्हारा हितौषी था, तुम ने मेरी बात क्यों नहीं मानी और उन लोगों की शरण में क्यों चले गए जिन्होंने तुम्हें अपना दास बना रखा था और केवल अपने हितों की पूर्ति के लिए तुम्हारा प्रयोग करते थे? हे लोगो! जो कुछ ईश्वर का संदेश था वो मैंने तुम तक पहुंचा द या परंतु तुम ने स्वीकार नहीं किया तो फिर मुझे तुम्हारे परिणाम पर क्यों दुख हो?इस आयत से हमने सीखा कि धर्म का प्रचार लोगों से हमदर्दी के आधार पर और भाईचारे की भाषा में होना चाहिए।हमें अपने दायित्व का पालन करना चाहिए और उसके परिणाम के बारे में चिंतित नहीं होना चाहिए।उपदेश और नसीहत की एक सीमा होती है, जब लोग किसी भी प्रकार से बात मानने के लिए तैयार न हों तो, उन्हें छोड़ देना चाहिए।ईश्वर का दंड सत्य के पूर्ण रूप से स्पष्ट होने के पश्चात ही आता है, जब तक लोगों के सामने सत्य स्पष्ट न हो जाए, ईश्वर अपना दंड नहीं भेजता।