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    सूरए आराफ़, आयतें 94-96, (कार्यक्रम 253)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 94 और 95 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا أَرْسَلْنَا فِي قَرْيَةٍ مِنْ نَبِيٍّ إِلَّا أَخَذْنَا أَهْلَهَا بِالْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ لَعَلَّهُمْ يَضَّرَّعُونَ (94) ثُمَّ بَدَّلْنَا مَكَانَ السَّيِّئَةِ الْحَسَنَةَ حَتَّى عَفَوْا وَقَالُوا قَدْ مَسَّ آَبَاءَنَا الضَّرَّاءُ وَالسَّرَّاءُ فَأَخَذْنَاهُمْ بَغْتَةً وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ (95)हमने किसी भी पैग़म्बर को किसी बस्ती में नहीं भेजा सिवाए इसके कि वहां के लोगों को कड़ी कठिनाइयों और मुसीबतों में डाला हो ताकि शायद वे (तौबा करके) हमारे समक्ष गिड़गिड़ाएं। (7:94) फिर हमने उनकी दुरावस्था को सुख में परिवर्तित कर दिया यहां तक कि वे ख़ूब फले फूलें और कहने लगे कि इस प्रकार के दुख सुख तो हमारे पूर्वजों को भी प्राप्त हो चुके हैं, तो अचानक ही हमारे कोप ने उन्हें आ घेरा और उन्हें पता ही नहीं चला। (7:95)इससे पहले हज़रत हूद, सालेह और शुऐब जैसे पैग़म्बरों की घटनाओं के वर्णन के पश्चात ये आयतें एक ईश्वरीय परंपरा की ओर संकेत करते हुए कहती है। पैग़म्बरों को भेजने और उनके द्वारा लोगों को ईश्वर की ओर बुलाने के साथ ही, लोगों को निश्चेतता से निकालने तथा उकने भीतर सत्य स्वीकार करने का मार्ग प्रशस्त करने हेतु, हम लोगों के लिए कुछ कठिनाइयां उत्पन्न करते हैं ताकि वे मृत्य और प्रलय को याद करके, बुराइयों को छोड़ दें और सही मार्ग पर आ जाएं।हम कभी उन्हें रोग और मृत्यु जैसी शारीरिक कठिनाइयों में और कभी सूखे और बाढ़ जैसी आर्थिक समस्याओं में ग्रस्त कर देते हैं ताकि वे संसार और मायामोह को त्याग दें। अलबत्ता इन कठिनाइयों की अवधि बहुत कम होती है और हम शीघ्र ही उन्हें खुशहाली प्रदान कर देते हैं परंतु कुछ लोग धन दौलत मिलते ही पुनः हर बात भूल जाते हैं और इन कटु घटनाओं और कठिनाइयों को भौतिक प्रकृति का परिणाम समझते हुए ईश्वर को भुला देते हैं। ऐसी स्थिति में वे ईश्वर के कोप का पात्र बनते हैं और हो सकता है कि स्वयं उन्हें इस बात का पता न हो।इन आयतों से हमने सीखा कि समस्याएं व कठिनाइयां, आत्मनिर्माण, निश्चेतना से दूरी और ईश्वर पर ध्यान देने का कारण बनती हैं। कठिनाइयां सदैव ईश्वर का कोप नहीं होतीं बल्कि कभी कभी ये ईश्वर की कृपा भी होती है जो कठिनाइयों के रूप में सामने आती है।तुच्छ प्रवृत्ति के लोगों के ऐश्वर्य और सुख, उद्दंडता और ईश्वर को भुलाने का कारण होता है, अतः हर सुख भी कृपा की निशानी नहीं है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 96 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ أَنَّ أَهْلَ الْقُرَى آَمَنُوا وَاتَّقَوْا لَفَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَرَكَاتٍ مِنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ وَلَكِنْ كَذَّبُوا فَأَخَذْنَاهُمْ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (96)और यदि बस्ती वाले ईमान ले आते और ईश्वर से डरते तो हम उनके लिए आकाशों और धरती से विभूतियों के द्वार खोल देते परंतु उन्होंने (हमारी