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    सूरए आराफ़, आयतें 97-102, (कार्यक्रम 254)

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    आइये सूरए आराफ़ की आयत संख्या 97, 98 और 99 की तिलावत सुनते हैं।أَفَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَى أَنْ يَأْتِيَهُمْ بَأْسُنَا بَيَاتًا وَهُمْ نَائِمُونَ (97) أَوَأَمِنَ أَهْلُ الْقُرَى أَنْ يَأْتِيَهُمْ بَأْسُنَا ضُحًى وَهُمْ يَلْعَبُونَ (98) أَفَأَمِنُوا مَكْرَ اللَّهِ فَلَا يَأْمَنُ مَكْرَ اللَّهِ إِلَّا الْقَوْمُ الْخَاسِرُونَ (99)क्या बस्तियों के लोग इस बात से सुरक्षित हैं कि वे सोते ही रहें और रातों-रात हमारा दंड उन्हें आ ले? (7:97) या बस्ती वाले इस बात से सुरक्षित हैं कि वे खूल कूद में व्यस्त रहें और दिन में हमारा दंड उन्हें आ ले? (7:98) तो क्या यह लोग ईश्वर की गुप्त युक्तियों की ओर से संतुष्ट हो गए हैं? जबकि ऐसा संतोष तो केवल घाटे में रहने वालों को ही होता है। (7:99)इससे पहले हमने संकेत किया था कि कुछ पापों और कर्मों के कारण ईश्वर अत्याचारियों और काफ़िरों को इसी संसार में दंडित करता है और वे ईश्वरीय कोप का पात्र बनते हैं। यह आयतें कहती हैं कि कोई भी ईश्वर के इस कोप से सुरक्षित नहीं है। किसी भी पापी को ईश्वरीय दंड से सुरक्षा का आभास नहीं करना चाहिए।ईश्वर का दंड बता कर नहीं अचानक आता है। ईश्वरीय दंड का कोई समय नहीं होता और वह रात-दिन में, सोते या जागते में, आराम या काम करते हुए, किसी भी समय आ सकता है।इस आयत में ईश्वरीय दंड को “मक्र” कहा गया है जिसका अर्थ होता है विरोधी को उसके लक्ष्य तक पहुंचने से रोकने की युक्ति। ईश्वरीय युक्ति काफ़िरों को उनके ग़लत लक्ष्यों तक पहुंचने से रोकने पर आधारित है।स्पष्ट है कि ईश्वर को भुलाने से मनुष्य संसार के मायाजाल में फंस कर रह जाता है। इस स्थिति में वह ऐसे पाप करता है जिनके कारण वह ईश्वरीय दंड का पात्र बनता है और यह मनुष्य की आयु और उसकी संपत्ति के लिए सबसे बड़ा घाटा है।इन आयतों से हमने सीखा कि अपनी शक्ति, सामर्थ और संभावनाओं पर घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि ईश्वर की शक्ति और युक्ति उन सबसे श्रेष्ठ है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 100 की तिलावत सुनते हैंأَوَلَمْ يَهْدِ لِلَّذِينَ يَرِثُونَ الْأَرْضَ مِنْ بَعْدِ أَهْلِهَا أَنْ لَوْ نَشَاءُ أَصَبْنَاهُمْ بِذُنُوبِهِمْ وَنَطْبَعُ عَلَى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ (100)क्या एक जाति के पश्चात धरती के उत्तराधिकारी बनने वालों के लिए यह बात स्पष्ट नहीं हुई कि यदि हम चाहें तो उनके पापों के कारण उन्हें भी तबाह कर दें और उनके हृदयों पर ठप्पा लगा दें और उन्हें कुछ सुनाई न दे। (7:100)इस आयत में ईश्वर इस समय धरती पर रहने वालों को चेतावनी देता है कि क्यों वे पिछले लोगों के परिणाम से सीख नहीं लेते और अपने अंत के संबंध में क्यों नहीं सोचते, क्या इन्हें इस बात का ज्ञान नहीं है कि हमने उन्हें उनके पापों और दुष्कर्मों के कारण विभिन्न कठिनाइयों में ग्रस्त किया था। पाप ने उनके मन और आत्मा को इस प्रकार अपने नियंत्रण में ले रखा था कि वे सत्य को देखने से वंचित हो गए थे।