आयतों को) झुठलाया तो हमने उन्हें उनके कर्मों के कारण (अपने कोप में) ग्रस्त कर दिया। (7:96)पिछली आयतों में ईश्वर की ओर से मनुष्य की निश्चेतता और उससे उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों की ओर संकेत किया गया था। यह आयत कहती है कि ऐसा नहीं है कि ईश्वर तुम्हें कठिनाइयों और समस्याओं में ग्रस्त देखना चाहता हो। बल्कि यदि लोग ईश्वर पर ईमान रखें और उससे डरते रहें तो वो धरती और आकाशों के द्वार उनके लिए खोल देगा और उन्हें अपनी अनुकंपाएं प्रदान करेगा।परंतु इसके लिए क्या किया जाए कि कुछ लोग, ईश्वर की असीम अनुकंपाओं से लाभान्वित होने के बावजूद, ईश्वर का इन्कार करते हैं और इस प्रकार स्वयं ही ईश्वर के कोप और क्रोध की भूमि समतल करते हैं।यहां पर यह प्रश्न मन में आ सकता है कि यदि ऐसा है तो आज काफ़िरों अर्थात ईश्वर का इन्कार करने वालों की स्थिति अच्छी क्यों है और मुसलमान इतनी दुर्दशा में क्यों हैं? जबकि यह आयत कहती है कि ईमान और ईश्वर से भय, अनुकंपाओं का कारण है।वर्तमान स्थिति पर थोड़ा का ध्यान देने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रथम तो अधिकांश इस्लामी देशों में केवल नाम ही का इस्लाम है और वहां पर इस्लामी धर्म के आदेश और मार्गदर्शन प्रचलित नहीं हैं, दूसरे यह कि काफ़िर देशों ने यद्यपि विज्ञान और उद्योग के क्षेत्र में प्रगति की है परंतु उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में बड़ी समस्याओं का सामना है जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पारिवारिक व्यवस्था का धराशायी होना और मानवीय मान्यताओं का समाप्त होना है। यही कारण है कि इन देशों में मानसिक रोग अधिक है।क़ुरआने मजीद की कुछ अन्य आयतों में इस प्रकार की ग़ैर टिकाऊ अनुकंपाओं की ओर संकेत किया गया है। सूरए अनआम की आयत संख्या 44 में कहा गया है। फिर जब उन्होंने ईश्वरीय सिफ़ारिशो को भुला दिया तो हमने हर वस्तु का द्वार उनके लिए खोल दिया।महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ईमान वालों के संबंध में बरकतें अर्थात विभूतियां आती हैं परंतु काफ़िरों के बारे में ऐसा नहीं है। बरकत उन अनुकंपाओं को कहा जाता है जो टिकाऊ व स्थाई तथा कठिनाइयों व समस्याओं से दूर होती हैं। जैसे आयु, संपत्ति और ज्ञान इत्यादि में बरकत। इस प्रकार की विभूतियां, ईश्वर की ओर से ईमान वालों के लिए निर्धारित हैं। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनों में आया है कि जब अंतिम इमाम, इमाम महदी अलैहिस्सलाम प्रकट होंगे तो धरती और आकाशों से लोगों के लिए विभूतियां आने लगेंगी क्योंकि अत्याचार पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा और पूरे संसार में न्याय स्थापित होगा।इस आयत से हमने सीखा कि हर अनुकंपा पर प्रसन्न नहीं होना चाहिए। ईमान वाले के पास अनुकंपा, विभूति और ईश्वरीय कृपा की निशानी है जबकि काफ़िर के पास ईश्वर के कोप का चिन्ह है।समाज में विभूतियों के लिए व्यक्तिगत ईमान और ईश्वर का भय पर्याप्त नहीं है बल्कि समाज में अधिकांश लोगों में ईमान और ईश्वर का भय होना चाहिए।समाज की संस्कृति और अध्यात्म पर ध्यान देने से आर्थिक लाभ भी होता है तथा समाज की अर्थव्यवस्था में भी प्रगति आती है और इसी के साथ आर्थिक भ्रष्टाचार भी रूक जाते हैं।