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों में आया है कि मनुष्य का मत एक सफ़ेद पृष्ठ की भांति है। जब भी वह कोई पाप करता है तो उस पर एक काला बिंदु आ जाता है और यदि वह तौबा कर लेता है तो काला बिन्दु मिट जाता है किन्तु यदि वह पाप करना जारी रखता है तो यह बिन्दु बढ़ता जाता है और यहां तक कि उसका पूरा हृदय काला हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह किसी भी वास्तविकता और सत्य को समझ नहीं पाता और उसके कल्याण का कोई मार्ग नहीं बचता।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य को सदैव ही उपदेश, नसीहत और चेतावनी की आवश्यकता रहती है ताकि वह निश्चेत न हो सके।मनुष्य के हृदय पर पाप अपना प्रभाव डालता है और इसके कारण मनुष्य धीरे-धीरे परिवर्तित होता रहता है यहां तक कि सत्य देखने की क्षमता खो बैठता है।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 101 की तिलावत सुनते हैं।تِلْكَ الْقُرَى نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنْبَائِهَا وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانُوا لِيُؤْمِنُوا بِمَا كَذَّبُوا مِنْ قَبْلُ كَذَلِكَ يَطْبَعُ اللَّهُ عَلَى قُلُوبِ الْكَافِرِينَ (101)ये वे बस्तियां हैं जिनकी कुछ बातें हम आप से बयान कर रहे हैं और निसंदेह, उनके पैग़म्बर स्पष्ट चमत्कार लेकर उनके पास आए परंतु जिन बातों का वे पहले इन्कार कर चुके हैं उनके कारण वे ईमान न लाए। इस प्रकार ईश्वर काफ़िरों के हृदयों पर ठप्पा लगा देता है। (7:101)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि जो कुछ हमने कहा वह उन बस्तियों से संबंधित है जिनके पैग़म्बर थे और वह स्पष्ट तर्कों और चमत्कारों द्वारा लोगों को ईश्वर की ओर बुलाते थे परंतु अधिकांश लोग सत्य को स्वीकार करने और ईश्वर पर ईमान लाने के लिए तैयार न थे क्योंकि पाप ने उन्हें इस प्रकार अपने घेरे में ले रखा था कि उनके हृदय सत्य को समझने और उसे स्वीकार करने में सक्षम नहीं थे।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के विचारों से धर्म के प्रचारकों को निराश नहीं होना चाहिए।पैग़म्बरों की बातें सदैव ही स्पष्ट तर्क के साथ होती हैं परंतु काफ़िरों के हृदय उन्हें समझ नहीं पाते।आइये अब सूरए आराफ़ की आयत संख्या 102 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا وَجَدْنَا لِأَكْثَرِهِمْ مِنْ عَهْدٍ وَإِنْ وَجَدْنَا أَكْثَرَهُمْ لَفَاسِقِينَ (102)और हमने उनमें से अधिकांश लोगों में वचन के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं पाई बल्कि हमने उनमें से अधिकांश को (पापी व) उद्दंड पाया। (7:102)पिछली आयत में काफ़िरों के इन्कार के कारणों का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि उनमें से अधिकांश लोग उन मानवीय और प्राकृतिक सिद्धांतों पर कटिबद्ध नहीं हैं जो हमने उनकी प्रवृत्ति में रखे हैं। उन लोगों ने ऐसी सभी अच्छाइयों को छोड़ दिया है जिन्हें हर व्यक्ति प्राकृतिक रूप से समझता है।स्वभाविक रूप से ऐसे लोग, आसमानी धर्मों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इससे उनके पापों और आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आएगी।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों तक के संबंध में फ़ैसला करते समय न्याय से काम लेना चाहिए और सभी को बुरा नहीं समझना चाहिए बल्कि यह कहना चाहिए कि अधिकांश लोग ऐसे हैं।मानवीय और प्राकृतिक सिद्धांतों पर कटिबद्धता भी मनुष्य को बहुत से पापों से सुरक्षित रखती है।